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सूचनाधिकार के रथ पर आयेगी जे. पी. की संपूर्ण-क्रांति

मैने व्यक्तिगत तौर पर कभी भी जे. पी. आंदोलन का समर्थन नहीं किया. इस आंदोलन का एकसूत्री प्रोग्राम था “इंदिरा को हटाओ”, और इसके लिये “संपूर्ण क्रांति” लाने का सपना दिखाया गया. लेकिन संपूर्ण क्रांति की कौन कहे, मामूली क्रांति भी नहीं आयी, उल्टे देश को जातिवाद और सांप्रदायिकता की आग में झोंकनेवाले नेताओं के हाथ जरूर मजबूत हुए और वे भी सत्तासीन हुए. जे.पी. आंदोलन की सिर्फ एक बात मुझे पसंद आयी थी – जे.पी. ने आह्वान किया था -हर गली- मोहल्ले और गाँव- कस्बे में आम जनों की निगरानी समितियों का गठन करो जिनका काम होगा चुने हुए जनप्रतिनिधियों और सरकारी बाबुओं-पदाधिकारियों पर नजर रखना और उनके भ्रष्टाचार को उजागर करना. ये समितियाँ बनीं तो जरूर, लेकिन सिर्फ जुलूस, हड़ताल, धरने और बंद की हंगामा - राजनीति के लिये. जे. पी. के चेले सत्ता में आये, तो ये समितियाँ भी गायब हो गयीं.यदि निगरानी समितियाँ रहने दी जातीं तो अपने वर्तमान आकाओं की नाक में ही दम किये रहतीं. हर सरकारी स्कीम का लाभ ये समितियाँ भ्रष्ट अफसरों से छीनकर जरूरतमंदों तक पहुँचा सकती थीं, सरकारी दफ्तरों में जाकर पूछ सकती थीं कि अमुक व्यक्ति का काम...

नरसिंह राव: एक मूल्यांकन यह भी

नरसिंह रावजी में कुछ खास बातें थीं, यदि उन्होंने समझ लिया कि अमुक समस्या का समाधान नहीं है तो वे उसे टालते जाते थे और कुछ करके नया विवाद पैदा कर उस समस्या को अधिक उलझाने से बचते थे, उनका विश्वास था कि ऐसी समस्यायें समय के साथ स्वतः सुलझ जाती हैं. उनकी सबसे अधिक अनुकरणीय विशेषता थी कि अपने पूरे राजनैतिक जीवन में उन्होने शायद ही कभी कोई विवादास्पद वक्तव्य दिया हो. उन्हें कभी यह कहने की जरूरत ही नहीं पड़ी कि मैंने ऐसा नही कहा और मीडिआ ने मेरी बातों को तोड़ मरोड़कर पेश किया है. आलोचकों के द्वारा बार-बार “मौनी बाबा” एवं “निष्क्रियता और अनिर्णय की प्रतिमूर्ति” कहे जाने के बाद भी उन्होंने न तो अपनी कार्यशैली बदली, न किसी के खिलाफ कुछ बोले, न ही कभी बौखलाकर कुछ सफाई दी और न कभी किसी पर कोई आरोप लगाया. नरसिंह रावजी अद्भुत और प्रकांड विद्वान थे. साइंस और लॉ में स्नातक होने के साथ-साथ 17 देशी विदेशी भाषाएं लिखने, पढ़ने और बोलने में पारंगत थे. एक ही व्यक्ति में विज्ञान, कानून और साहित्य के साथ राजनीति का ऐसा मणिकांचन संयोग असंभव नहीं तो दुर्लभ जरूर है. 70 वर्ष की उम्र में उन्होंने कंप्युटर पर काम...

अच्छा लगा मुस्लिम आतंकवादियों के खिलाफ एक इस्लामिक फ़तवा

खबर है कि लखनऊ की एक 400 साल पुरानी संस्था ‘दारुल इफ्ता फिरंगी महल’ ने सोमवार को उन आतंकवादियों के खिलाफ फ़तवा दिया है जो पूजास्थलों पर हमले कर निर्दोष लोगों की हत्या कर देते हैं. लखनऊ ईदगाह के पूर्व इमाम और फिरंगी महल के प्रमुख मौलाना खालिद रशीद ने स्थानीय व्यापारी साजिद उमर के एक लिखित सवाल के जबाब में फ़तवा देते हुए कहा , “इस्लाम में आतंकवाद के लिये कोई जगह नहीं है, बत्तीसवीं आयत के अनुसार एक भी निर्दोष व्यक्ति की हत्या पूरी मानवता की हत्या है. आयत 107 के अनुसार तो हज़रत साहब का मकसद सिर्फ आदमियों का कल्याण नहीं बल्कि पूरी दुनिया के सभी जीव- जंतुओं और पेड़- पौधों की हिफ़ाजत है. हज़रत साहब पर अनेक कातिलाना हमले हुए, उन्हें परेशान एवं बेइज्जत करने की अनेक कोशिशें उनके जीवन काल में की गयीं , लेकिन उन्होंने सभी को माफ कर दिया और कभी भी कोई हिंसक प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की. हज़रत मोहम्मद साहब किसी भी धर्म के पूजा स्थल को जरा सा भी नुकसान पहुंचाने के सख्त खिलाफ थे.” जनाब मौलाना रशीद ने अपने फतवे में आगे कहा है कि इस्लाम ने हमेशा शांति और सामाजिक समरसता पर जोर दिया है, इसीलिये यदि कोई भी मुस्लिम...

आतंकवादियों के खिलाफ खुलकर खड़े हों समझदार मुस्लिम भाई

बनारस के संकटमोचन मंदिर की लोमहर्षक घटना के बाद लखनऊ की एक 400 साल पुरानी संस्था ‘दारुल इफ्ता फिरंगी महल’ ने उन आतंकवादियों के खिलाफ फ़तवा दिया जो पूजास्थलों पर हमले कर निर्दोष लोगों की हत्या कर देते हैं. बनारस एवं अन्य कुछ जगहों पर भी इसी प्रकार के फतवे दिये गये. लखनऊ ईदगाह के पूर्व इमाम और फिरंगी महल के प्रमुख मौलाना खालिद रशीद ने स्थानीय व्यापारी साजिद उमर के एक लिखित सवाल के जबाब में फ़तवा देते हुए कहा , “इस्लाम में आतंकवाद के लिये कोई जगह नहीं है, बत्तीसवीं आयत के अनुसार एक भी निर्दोष व्यक्ति की हत्या पूरी मानवता की हत्या है. आयत 107 के अनुसार तो हज़रत साहब का मकसद सिर्फ आदमियों का कल्याण नहीं बल्कि पूरी दुनिया के सभी जीव- जंतुओं और पेड़- पौधों की हिफ़ाजत है. हज़रत साहब पर अनेक कातिलाना हमले हुए, उन्हें परेशान एवं बेइज्जत करने की अनेक कोशिशें उनके जीवन काल में की गयीं , लेकिन उन्होंने सभी को माफ कर दिया और कभी भी कोई हिंसक प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की. हज़रत मोहम्मद साहब किसी भी धर्म के पूजा स्थल को जरा सा भी नुकसान पहुंचाने के सख्त खिलाफ थे.” जनाब मौलाना रशीद ने अपने फतवे में आगे कहा है ...

अपने अंदर भी एक दीप जलाओ

आलोक पर्व की मधुरिम बेला, मैंने कल रात एक छोटा सा दीप जलाया आशाओं की बाती को स्नेह से सराबोर कर मिट्टी की कटोरी में. नन्हा सा दीप टिमटिमा कर जल उठा, अमावस्या के अंधेरे की छाती को चीरकर. मैंने पूछा - नन्हें प्यारे दीप क्या तुम्हें जरा भी डर नहीं लगता ? रात का विकराल दानव तेजस्वी सूर्य को निगल जाता है तुम टिमटिमाते रहते हो, आलोक बिखेरते रहते हो. खिलखिलाया वह नन्हा दीप, चौंक कर, सहमकर छिटक गये कुछ शलभ वीणा के तारों को छेड़ दिया हो, जैसे कुछ नाजुक अंगुलियों ने. भय, विभ्रम, क्षोभ, असंतोष हैं कुछ लोगों के भाव, हैं बड़े लोगों के विकार, मुझे तो अपने धर्म से है काम मेरा धर्म है, प्रकाश बिखेरना. मैं बिखेरता हूं आलोक यही मेरा धर्म है, अंधकार से क्या वास्ता मैंने अंधकार को देखा ही नहीं कभी. सुना है कि अंधकार होता है तुम्हीं लोग कहते हो, बहुत विकराल और भयानक होता है पर मैंने तो कभी नहीं देखा. मेरी तो मुलाकात ही नहीं कभी अंधकार से. जिससे मुलाकात ही नहीं, उससे दुश्मनी कैसी? मैं अंधकार दूर नहीं करता मैं तो सिर्फ आलोक बिखेरता हूं. मुझे नहीं आक्रोश किसी पर. लाओ एक बोरी अंधकार उँडेल दो मुझ पर मैं फिर भी जल...

गांधी नहीं आयेंगे

आज पूरा देश विश्वास के संकट से गुजर रहा है. करोड़ो रुपयों के घोटालों ने हमारे लोकतंत्र के वटवृक्ष को जड़ों तक झकझोड़ दिया है. एक भी नेता ऐसा नहीं, जिसके बारे में आम जनता विश्वास के साथ कह सके कि वह पाक साफ है. हर्षद मेहता हो या जैन बंधु, जहां तक उनके मौखिक आरोपों का सवाल है – उनसे इस विशाल देश का प्रधानमंत्री भी नहीं बचा. सारे राजनीतिज्ञ एक-दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे हैं – एक दूसरे का चरित्र हनन करने के लिए सारे हथकंडे अपना रहे हैं. अपने को दूसरे से बड़ा सिद्ध करने की कोशिश में, दूसरे को छोटा साबित करने की प्रक्रिया चल रही है. बीरबल ने बादशाह अकबर द्वारा खींची लकीर को छोटा करने के लिए उसे मिटाया नहीं – बल्कि बगल में एक बड़ी लकीर खींच दी. सच्चा नेता वह है, जो अपने व्यक्तित्व को इतना ऊंचा उठाये, महान बनाये कि बाकी लोगों का कद अपने आप उससे नीचे हो जाये. लेकिन, यह रास्ता बहुत कठिन है, मशक्कत वाला है. बड़ा बनने के लिए मेहनत करनी होगी, कुछ रचनात्मक कार्य करने होंगे. मुश्किलें उठानी होंगी. समय भी बहुत लगेगा. दूसरे को नीचा दिखाना, उसे छोटा सिद्ध करना अधिक आसान और शॉर्टकट तरीका है. आज के नेताओं को यही शॉ...

कबीर को लालू की जरूरत नहीं

समाचार था कि अब कबीर के जन्मदिन पर लालू जी पूरे राज्य में छुट्टी की घोषणा करेंगे, चौराहों पर उनकी प्रतिमाएं स्थापित कराएंगे. उनका जन्मदिन निश्चित करने के लिए विद्वानों को लगा दिया गया है. इसके बाद शायद लालू जी कबीर दास को “भारत रत्न” दिलवाने की भी बातें करें. पूरे बिहार को जाति और वर्ग संघर्ष की आग में झोंक कर राजनीति की रोटियां सेंकने वाले लालू यादव को शायद ही कबीर का एक भी दोहा याद हो. जाति प्रथा और धार्मिक कठमूल्लों की धज्जियां उड़ाने वाले युगमानव कबीर के नाम का इस्तेमाल गंदी राजनीति के कूड़े-कचरे को सोना साबित करने के लिए करना, “जस की तस धर दीनी चदरिया” वाली विभूतियों अपमान है. यह बात सच है कि कबीर विगत कई वर्षों से सिर्फ पाठ्यपुस्तकों में प्रकाशित दोहों तक ही सीमित रह गये थे. यदि उन दोहों के आधार पर हमारा समाज अपने को जरा भी ढालने का प्रयास करता, तो शायद आज धरती पर स्वर्ग उतर आता, जहां “ढाई आखर प्रेम” की मंदाकिनी बहती. माला फेरत जुग गया, कहकर कबीर ने सभी धार्मिक ढोंगियों की बखिया उधेड़ दी. “ताते वह चक्की भली” और मुल्ला बांग दे कहने वाले कबीर को न तो हिंदुओं ने सहा और न मुसलमानो ने दु...

अच्छे काम की सराहना से भी परहेज!

मेरे एक प्रतिष्ठित चार्टर्ड एकाउंटेंट होने के साथ विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष पदों पर सुशोभित हैं. बातचीत के दौरान मैंने मदर टेरेसा के अवसान से उत्पन्न रिक्तता की ओर इशारा किया, तो उन्होंने कहा, “आपको मदर टेरेसा के संबंध में कुछ भी मालूम नहीं – उनके सारे सेवा कार्य तो सिर्फ एक उद्देश्य से संचालित थे कि किस प्रकार अधिकाधिक हिंदुओं को क्रिश्चियन बनाया जाये. यूरोपीय क्रिश्चियन देशों में उनकी मृत्यु पर शोक मनाने की बात तो स्वाभाविक लगती है, लेकिन हिन्दुस्तान में इतना अधिक विलाप एकदम अनावश्यक है और हमारी गुलाम मानसिकता का परिचायक है”. मैंने उनसे यही कहा कि गरीबों और अनाथों की सेवा में लगी कोई मदर टेरेसा हम हिंदू लोग क्यों नहीं पैदा कर पाये, जो अपने व्यक्तिगत सारे सुखों का त्याग करके गरीबों की सेवा में जुट जाये. पिछले हजारों वर्षों से हमने देश की बड़ी आबादी को धर्म के नाम पर गुलामों से भी बदतर जिंदगी नाली के कीड़ों की तरह जीने को मजबूर किया है. उन्हें अछूत घोषित कर उनकी छाया से बचना, कुओं-मंदिरों और सार्वजनिक स्थलों से उन्हें दूर रखना, उनसे बेगार कराना और उनकी बहु-बेटियों...

शेयर मार्केट: जुआ संस्कृति या कार्य संस्कृति

जुआघरों से ज्यादा खतरनाक है शेयर मार्केट : यूनिट ट्रस्ट एवं इसके यूनिटधारकों को हुए भयंकर नुकसान पर एक महीने तक भयंकर चिल्लपों मची-सदन में हंगामा हुआ, वित्त मंत्री के इस्तीफे की मांग हुई – एक दो गिरफ्तारियां हुईं और उसके बाद सब कुछ शांत हो गया. अखबारों से यूनिट ट्रस्ट का नाम ऐसे उड़नछू हुआ, जैसे गधे के सिर से सींग. यूनिट ट्रस्ट में हुए भयावह नुकसान को घोटाले का नाम देना, सच्चाई से मुंह मोड़ना है. शेयर बाजार विशुद्ध रूप से एक जुआघर है. चाहे कितने ही बड़े–बड़े फाइनेंस विशेषज्ञ इससे जुड़े हों – लाखों किताबें और पत्रिकाएं हों, पूरा डाटा बैंक बनाकर कम्पनियों की स्थिति का विश्लेषण अप टू डेट किया जा रहा हो, लेकिन जिस समय मंदी आती है, सारे शेयर औंधे मुंह नीचे गिर पड़ते हैं. जिस समय तेजी आती है, सभी शेयरों की कीमतों में गगनचुम्बी वृद्धि होने लगती है. जब भाव बढ़ते है – ये विशेषज्ञ अपनी भविष्यवाणियों की दुहाइयां देना शुरू कर देते हैं – मूंछ पर ताव देते हैं – और अधिक वृद्धि की बातें तर्क दे-देकर करने लगते हैं. नतीजा होता है कि शेयर धारक अपने शेयरों से चिपका रह जाता है – बेच ही नहीं पाता. अधिक लाभ पाने क...

महिला आरक्षण लागू कैसे होगा?

संसद एवं विधानसभाओं की सीटों पर महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण संबंधी बिल विवादों से घिर गया है. विरोध करने वालों का तर्क है कि इस आरक्षण का फायदा उन्नत और सम्पन्न घरों की महिलाओं को मिलेगा एवं दलित, पिछ्ड़ी जातियों तथा मुस्लिम महिलाओं को कोई भी लाभ नहीं होगा. उनके अनुसार इसीलिए बिल में दलित व अन्य कमजोर तबकों की महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण का प्रावधान होना चाहिए, यानी आरक्षण में आरक्षण को पूरा मजाक बनाकर रख दिया गया है. चलिये, थोड़ी देर के लिए मान लेते हैं कि विधायिका में महिलाओं के लिए आरक्षण की बात उचित और तर्कसंगत है. जब स्कूल-कॉलेजों की सीटों पर और नौकरी में भी उनके लिए आरक्षण है ही, तो इस आरक्षण को लागू करने में ही क्या हर्ज है? लेकिन, मेरी अल्प बुद्धि अभी तक यह नहीं समझ पायी है कि संसद एवं विधानसभाओं की सीटों पर महिलाओं के लिए आरक्षण का बिल यदि पारित हो भी गया, तो उसे लागू कैसे किया जाएगा? एक तरीका हो सकता है – कुछ चुनाव क्षेत्रों को महिला प्रत्याशियों के लिए ही आरक्षित कर देना, जिस प्रकार अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए है, लेकिन ये क्षेत्र कौन-कौन से होंगे, इसे किस आधार पर तय...

बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भारत को अपना चारागाह बना रही हैं

उदारीकरण के नाम पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिये जब दरवाजे खोले गये ,तो यही सपने दिखाये गये थे कि उनके क्रियाकलापों से देश में समृद्धि आयेगी क्योंकि प्रोफेशनल मैनेजमेंट एवं आधुनिकतम टेक्नोलॉजी के माध्यम से उत्पादकता बढ़ेगी, उत्पादों की गुणवत्ता विश्व स्तर की हो जायेगी, निर्यात कई गुना बढ़ जाने से देश का विदेशी मुद्रा-कोष लबालब भर जायेगा, और लोगों को नये रोजगार मिलेंगे जिससे उनका जीवन स्तर ऊपर उठ जायेगा. आम मान्यता यही है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के काम काज में देश के सभी कानूनों का पालन किया जाता है, नीति संहिता पर कड़ाई से अमल होता है और अकाउंट्स में पारदर्शिता रखी जाती है. यही कहा जाता रहा है कि इनकी तुलना में देशी कंपनियां तो बनियों के हाथ की कठपुतली हैं जिनके माध्यम से देशी मालिक अपने श्रमिकों का शोषण करते हैं, अकाउंट्स में हेराफेरी करके टैक्स की चोरी करते हैं, विभिन्न चालाकियों से अपनी तिजोरी को भरने के लिये कंपनी के शेयरधारकों को चूना लगाते हैं. इस बात में काफी सच्चाई तो है, लेकिन हाल के वर्षों में यह बात भी उभर कर सामने आयी है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दामन भी बेदाग नहीं हैं, ये ...

बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भारत को अपना चारागाह बना रही हैं

उदारीकरण के नाम पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिये जब दरवाजे खोले गये ,तो यही सपने दिखाये गये थे कि उनके क्रियाकलापों से देश में समृद्धि आयेगी क्योंकि प्रोफेशनल मैनेजमेंट एवं आधुनिकतम टेक्नोलॉजी के माध्यम से उत्पादकता बढ़ेगी, उत्पादों की गुणवत्ता विश्व स्तर की हो जायेगी, निर्यात कई गुना बढ़ जाने से देश का विदेशी मुद्रा-कोष लबालब भर जायेगा, और लोगों को नये रोजगार मिलेंगे जिससे उनका जीवन स्तर ऊपर उठ जायेगा. आम मान्यता यही है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के काम काज में देश के सभी कानूनों का पालन किया जाता है, नीति संहिता पर कड़ाई से अमल होता है और अकाउंट्स में पारदर्शिता रखी जाती है. यही कहा जाता रहा है कि इनकी तुलना में देशी कंपनियां तो बनियों के हाथ की कठपुतली हैं जिनके माध्यम से देशी मालिक अपने श्रमिकों का शोषण करते हैं, अकाउंट्स में हेराफेरी करके टैक्स की चोरी करते हैं, विभिन्न चालाकियों से अपनी तिजोरी को भरने के लिये कंपनी के शेयरधारकों को चूना लगाते हैं. इस बात में काफी सच्चाई तो है, लेकिन हाल के वर्षों में यह बात भी उभर कर सामने आयी है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दामन भी बेदाग नहीं हैं, ये ...

खुलकर सामने आइये बाबा रामदेवजी !

बाबा रामदेव लोकप्रियता के अंतिम शिखर पर पहुंचने को ही थे कि उनके अत्यधिक आत्मविश्वास ने उन्हें भटका दिया. स्वस्थ जीवन जीने की कला सिखाते-सिखाते कब वे उपदेशक बन गये उन्हें भी पता न होगा.चुनावों के इस मौसम में भारत स्वाभिमान जागरण अभियान छेड़कर और स्विस बैकों में जमा धनराशि वापस लाने की बातें करके उन्होंने अपनी सर्वाधिक महत्वपूर्ण पूंजी “निष्पक्षता “ को खो दिया है. सुनने में दोनों ही बातें अच्छी लगती हैं, आम आदमी तो उनकी बातों में भी आ जाएगा, लाखों वोट भी इधर उधर हो जाएंगे. विडंबना कि आज भी वे स्वयं को निष्पक्ष कहते हैं, लेकिन कोई व्यक्ति यदि ध्यान से सुने तो उनके अभियान का “गुप्त मकसद” स्पष्ट होकर सामने आ जाएगा. पहले वे बताते हैं कि इतने लाख करोड़ रुपए स्विस बैकों में भ्रष्ट भारतीयों ने जमा कर रखे हैं, यदि सब रुपए वापस आ जाएं और बांट दिये जाएं तो हर परिवार को लगभग तीन लाख रुपए मिल जाएंगे, हर गांव के विकास के लिये कई करोड़ रुपए उपलब्ध हो जाएंगे. आगे बढ़ते हुए वे कहते हैं कि जो पार्टी यह धन वापस लाने का वायदा करे, उसे ही वोट देना चाहिए. अपनी झूठी निष्पक्षता दिखाने के लिये पार्टी का नाम वे नही...

विश्वास जीवन का आधार, अंध-विश्वास सबकुछ बंटाधार

हमारे जीवन में जब तक सब कुछ ठीक चलता रहता है, स्वयं पर हमारा विश्वास बना रहता है. जैसे ही परेशानियां आनी शुरू होती हैं हमारा अपना विश्वास डगमगाने लगता है और हम किसी सहारे की तलाश करने लगते हैं. ये परेशानियां बीमारियों के रूप में, दुर्घटनाओं के रूप में या आर्थिक नुकसान के रूप में सामने आती हैं और उनसे निपटने के लिये हमारे शुभचिंतक हमें किसी तांत्रिक से, ज्योतिषी से , ओझा से संपर्क करने को कहते हैं, या फिर किसी विशेष मंदिर में जाने को, या फिर कोई व्रत-उपवास या अनुष्ठान करने या मनौती मानने की सलाह देते हैं. हम मानकर सब-कुछ कर भी लेते हैं. 50% सफल हो जाते हैं, 50% नहीं भी होते. यदि ये सब तरीके न आजमाते तो भी नतीजा यही होता. भगवान में, धर्म में, बुजुर्गों में एवं धर्मगुरुओं में श्रद्धा एवं विश्वास जरूरी होते हैं, लेकिन बिना तर्क की कसौटी पर कसे उनकी बातों को मान लेना हमारे लिये घातक है जबकि हम जानते हैं कि आज के हिसाब से उनका ज्ञान बहुत कम है. जहां नैतिकता और अनैतिकता में फर्क करना है, वहां तो उनकी बातें ठीक होंगी, लेकिन बाकी मामलों में उनके ठीक होने की कोई गारंटी नहीं. कुछ प्रश्न मन में जब...

विरोधाभासों के युग में जीने को अभिशप्त हम सब

प्राकृतिक चुनौतियों से हारना आदमी को कभी बर्दाश्त नहीं रहा, इसीलिये लगातार संघर्षकर उसने सुख और सुरक्षा के अनगिनत साधन जुटा दिये हैं, मनोरंजन की तो परिभाषा ही बदल दी है. बैठे- बैठे एक बटन दबाइये, मनचाहा मनोरंजन आपके सामने हाजिर है. आज के आदमी की क्षमता मशीनों की मदद से असीम हो गयी है, लेकिन इन सब सुख- सुविधाओं एवं उपलब्धियों की बहुत बड़ी कीमत उसे चुकानी पड़ी है. आज व्यक्ति के निजी जीवन में, पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय जीवन में विरोधाभास ही विरोधाभास भर गया है. मेरे पास अंग्रेजी में एक ईमेल आया जिसमें आज के अनेक विरोधाभासों का बहुत सुंदर उल्लेख था, वाकई आज हम विरोधाभासों के युग में जी रहे हैं. शायद हम दोराहे पर खड़े हैं जहां एक ओर अंधविश्वास और धार्मिक कर्मकांडों की बेड़ियों को तोड़ नहीं पा रहे, दूसरी ओर वैज्ञानिक विचारधारा को भी पूरे मन से नहीं अपना पा रहे. हमारे पास उच्च शिक्षा की डिग्रियां अधिक हो गयी हैं, लेकिन कॉमन सेंस कम हो गया है. हमारा ज्ञान बढ़ गया है, पर विवेक कम हो गया है. आज अधिक उन्नत दवाएं हैं, लेकिन हम पहले से कम स्वस्थ हैं. हमने अपनी जिन्दगी में अनेक वर्...

गठरी बनकर अपमानित होने को अभिशप्त तिरंगा

15 अगस्त और 26 जनवरी - इन दोनों राष्ट्रीय दिवसों पर आयोजित समारोहों का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य होता है ध्वजारोहण. एक दिन पहले संदूक में बंद तिरंगा बाहर निकाला जाता है, झाड़ पोंछकर, इस्त्री करके अलग से रख दिया जाता है. फिर डंडे की खोज होती है, रस्सी ढूंढ़ी जाती है और तलाश होती है ऐसे व्यक्ति की जो झंडे की रस्सी में सही गांठ लगाना जानता हो. अगले दिन सुबह- सुबह बांस या पोल को एक निश्चित जगह पर खड़ा कर दिया जाता है. तिरंगे की गठरी बनाकर उसके अंदर फूल या फिर चमकीले रंग बिरंगे कागजों के टुकड़े भर दिये जाते हैं, तिरंगे की पोटली डंडे के शीर्ष पर रस्सी के सहारे बांध दी जाती है. निश्चित समय पर नेताजी आकर सीधे झंडे के पास जाते हैं, आयोजक उन्हें रस्सी का सही सिरा पकड़ाते हैं, नेताजी उसे झटके से खींच देते हैं. आयोजकों की किस्मत ठीक रही, तो एक ही झटके में तिरंगे की पोटली खुल जाती है, फूल झरने लगते हैं, मुड़ा- तुड़ा, सलवटो से भरा तिरंगा पहले तो सहमा हुआ सा, मायूस दिखलाई पड़ता नीचे लटक जाता है. फिर जब कुछ हवा चलती है, तब वह लड़खड़ाता सा फहराने लगता है. पोल के ऊपर गठरी या पोटली बनकर लटक रहे तिरंगे की दयनीय स्थ...

थोड़ी आंच बनी रहने दो, थोड़ा धुआँ निकलने दो

इस्लामी दहशतगर्दों ने इस विशाल भारत देश के विभिन्न हिस्सों में बार-बार अपनी हिंसक घिनौनी हरकतों से यही कोशिश की है कि हिंदू-मुस्लिम दंगे भड़कें, मुस्लिम बड़ी संख्या में मारे जाएं, ताकि दुनिया के तमाम मुस्लिम देशों को भारत के खिलाफ एकजुट किया जा सके. दंगे तो नहीं हुए, लेकिन इन आतंकवादियों के खिलाफ भारतीय मुसलमानों की चुप्पी से जनमानस में आशंका गहराने लगी कि स्थानीय मुसलमानों के सहयोग एवं स्वीकृति से ही ये आतंकवादी इतने बड़े हादसे करने में कामयाब हो पाते हैं. आग तो बुझी रही, लेकिन अंगारों पर घी पड़ता रहा. निदा फाज़ली को भी बहुत ही दर्दभरे शब्दों में लिखना पड़ा– उठ-उठ के मस्जिदों से नमाज़ी चले गये, दहशतगरों के हाथ में इस्लाम रह गया. और, अचानक हुआ मुंबई का हादसा, सैकड़ों लोग मरे, हिंदू-मुस्लिम खून साथ- साथ बहे एवं एक साथ उबले. मुंबई के मुसलमानों ने एलान कर दिया कि मारे गए नौ दहशतगर्दों में से किसीको भी मुस्लिम कब्रिस्तान में दफनाने नहीं दिया जाएगा. देश के अन्य शहरों में भी मुस्लिम संस्थाओं ने इनके खिलाफ जुलूस निकाले, नारे लगाए. दिल्ली के शाही इमाम ने कहा कि यह जेहाद नहीं जघन्य अपराध है, उन्होंने भ...