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किसने तोडा बेहतर राँची का सपना ?

किसी भी राजधानी की अपनी जरूरतें होती हैं, पूरे राज्य का प्रशासन वहीं से होता है, नीतियां वहीं बनती हैं, सारे मंत्रालय और सचिवालय वहीं होते हैं, बडी बडी कंपनियों के दफ्तर वहीं होते हैं, राज्य के दूसरे जिलों से अपना काम लेकर आने वालों की भीड दिन में तो बेइन्तिहा बढती ही है और रात में भी रुककर दूसरे दिन काम करने वालों की संख्या काफी होती है. राजधानी में दिन की इसी बढी आबादी के कारण आम नगरों से अधिक सशक्त सुविधाओं की जरूरत होती है. राजधानी की तुलना अन्य आम नगरों से नहीं की जा सकती. किसी भी राज्य की राजधानी में ही शिक्षा एवं स्वास्थ्य की बेहतरीन सुविधाएं अपेक्षित रहती हैं. इतने बड़े-बड़े कार्यालयों में सारे काम सुचारू रूप से चलें , इसी के लिये जरूरी है कि राजधानी में बिजली, पानी, सडकें, ट्रैफिक, विधि-व्यवस्था, अस्पताल, साहित्य-कला-संस्कृति-संगीत, स्कूल-कॉलेज, खेल-कूद, और मनोरंजन आदि की सुविधाएं उच्च स्तर की हों. रांची का राजधानी के रूप में विकास की कौन कहे, इसका तो सामान्य नगर के रूप में भी विकास अभी तक प्रतीक्षित है. ग्रेटर रांची, रिंग रोड और फ्लाइ ओवरों के शिगूफे टांय टांय फिस्स हो गये, ट्र...

चलते हैं नये सप्लायर छब्बे बनने, दूबे बनकर लौटते हैं

नवोदित राज्य झारखंड में नये –नये युवा सप्लायरों की भरमार हो गयी है, कुछ तो बेरोजगारी के कारण और कुछ इस भ्रम में कि सरकारी सप्लाई में बहुत फायदा है. कोटेशन मांगने की त्रुटिपूर्ण पद्धति के कारण भी हर बार अनेक सप्लायर मैदान में उतरते हैं और अपने हाथ जला बैठते हैं. विभागों के कर्मचारी ही अपने चहेतों को खबर कर देते हैं कि उनके विभाग में एक बड़ा टेंडर निकलनेवाला है और वे अपने लिये ऑफिस के अलावे भी कमीशन पहले से ही तय कर लेते हैं. कुछ नये रंगरूट तो अखबारों में टेंडर के विज्ञापन देखकर अपना भाग्य आजमाने निकल पड़ते हैं. हर बार कुछ नये आपूर्तिकर्ता काम करने के लोभ में कम से कम दर का कोटेशन दे देते हैं, उन्हें न तो माल की क्वालिटी की जानकारी होती है और न विभाग में दिये जानेवाले कमीशन की. अखबार में उसने पढ़ लिया कि अमुक विभाग में 15 फुट लंबी और 12 फीट चौड़ी दरियां सप्लाई करनी हैं, उसने सुन रखा है कि सप्लाई में बहुत फायदा होता है. बस निकल पड़ा बाजार में और दरी बेचनेवालों से उसने उनके रेट ले लिये, दरी की मोटाई, वजन और धागों की क्वालिटी का न तो उसे ज्ञान है और न उसने जानने की ही कोशिश की क्योंकि उसे पता है...

सरकारी खरीद में धांधली कम हो सकती है, यदि....

इस बात से शायद ही किसी को इंकार हो कि कुछ भी खरीदते समय तीन बातों को प्राथमिकता दी जानी चाहिये – माल की कम से कम कीमत हो, उचित अच्छी क्वालिटी मिले और समय पर डिलीवरी हो. सरकारी खरीद में भी यही तीन बातें लागू होती हैं. इसके लिये खरीददार विभाग के द्वारा आपूर्तिकर्ताओं के कोटेशन आमंत्रित किये जाते हैं और प्राप्त निविदाओं में दी गयी दरों और स्पेसिफिकेशन की तुलना की जाती है, कभी माल के सैंपुल भी मंगा लिये जाते हैं. नियमानुसार विभागाध्यक्ष को अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए उपरोक्त तीनों प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए सही आपूर्तिकर्ता को माल आपूर्ति करने का आदेश जारी करना चाहिये. जरूरी नहीं कि वह सबसे कम दर देनेवाले सप्लायर को ही आपूर्ति आदेश दे, लेकिन अधिकांश पदाधिकारी बाद में उठने वाले घोटाले संबंधी शोरगुल और अपने ऊपर लगनेवाले आरोपों से बचने के लिये सबसे कम दर वालों को ही आपूर्ति आदेश दे देते हैं. वे सोचते हैं कि ऐसा करके वे बहुत साफ सुथरी प्रक्रिया अपना रहे हैं, लेकिन होता उलटा है. जाने-अनजाने इसी प्रक्रिया में स्वतः कई घपले हो जाते हैं और उनके विभाग को भयंकर नुकसान पहुंचता है. आइये एक...

क्यों होती है हर वर्ष यह मार्च – लूट ?

मार्च का महीना आया और मार्च लूट की चर्चा शुरू हो गयी. जबसे होश सँभाला मार्च लूट देखता और सुनता आ रहा हूँ. अखंड बिहार में तो यह रोग़ बेरोकटोक चलता रहा, झारखंड में भी जारी है, दूसरे सभी राज्यों में भी कमोबेश यह बीमारी मौजूद ही है. अंग्रेजी सुशासन की देन ही लगती है. हाल- हाल में मैने एक उच्च वित्तीय सरकारी पदाधिकारी से ‘मार्च लूट’ को परिभाषित करने को कहा. पहले तो वे हिचकिचाए, फिर उन्होंने कारण गिनाने शुरू किये, अंत में उन्होंने कहा कि मार्च महीने में विभिन्न विभागों को माल खरीदने या कोई निर्माण कराने के लिये जब ऊपर से कोई धन -आवंटन आता है, तो समयाभाव के बावजूद गलत और दोषपूर्ण तरीके से क्रय या निर्माण की प्रक्रिया को पूरा करने की कोशिश से भ्रष्टाचार के अनेक अवसर उत्पन्न होते हैं , आपूर्तिकर्ताओं, ठेकेदारों, अफसरों एवं कर्मचारियों के द्वारा उन्हे भुनाने की प्रक्रिया को ही ‘मार्च लूट’ का नाम दिया जा सकता है. मुझे यह परिभाषा सटीक लगी. राज्य के विभिन्न विभागों के द्वारा अगले वित्तीय वर्ष में किये जानेवाले खर्चों का बजट लगभग मार्च महीने में ही असेंबली में पारित हो जाता है, विभिन्न मदों में धन का...

क्या इस वर्ष भी होगी मार्च-लूट ?

हर वर्ष मार्च के महीने में सरकारी हाकिम और उनके कर्मचारी देर रात तक अपने दफ्तरों में काम करते नजर आयेंगे, बिजली चली गयी, कोई बात नहीं , मोमबत्ती और लालटेन की रोशनी से ही काम चल जायेगा. ठेकेदारों और आपूर्तिकर्ताओं की फौज बाहर से लेकर अन्दर, हर कमरे तक मुश्तैद नजर आती है. समोसे कचौड़ियाँ और मिठाइयों के अलावे चाय की चुस्कियों, पान की गिल्लौरियों और खैनी की फटकियों के बीच साहब बहादुर एक के बाद एक कागज और बिल पर हस्ताक्षर करते जाते हैं. किसी भी विभाग का सबडिवीजन दफ्तर हो या सेक्रेटैरियेट का सर्वोच्च चैंबर – हर जगह कुछ ऐसा ही समाँ देखकर यही सवाल उठने लगता है कि इतनी चुस्ती फुर्ती इन हाकिमों में इसी महीने में क्यों आ जाती है, सारा विकास कार्य इसी महीने में क्यों होता है. एक- एक टेबुल पर महीनों धूल फाँकने को अभिशप्त फाइलों को भी मानो पंख लग जाते हैं, महीनों में तय होनेवाला सफर मिनटों में पूरा होने लगता है. इन अफसरों और कर्मचारियों को जेट स्पीड से काम करते देख लालफीताशाही की बातें झूठी लगने लगती हैं. चपरासी से लेकर बड़े हाकिम तक, हर एक को दम मारने की फुर्सत नहीं होती. रात को ग्यारह - बारह दफ्तर म...

पहले गांवों की सुधि लीजिए मुख्यमंत्रीजी

खबर थी झारखण्ड की राजधानी के लिए रांची से पंद्रह किलोमीटर पर एक नये अत्याधुनिक शहर का निर्माण किया जायेगा, जिसके लिए दो हजार करोड़ रुपयों के व्यवस्था की जा रही है और जिसके प्रारूप का दायित्व मेकॉन को दिया गया है. मेकॉन के इंजीनियरों ने प्रारंभिक प्रारूप बनाकर प्रस्तुत भी कर दिया है, जिसे मुख्य सचिव ने कई परिवर्तनों का सुझाव देते हुए उसमें सुधार करने का निर्देश दिया है. झारखण्ड आन्दोलन का उद्देश्य कभी भी यह नहीं रहा कि रांची को हाइटेक सिटी बनाया जाय या चण्डीगढ़ की तर्ज पर इसका पुनर्निर्माण किया जाय. दो हजार करोड़ की रकम एक बहुत बड़ी धनराशि है, जिसका उपयोग यदि विवेकपूर्ण एवं ईमानदार ढंग से किया जाय, तो यहां के दो हजार गांवों को आदर्श गांव बनाया जा सकता है. एक गांव के विकास के लिए एक करोड़ की धनराशि का काफी महत्व होता है, हां ईमानदारी एवं गांववालों की सम्मिलित सहमति से इसे खर्च करने की जरूरत है. राजधानी के लिए रांची में जितनी सुविधाएं है, अगले बीस वर्षों के लिए काफी हैं – सिर्फ जरूरत है रांची शहर के प्रबंधन की. सड़कों का अतिक्रमण सख्ती से हटा कर उन्हें चौड़ा करना, मुख्य सड़कों पर जुलूस और धरनों प...

वित्तमंत्री जवाब देंगे?

फोकस छोटानागपुर सेमिनार में बोलते हुए माननीय वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने उपस्थित सभी सदस्यों, उद्यमियों और व्यवसायियों की सारी आशाओं पर अपने वाक चातुर्य के सहारे बहुत खूबी से पानी फेरा. अपमानित महसूस करते हुए भी शिष्टाचारवश किसी से कुछ कहते न बना. सभी को आड़े हाथों लेते हुए उन्होंने टैक्स की चोरी के लिए विशेष रूप से व्यापारी वर्ग को लथाड़ने में कोई कसर बाकी न रखी. उनहोंने स्पष्ट कह दिया कि व्यवसायी वर्ग टैक्स की चोरी के लिए ढेरों रास्ते निकाल लेता है, कानून में अनेक छिद्र खोज लेता है, जबकि नौकरी करने वाले पूरे टैक्स का भुगतान करने को बाध्य होते हैं. क्या सहानुभूति दिखायी ‘बेचारी’ सरकारी नौकरी के प्रति. मंत्री महोदय यहां चूक गये. सभी जानते हैं कि अधिकांश सरकारी कर्मचारियों और पदाधिकारियों की ‘ऊपरी’ आमदनी, उनके मासिक वेतन से कई गुनी अधिक होती है. बिना किसी मेहनत के उपार्जित इस ऊपरी आमदनी पर कितना टैक्स ये लोग देते हैं? जनता अपने काम के लिए इनके पास दौड़ती रहती है और कुत्तों की तरह दुरदुरायी जाती है. उसकी मजबूरी और अपनी ताकत का लाभ उठाकर ये उसे ब्लैकमेल करते रहते हैं. दूसरी ओर एक व्यापारी स...

पोस्टिंग के लिए साल भर से बैठे हैं डॉक्टर

बिहार सरकार हमेशा ही खजाना खाली होने का रोना रोती रही है. ठीक है कि आर्थिक संसाधनों की कमी है, लेकिन इसके लिए वह स्वयं ही जिम्मेदार है. जो भी साधन उपलब्ध है, उनका ठीक से प्रबंधन यह सरकार विगत दस वर्षों में नहीं कर पायी. घोटालों की वजह से जो बर्बादी हुई है और हो रही है, उसकी बात तो अलग ही है, लेकिन दैनिक प्रशासनिक कार्यकलापों में भी बदइंतजामी बदस्तूर जारी है, कोई मां-बाप नहीं है. एक डाक्टर हैं जिनका ट्रांसफर साल भर पहले हो गया, लेकिन किसी भी नयी जगह पर उन्हें पोस्टिंग आज नहीं मिली. एक डाक्टर पर बिहार सरकार को लगभग औसतन पंद्रह हजार रुपये खर्च करना पड़ा है और करीब 120 डाक्टर बिना पोस्टिंग के बैठे हैं. उन्हें कोई चिंता भी नहीं क्योंकि खाली बैठने की अवधि का वेतन भी उन्हें भी बाद में मिल ही जाना है. बिना पोस्टिंग के खाली बैठे 120 डॉक्टरों पर सरकार को लगभग अठारह लाख रुपये प्रतिमाह का खर्च आ रहा है. ऐसा नहीं है कि ये डॉक्टर सरप्लस है. आज भी अनेक अस्पतालों में डॉक़्टर न होने का रोना सरकार रोती जा रही है, फिर क्या औचित्य है इन डॉक्टरों को खाली बैठाने की. पोस्टिंग का सारा खेल सेक्रेटेरिएट के ये बाब...

कुएं से बचकर खाईं की ओर बढ़ रहे हैं

सभी सरकारी निगम आज या तो बीमार हैं या मृतप्राय. बिहार राज्य पथ परिवहन निगम हो या रांची नगर निगम या फिर बिजली बोर्ड – हर जगह कर्मचारियों का यही कहना है कि भ्रष्ट अफसरों ने हर प्रकार की खरीद और पेमेंट में खूब खा-पीकर इन निगमों को दीमक की तरह चाटकर खोखला बना दिया है. अफसरों का कहना है कि हड़तालों और मांगों का ब्रह्मास्त्र हाथों में और राजनैतिक नेताओं का वरदहस्त सिर पर रखे यूनियन नेताओं ने खुद तो ऐश-मौज किया ही, कर्मचारियों को भी निकम्मा और कामचोर बना दिया. किसी के विरूद्ध छोटी सी भी अनुशासनिक कार्रवाई नहीं की जा सकती, यूनियन के बल पर ये लोग मारपीट, गाली-गलौज और हड़ताल पर उतारू हो जाते हैं. यदि किसी भी प्रकार की सजा का डर न हो, तो कामचोरी बढ़ेगी ही और इसी कामचोरी ने इन निगमों को बीमार बनाने में अहम भूमिका निभायी है. निगमों की खराब स्थिति के लिए अफसर और कर्मचारी दोनों ही दोषी नजर आते हैं. भ्रष्ट अफसरों ने इन निगमों का पैसा हजम कर बड़ी अट्टालिकाएं बना ली हैं, अकूत सम्पदा अपने लिए इकट्ठी कर ली है. परंतु नीचे के कर्मचारी, जो अपने को ईमानदार कहते हैं, वे इन अफसरों की पोल क्यों नहीं खोलते? यदि खुलकर...

सरकार की कार्यप्रणाली में सुधार की जरूरत

बिक्री कर के खिलाफ समय-समय पर किए जा रहे आंदोलन एकदम निर्रथक और हास्यास्पद लगते हैं. राज्य या देश को चलाने के लिए सरकारों को धन चाहिए और इस धन का स्त्रोत विभिन्न प्रकार के टैक्स ही हो सकते है. यदि बिक्री कर हटा दिया जाए तो उसके बदले कोई दूसरे नाम से अन्य टैक्स आ जाएगा. व्यापारियों की दलील है कि बिक्री कर की दर बहुत अधिक है और इसे वसूलने के लिए नियुक्त सरकारी कर्मचारी और पदाधिकारी लोगों को बहुत सताते है. सरकार को पूरे राज्य में बिक्री कर की जितनी रकम मिलनी चाहिए, वह कभी इकट्ठी ही नहीं हो सकती. अधिकांश दुकानों में बिना रसीद काटे ही माल बेचा जाता है, क्योंकि ग्राहक बिक्री कर की राशि देना ही नही चाहते. यदि कोई दुकानदार इस जिद पर अड़ जाए कि वह बिना बिक्री कर के कोई माल बेचेगा ही नहीं, तो बहुत जल्दी उसे दुकान बंद करनी पड़ेगी. हर ग्राहक बाजार में सस्ता से सस्ता सामान खरीदने के चक्कर में रहता है. बिक्री कर जोड़ कर कोई सामान महंगा हो जाता है, क्योंकि टैक्स की दर अधिकांश वस्तुओं के लिए दस प्रतिशत या उससे अधिक है. व्यापारियों में अपना माल बेचने की इतनी कड़ी प्रतियोगिता है कि वे खरीद मूल्य से भी कम प...

सरकार की नजर लग गयी इन कारखानों को

हाईटेंशन इंसुलेटर और इलेक्ट्रीक इक्विपमेंट फैक्टरियों के महाप्रबंधकों के साथ बैठक करते हुए मुख्यमंत्री महोदय ने कहा कि फैक्टरी प्रबंधन यदि राज्य सरकार के निर्देश में काम करे, तो हर संभव सहायता दी जायेगी. सरकारी उद्यमों का यही तो दुर्भाज्ञ रहा है कि उन्हें हमेशा सरकार के निर्देश में चलना पड़ा जिसका नतीजा हुआ कि इन्हें घाटे पर घाटा होता रहा और बंदी की नौबत आ गयी. मंत्रियों, विधायकों और बाहुबली नेताओं के लिए चरागाह रहे हैं ये सरकारी उद्यम. सरकार का काम है शासन करना है, न कि व्यापार करना और उद्योग चलाना. यदि इन मृत उद्योगों को पुनर्जीवित करना है तो इन्हें उद्योगपतियों को बेच देना चाहिये. इनके पतन में सरकार का बराबर हाथ रहा है. आज इनकी बंदी से भूखे मर रहे कर्मचारियों ने उस जमाने में खुलकर मौज की, बिना काम किए तनख्वाह ली, अधिक सुविधाओं के लिए हड़ताल की, काम रोका – उस समय ही और-और की हवस इन्हें परेशान किए रहती थीं. सरकारी कारखानों के कर्मचारियों के अंदर कार्य संस्कृति का अभाव हमेशा रहा है, लेकिन मजदूर यूनियन के झंडे तले अधिक सुविधाओं और वेतन के लिए छोटी-छोटी बात पर उत्पादन ठप्प करने में भी ये ल...

आदिवासी मुख्यमंत्रियों से बेहतर है राष्ट्रपति शासन ?

झारखंड राज्य के गठन के बाद नौ बार गणतंत्र दिवस समारोह का आयोजन किया जा चुका. आदिवासी बहुल इस क्षेत्र को अलग raajy बनाने के लिये बहुत लंबा आंदोलन चला, मान्यता यही थी कि खनिजसंपन्न इस क्षेत्र में आदिवासियों का सर्वांगीण विकास अपने अलग राज्य में ही उनके ही हाथों से हो सकता है. विगत आठ वर्षों में यहां भयंकर राजनैतिक उथल पुथल हुई, एक निर्दलीय भी मुख्यमंत्री बना, अन्य आदिवासी मंत्रियों ने भी भ्रष्टाचार की हुगली में नंगा स्नान किया, इनके एजेंडे में झारखंड या अदिवासियों के विकास की बात दूर -दूर तक नही रही, सब ने मिलकर इतनी छीछालेदर कर दी कि राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा. राज्य-गठन के आठ वर्षों में झारखंड में चार मुख्य मंत्री हुए, चारों आदिवासी, अधिकांश मंत्री भी आदिवासी ही रहे, काबिल या नाकाबिल होने से कोई फर्क नहीं पड़ता, बस आदिवासी होने का ठप्पा होना चाहिये. वैसे तो ऐसा कोई कानून नहीं है, केवल आदिवासियों के तुष्टिकरण के लिये यह प्रथा चल पडी है.झारखंड गठन के प्रथम दिवस से ही हम एक गलत सोच के शिकार हैं कि आदिवासी ही आदिवासियों की समस्याओं को समझकर उनका निदान निकाल सकते हैं. झारखंड और छत्तीसगढ़ राज्य...