इधर तीन खबरें अखबारों में पढ़ने को मिलीं. एक नाबालिग लड़की अंधेरे में शौच के लिये नदी किनारे गयी तो उसके साथ कुछ लोगों ने बलात्कार किया. इसे तो खबर बनना ही नहीं चाहिए था क्योंकि यह घटना सदियों से हर दिन हमारे देश में कहीं न कहीं घट रही है. दूसरी खबर थी, एक आदिवासी लड़की को जब शादी के बाद ससुराल में शौचालय न होने के कारण मैदान में शौच के लिये जाना पड़ा तो वह मायके लौट आयी. हां इसे खबर बनना चाहिए ही था क्योंकि किसी देहाती आदिवासी लड़की ने पहली बार ऐसा साहसी कदम उठाकर समाज और सरकार को आईना दिखाया है. तीसरी खबर थी कि केन्द्रीय मंत्री जयराम रमेश ने दोनों खबरों पर अफसोस जाहिर करते हुए कहा कि आज लड़कियां अपने अभिभावकों से मोबाइल के लिये तो जिद करती हैं, लेकिन घर में शौचालय बनवाने की मांग नहीं करतीं. पता नहीं यह व्यंग्यात्मक अफसोस औरतों की मजबूरी पर था या इतने सालों की सरकारी नाकामयाबी पर, या समाज की उदासीनता और निष्क्रियता पर था.
शायद पहली बार किसी केन्द्रीय मंत्री ने भारतीय औरतों की इस सदियों पुरानी समस्या पर कोई टिप्प्णी की है. आजादी मिले 65 साल हो गये, लेकिन न तो सरकार कुछ कर पायी और न बड़ी-बड़ी बातें करने वाली सामाजिक संस्थाएं ही. नारी-शिक्षा, सती-प्रथा, बालविवाह, दहेज और विधवा विवाह आदि समस्याओं पर तो लोग बोले, कुछ किया भी, लेकिन भारतीय औरतों के लिये शौचालय की समस्या पर कभी कोई नहीं बोला. पचास–साठ साल पहले सिर्फ डॉ राममनोहर लोहिया ने ही बार-बार इस समस्या का विस्तार से अपने लेखों और भाषणों में उल्लेख किया.
बसों से सफर करनेवाली गरीब-अमीर हर तबके की महिलाओं को रोज ही सफर के दौरान पेशाब एवं शौच की व्यवस्था रास्ते में न होने के कष्ट से गुजरना पड़ता है, खरीददारी के लिये भीड़-भाड़वाले बाजारों में घूमते समय भी यह समस्या मुंह खोले खड़ी रहती है, कम दुकानों में ही जगह की कमी के कारण शौचालय की व्यवस्था रहती है.
यहां विश्वचर्चित किताब “फ्रीडम एट मिडनाइट” के एक प्रसंग का जिक्र करना चाहूंगा. आजादी मिलने को थी, हिन्दू-मुस्लिम दंगों से देश त्रस्त था और गांधीजी नोआखाली के गांवों में शांति स्थापना का प्रयास करते घूम रहे थे. उनकी नजर खुले खेत में शौच करते एक व्यक्ति पर पड़ी, वे रुक गये और उन्होंने एक फावड़ा मंगवाया और उस व्यक्ति को गड्ढा खोदकर दिखाया कि घर के आसपास बंद शौचालय कैसे बनाया जा सकता है, उससे वायदा कराया कि वह अब कभी खुले में शौच नहीं करेगा. इस घटना से भी देश के नेताओं ने कुछ नहीं सीखा, कुछ नहीं किया.
गांवों में औरतों को शौच के लिये अंधेरे में घर से दूर खेत-मैदान जैसी सूनसान जगहों पर जाना पड़ता है, दिन में शौच की जरूरत महसूस हो तो कोई उपाय नहीं, पेट दबाकर झेलते रहो, पुरुषों ने औरतों की इस तकलीफ को शायद ही कभी महसूस किया हो. शहरों में तो ये खेत-मैदान भी नहीं, सिर्फ रात का इंतजार करो. यह हमारे समाज के लिये बहुत बड़ा कलंक है. हर घर मे शौचालय न हो सके तो भी औरतों के लिये सुलभ और साफ सार्वजनिक शौचालय तो गांवों, शहरों और कस्बों की हर बस्ती में होने ही चाहिए. वैसे गांवों में तो आज भी इसे समस्या ही नहीं समझा जाता. बलात्कार की अनेक घटनाएं अंधेरे में शौच के लिए खेतों में जाने के दौरान होती रही है, आज भी हो रही हैं. अब तो पंचायतों से ही कुछ आशा है, उन्हें जो अधिकार एवं फंड मिल रहे हैं शायद उनका उपयोग गांवों में साफ- सुथरे सार्वजनिक शौचालयों के निर्माण में हो.
अफसोस यह देखकर होता है कि सैकड़ों सालों से बरकरार यह समस्या कमोबेश आज भी वैसी ही है, हालत में कोई विशेष बदलाव नहीं हुआ है. क्या कर रहे हैं ये सैकड़ों – हजारों नारी संगठन, कहां सोई पड़ी हैं सामाजिक संस्थाएं, क्यों नहीं आवाज उठातीं, क्यों नहीं कुछ करतीं? क्या बदलाव के लिये हमें अगले सौ सालों का और इंतजार करना पड़ेगा?
शायद पहली बार किसी केन्द्रीय मंत्री ने भारतीय औरतों की इस सदियों पुरानी समस्या पर कोई टिप्प्णी की है. आजादी मिले 65 साल हो गये, लेकिन न तो सरकार कुछ कर पायी और न बड़ी-बड़ी बातें करने वाली सामाजिक संस्थाएं ही. नारी-शिक्षा, सती-प्रथा, बालविवाह, दहेज और विधवा विवाह आदि समस्याओं पर तो लोग बोले, कुछ किया भी, लेकिन भारतीय औरतों के लिये शौचालय की समस्या पर कभी कोई नहीं बोला. पचास–साठ साल पहले सिर्फ डॉ राममनोहर लोहिया ने ही बार-बार इस समस्या का विस्तार से अपने लेखों और भाषणों में उल्लेख किया.
बसों से सफर करनेवाली गरीब-अमीर हर तबके की महिलाओं को रोज ही सफर के दौरान पेशाब एवं शौच की व्यवस्था रास्ते में न होने के कष्ट से गुजरना पड़ता है, खरीददारी के लिये भीड़-भाड़वाले बाजारों में घूमते समय भी यह समस्या मुंह खोले खड़ी रहती है, कम दुकानों में ही जगह की कमी के कारण शौचालय की व्यवस्था रहती है.
यहां विश्वचर्चित किताब “फ्रीडम एट मिडनाइट” के एक प्रसंग का जिक्र करना चाहूंगा. आजादी मिलने को थी, हिन्दू-मुस्लिम दंगों से देश त्रस्त था और गांधीजी नोआखाली के गांवों में शांति स्थापना का प्रयास करते घूम रहे थे. उनकी नजर खुले खेत में शौच करते एक व्यक्ति पर पड़ी, वे रुक गये और उन्होंने एक फावड़ा मंगवाया और उस व्यक्ति को गड्ढा खोदकर दिखाया कि घर के आसपास बंद शौचालय कैसे बनाया जा सकता है, उससे वायदा कराया कि वह अब कभी खुले में शौच नहीं करेगा. इस घटना से भी देश के नेताओं ने कुछ नहीं सीखा, कुछ नहीं किया.
गांवों में औरतों को शौच के लिये अंधेरे में घर से दूर खेत-मैदान जैसी सूनसान जगहों पर जाना पड़ता है, दिन में शौच की जरूरत महसूस हो तो कोई उपाय नहीं, पेट दबाकर झेलते रहो, पुरुषों ने औरतों की इस तकलीफ को शायद ही कभी महसूस किया हो. शहरों में तो ये खेत-मैदान भी नहीं, सिर्फ रात का इंतजार करो. यह हमारे समाज के लिये बहुत बड़ा कलंक है. हर घर मे शौचालय न हो सके तो भी औरतों के लिये सुलभ और साफ सार्वजनिक शौचालय तो गांवों, शहरों और कस्बों की हर बस्ती में होने ही चाहिए. वैसे गांवों में तो आज भी इसे समस्या ही नहीं समझा जाता. बलात्कार की अनेक घटनाएं अंधेरे में शौच के लिए खेतों में जाने के दौरान होती रही है, आज भी हो रही हैं. अब तो पंचायतों से ही कुछ आशा है, उन्हें जो अधिकार एवं फंड मिल रहे हैं शायद उनका उपयोग गांवों में साफ- सुथरे सार्वजनिक शौचालयों के निर्माण में हो.
अफसोस यह देखकर होता है कि सैकड़ों सालों से बरकरार यह समस्या कमोबेश आज भी वैसी ही है, हालत में कोई विशेष बदलाव नहीं हुआ है. क्या कर रहे हैं ये सैकड़ों – हजारों नारी संगठन, कहां सोई पड़ी हैं सामाजिक संस्थाएं, क्यों नहीं आवाज उठातीं, क्यों नहीं कुछ करतीं? क्या बदलाव के लिये हमें अगले सौ सालों का और इंतजार करना पड़ेगा?
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