आज चारों ओर गुंडागर्दी, लूटपाट, अपहरण और हत्याओं का बोलबाला है. हिंसा हो रही है, नैतिक मूल्यों में भयंकर ह्रास हो चुका है. मधुर पारस्परिक सम्बंधों पर आधारित पारम्परिक सामाजिक ढांचा चरमरा रहा है, हम सिर्फ एक-दूसरे का इस्तेमाल कर रहे हैं. घूस और पैरवी को सामाजिक मान्यता मिल गयी है और भ्रष्ट्राचारियों को सम्मानित स्थान. हम अपनी संस्कृति की अच्छी बातों को दकियानूसी करार देकर पाश्चात्य अपसंस्कृति के कचरे को बहुमूल्य सोने की तरह एकत्र करने में लगे हैं. नग्नता और अश्लीलता की परिभाषाएं बदल गयी हैं. यहां प्रश्न उठता है कि हमारे इस भयंकर पतन के लिए कौन जिम्मेवार है – फिल्में, टेलीविजन या पत्र-पत्रिकाएं? या इनमें से कोई भी नहीं? साहित्य को, कला को समाज का दर्पण मानने वाले यही दलील देंगे कि हमारे ये सूचना माध्यम समाज के यथार्थ को ही तो चित्रित करते हैं, उनका क्या दोष? कला तो भोगा हुआ यथार्थ ही है. जैसा समाज होगा वैसा ही रूप मुखरित होगा. दूसरे लोग कहेंगे कि समाज पर साहित्य और कला का ही गहरा प्रभाव पड़ता है. हमारे साहित्यकार, पत्रकार, फिल्मी कलाकार या टीवी आर्टिस्ट जो कुछ भी परोसते है, उसी से समाज के...
कुछ कहने की इच्छा, कुछ सुनने का मन - Prabhakar Agrawal