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अच्छा लगा मुस्लिम आतंकवादियों के खिलाफ एक इस्लामिक फ़तवा

खबर है कि लखनऊ की एक 400 साल पुरानी संस्था ‘दारुल इफ्ता फिरंगी महल’ ने सोमवार को उन आतंकवादियों के खिलाफ फ़तवा दिया है जो पूजास्थलों पर हमले कर निर्दोष लोगों की हत्या कर देते हैं.
लखनऊ ईदगाह के पूर्व इमाम और फिरंगी महल के प्रमुख मौलाना खालिद रशीद ने स्थानीय व्यापारी साजिद उमर के एक लिखित सवाल के जबाब में फ़तवा देते हुए कहा , “इस्लाम में आतंकवाद के लिये कोई जगह नहीं है, बत्तीसवीं आयत के अनुसार एक भी निर्दोष व्यक्ति की हत्या पूरी मानवता की हत्या है. आयत 107 के अनुसार तो हज़रत साहब का मकसद सिर्फ आदमियों का कल्याण नहीं बल्कि पूरी दुनिया के सभी जीव- जंतुओं और पेड़- पौधों की हिफ़ाजत है. हज़रत साहब पर अनेक कातिलाना हमले हुए, उन्हें परेशान एवं बेइज्जत करने की अनेक कोशिशें उनके जीवन काल में की गयीं , लेकिन उन्होंने सभी को माफ कर दिया और कभी भी कोई हिंसक प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की. हज़रत मोहम्मद साहब किसी भी धर्म के पूजा स्थल को जरा सा भी नुकसान पहुंचाने के सख्त खिलाफ थे.” जनाब मौलाना रशीद ने अपने फतवे में आगे कहा है कि इस्लाम ने हमेशा शांति और सामाजिक समरसता पर जोर दिया है, इसीलिये यदि कोई भी मुस्लिम किसी के पूजा स्थल को जरा भी नुकसान पहुंचाता है या, बेगुनाह लोगों की हत्या करता है तो इस्लाम की नज़र में वह सबसे खराब किस्म का गुनाह होगा और शरीयत इसे पूरी तौर पर गैर कानूनी मानेगा.
प्रभात खबर के प्रथम पृष्ठ पर एक दिन डॉ शाहिद हुसैन एवं दूसरे दिन डॉ जावेद अख्तर के लेख पढ़कर अच्छा लगा, इन्होंने बनारस कांड की भर्त्सना खुलकर की. वैसे भी ये दोनों महानुभाव अपने सुलझे एवं प्रगतिशील विचारों के लिये जाने जाते हैं. फिर भी, आतंकवादियों की निन्दा के लिये कुछ तो हिम्मत चाहिये ही. लेकिन अफसोस यह देखकर होता है कि पूरे देश के 20 करोड़ मुस्लिम बन्धुओं में ऐसे लोगों को उँगलियों पर गिना जा सकता है. अच्छा लगा यह पढ़कर कि बनारस की मुस्लिम महिलाओं ने एक जुलूस निकाला, इनके हाथों की तख्तियों में लिखा हुआ था “आतंकवादियों, अल्लाह तुम्हें माफ नहीं करेगा”. 91 वर्षीय शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खान 150 मुस्लिम युवाओं को साथ लेकर अस्पताल में गये जहां युवाओं ने घायलों के लिये रक्तदान किया. लेकिन साथ ही बुरा भी लगा, दूसरे शहरों में न तो कोई जुलूस निकला और न ही बड़े स्तर पर महत्वपूर्ण लोगों ने इसकी निन्दा की. और भी बुरी बात होगी यदि इस तरह की खबरों को मीडिया कोई खास महत्व न दे.
अभी कुछ ही दिन पहले हजारों मील दूर के देश की एक बहुत कम पढ़ी जानेवाली पत्रिका में पैगम्बर साहब के कार्टून छपने के विरोध में राँची के मुस्लिम भाइयों का सैलाब सड़कों पर उतर आया था, गनीमत है कि भीड़ हिंसक नहीं हुई. दूसरे शहरों में तो मुस्लिम भाइयों ने तोड़फोड़ एवं लूटपाट कर अपना आक्रोश जाहिर किया. पैगंबर साहब के कार्टून बनाने और छापनेवालों के खिलाफ अनेक जगहों पर फ़तवे जारी हो गये, पूरी दुनिया में विरोध प्रदर्शन कर रही भीड़ ने सैकड़ों निर्दोष लोगों की जान ले ली. संकटमोचन मंदिर में ज़ेहाद के नामपर आतंकवादियों ने बम-विस्फोट कर अनेक मासूम लोगों की जान ले ली और सैकड़ों लोगों को हताहत कर दिया, अपने को अल्लाह के नेक बंदे कहलानेवालों के अंदर उन निर्दोष मृतकों के प्रति क्या मन में थोड़ी भी दया नहीं आयी? इन आतंकवादियों के खिलाफ खुदा के बंदों के द्वारा विरोध प्रदर्शन क्यों नहीं किया गया, फतवे जारी क्यों नहीं किये गये? बड़े स्तर पर विरोध की बात छोड़ भी दें तो छोटे छोटे जुलूस निकालकर हर शहर और कस्बे में ऐसी घटनाओं की निन्दा क्यों नहीं की जाती? बृहद समाज इस चुप्पी को इन कुकृत्यों का समर्थन मान लेता है और यहीं से वैमनस्यता शुरू होती है, गंगा- जमुनी संस्कृति के दोनों पाट अलग होने लगते हैं. ठीक है, इन मारे गये काफिरों के लिये आपका मन नहीं रोता, दूसरे धर्मों के धार्मिक स्थलों को अपवित्र कर, उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचाकर, उनके देवताओं को अपमानित करने में ही अपने धर्म की सुरक्षा और विकास नजर आते हों, लेकिन दिखावे के लिये भी तो कुछ निन्दा ऐसे कुकृत्यों की कर ही देनी चाहिये.
इंदिराजी की हत्यावाली शाम को यदि मिठाइयाँ बांटने और आतिशबाजी करने से परहेज कर सिख भाइयों ने हत्यारों की भर्त्सना करते हुए शहरों और कस्बों में छोटे छोटे जुलूस भी निकाल दिये होते, तो दूसरे एवं बाद के दिनों में होनेवाली उन लोमहर्षक घटनाओं से बचा जा सकता था जो इस देश के इतिहास का काला पन्ना बन गयीं और जिन्हें खास तौर से हिंदू भूलना चाहेंगे. लगातार कई वर्षों से भिंडरावाला के खालिस्तानी साथियों के द्वारा चुन-चुन कर हिंदुओं की हत्या से आहत हिंदू मानस विश्वासघाती सिख अंगरक्षकों के द्वारा इंदिराजी की हत्या और उसके बाद सिख भाइयों के द्वारा मनाई जा रही खुशियों की प्रतिक्रिया में ज्वालामुखी बन फूट पड़ा. बाद में भले ही इसे कॉग्रेसियों का जुनून करार दिया गया हो, पर यह कड़वी सच्चाई है कि उस दिन आम हिंदू पागल हो गया था और मेरे जैसे लोगों का मन चीत्कार कर रहा था, अपने सिख भाइयों के लिये कुछ न कर पाने की बेबसी पर रो रहा था.
मुस्लिम संगठनों क़ॆ मौलाना, इमामों एवं प्रभावशाली लोगों से अपील है कि अब चुप रहने का वक्त नहीं, आतंकवादियों से डरकर बैठने का समय नहीं, आगे बढ़िये और अपने मन की बातें खुलकर कहिये. आज पूरी दुनिया मुस्लिम आतंकवादियों से त्रस्त है. सही या गलत, हर गैरमुस्लिम के मन में यह बात घर कर गयी है कि इस्लाम सिर्फ खून-खराबे वाला धर्म है, संकीर्ण विचारवालों का धर्म है, हर प्रकार के परिवर्तन का विरोधी धर्म है, गैरमुस्लिमों से नफ़रत करनेवाला धर्म है. मुस्लिम उलेमाओं से निवेदन है- पवित्र कुरान की किसी भी आयत की अनेक व्याख्यायें हो सकती हैं, होने दें, फिर विचार विमर्श कर इस्लाम की सही व्याख्या पेश करें. दहशत से नहीं, बल्कि इस्लाम की अच्छाइयों से दुनिया को प्रभावित करें. आज, इस्लाम को किसी दूसरे से खतरा नहीं, बल्कि तथाकथित कट्टरपंथियों के द्वारा की जा रही गलत व्याख्या से है. यदि जरा-जरा सी बातों से इस्लाम जैसे महान धर्म को खतरा होने की जरा भी गुंजाइश होती तो अपने ऊपर रोज कूड़ा फेंकनेवाली महिला के बीमार पड़ने पर उसकी सेवाकर चंगा करने का काम हजरत साहब हरगिज न करते , उसे खरी खोटी सुनाते या उसका कत्ल ही करवा देते. बुश जैसे लोग तो आते-जाते रहते हैं, ये आतंकवादी अपनी गतिविधियों से बुश जैसे लोगों के ही हाथ मजबूत करते हैं और इस्लाम के प्रति दुनिया की गलतफहमी को और पक्का कर देते हैं. खुदा के नेक मुस्लिम बंदों से हम सभी उदारवादी मानवधर्मियों की अपील है कि वे इस गलतफहमी को दूर करने के लिये निडरता से आतंकवादियों के गलत कामों की निंदा करें, हजरत साहब के नेक कामों और विचारों की खुलकर चर्चा करें, दूसरे धर्मों के अनुयाइयों को भी उचित प्यार और सम्मान दें.

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