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समाज में विकृतियों के लिए दोषी कौन?

आज चारों ओर गुंडागर्दी, लूटपाट, अपहरण और हत्याओं का बोलबाला है. हिंसा हो रही है, नैतिक मूल्यों में भयंकर ह्रास हो चुका है. मधुर पारस्परिक सम्बंधों पर आधारित पारम्परिक सामाजिक ढांचा चरमरा रहा है, हम सिर्फ एक-दूसरे का इस्तेमाल कर रहे हैं. घूस और पैरवी को सामाजिक मान्यता मिल गयी है और भ्रष्ट्राचारियों को सम्मानित स्थान. हम अपनी संस्कृति की अच्छी बातों को दकियानूसी करार देकर पाश्चात्य अपसंस्कृति के कचरे को बहुमूल्य सोने की तरह एकत्र करने में लगे हैं. नग्नता और अश्लीलता की परिभाषाएं बदल गयी हैं. यहां प्रश्न उठता है कि हमारे इस भयंकर पतन के लिए कौन जिम्मेवार है – फिल्में, टेलीविजन या पत्र-पत्रिकाएं? या इनमें से कोई भी नहीं? साहित्य को, कला को समाज का दर्पण मानने वाले यही दलील देंगे कि हमारे ये सूचना माध्यम समाज के यथार्थ को ही तो चित्रित करते हैं, उनका क्या दोष? कला तो भोगा हुआ यथार्थ ही है. जैसा समाज होगा वैसा ही रूप मुखरित होगा. दूसरे लोग कहेंगे कि समाज पर साहित्य और कला का ही गहरा प्रभाव पड़ता है. हमारे साहित्यकार, पत्रकार, फिल्मी कलाकार या टीवी आर्टिस्ट जो कुछ भी परोसते है, उसी से समाज के...

इनकी समाज सेवा महज़ फैशन तो नहीं !

लगभग पांच साल पहले एक स्थानीय क्लब के सदस्यों के साथ अनगड़ा ब्लॉक के एक गांव में जाने का मौका मिला. बीस- पचीस लोग रहे होंगे, एक ट्रेकर पर बड़े बड़े कड़ाहे और पतीले लादे गये, चावल –दाल एवं सब्जियों के कुछ बोरे भी चढ़ाए गये, बीस –पचीस किलोमीटर के बाद मुड़े तो तीन चार किलोमीटर कच्ची सड़क मिली, फिर एक स्कूल आया जहां सभी बच्चे इकठ्ठे होकर हमारा इंतजार कर रहे थे. कुछ गांव वाले भी मौजूद थे. इसके बाद तो हम लोगों के चार-पांच घंटे वहां कैसे कट गये पता भी नहीं लगा. बच्चों के बीच हमने कई मनोरंजक, कई शिक्षाप्रद, कुछ शारीरिक कौशल की प्रतियोगिताएं कराईं और अच्छा प्रदर्शन करनेवाले बच्चों को पुरस्कृत भी किया गया. इसी बीच में किसी ने पुकार लगाई कि चलो भाई खाना तैयार. पत्तलें बिछ गयीं, बच्चों को खिलाया गया, दाल-भात-सब्जी और सलाद, साथ में खीर भी. उसके बाद हमलोगों की बारी आई, भूख जोरों से लगी थी पेट में चूहे “लांग जंप, हाई जंप और न जाने कौन कौन सा जंप” कर रहे थे. पत्तल में स्टीमिंग राइस परोसा गया, ऊपर से चने की दाल और आलू-परवल की रसेदार सब्जी, साथ में टमाटर की मीठी पंचफोड़न वाली चटनी, तले हुए पापड़ और प्याज-मूली का...

आधुनिक भारतीय नारी : कितनी वर्जनाएं, कितने बंधन ?

एक वकील साहब हैं. वकालत उनकी न पहले चलती थी और न अब चलती है. वकील होने के नाते झूठी प्रतिष्ठा बनानी पड़ती है. आमदनी कम और खर्च अधिक. शौक में आकर शादी कर ली. नई-नई पत्नी के सामने बड़ी डींग मारते- अपने और अपने परिवार के बारे में. शादी से पहले मित्र मंडली में नारियों के लिए समाज में पूरी स्वंतत्रता की वकालत किया करते थे पर जब अपनी बारी आई तो मैदान छोड़ते नजर आए. पत्नी की एम. ए. करने की ख्वाहिश थी, पर टाल गए. बोले, “एम. ए. कर के क्या करोगी, नौकरी तो मुझे करानी नहीं है.” छ: सात साल बीत गए. बच्चे स्कूल जाने लगे, चीजों के दामों में आग लग गई और परिवार की गाड़ी घिसटती नजर आई. पत्नी ने परिस्थितियों का तकाजा महसूस किया. एक प्राइमरी स्कूल में उसे शिक्षिका की नौकरी मिली. एम. ए. न करना खलने लगा. खैर, आर्थिक विपान्नता दूर हुई और कुछ वर्ष निकल गए. शुरु-शुरु में तो वकील साहिब काफी खुश रहे, पर धीरे-धीरे उन के अंदर शक और शंका के बादल मंडराने लगे. शाम को स्कूल से लौटने में पत्नी को जरा भी देर हो जाती तो उन का मुंह फूल जाता. बात-बात पर वह पत्नी के द्वारा अपनी उपेक्षा महसूस करते. दिन भर काम कर के आई पत्नी की थक...

संविधान की मूल भावना से दूर हटता आरक्षण का स्वरूप

भारत का मूल संविधान हर प्रदेश, क्षेत्र, धर्म, जाति, एवं समुदाय से आए लोगों के गहन विचार- मंथन के बाद निकला अमृतघट था जिसमें बार बार विभिन्न संशोधनॉं के विषाणुओं यानि वायरसों का प्रवेश कराया गया. संविधान की खास बात थी अनुसूचित जातियों के लिये 15% आरक्षण का प्रावधान करके पूर्वजों के पापों का प्रायश्चित करने की कोशिश. अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों को जो आरक्षण मूल संविधान में दिया गया वह तो वाजिब था, पर संशोधनों के रास्ते आए सारे आरक्षण नाजायज और भविष्य में बड़े फसाद की जड़ हैं अनुसूचित जातियों में ऐसे लोग शामिल किये गये जो हजारॉ सालों से अछूत और निकृष्ट समझे जाते थे, जिन्हें गांव के सार्वजनिक कूओं से पानी तक भरने नहीं दिया जाता था, स्कूलों व मंदिरों में प्रवेश वर्जित था, जिनकी परछाईं भी छू जाने से लोग दुबारा नहाते थे लेकिन जिनकी कन्याओं और नवविवाहित बहुओं को रात में उठवा मंगाकर जबर्दस्ती भोगने में कोई ऐतराज नहीं होता था, जिनसे मारपीटकर बेगार कराया जाता था एवं तथाकथित उच्च जातिवालों के सामने बैठ जाना बहुत बड़ा गुनाह माना जाता था. शिक्षा एवं पूंजी के अभाव में वे इस नारकीय चक्रव्यूह...