नवोदित राज्य झारखंड में नये –नये युवा सप्लायरों की भरमार हो गयी है, कुछ तो बेरोजगारी के कारण और कुछ इस भ्रम में कि सरकारी सप्लाई में बहुत फायदा है. कोटेशन मांगने की त्रुटिपूर्ण पद्धति के कारण भी हर बार अनेक सप्लायर मैदान में उतरते हैं और अपने हाथ जला बैठते हैं. विभागों के कर्मचारी ही अपने चहेतों को खबर कर देते हैं कि उनके विभाग में एक बड़ा टेंडर निकलनेवाला है और वे अपने लिये ऑफिस के अलावे भी कमीशन पहले से ही तय कर लेते हैं. कुछ नये रंगरूट तो अखबारों में टेंडर के विज्ञापन देखकर अपना भाग्य आजमाने निकल पड़ते हैं.
हर बार कुछ नये आपूर्तिकर्ता काम करने के लोभ में कम से कम दर का कोटेशन दे देते हैं, उन्हें न तो माल की क्वालिटी की जानकारी होती है और न विभाग में दिये जानेवाले कमीशन की. अखबार में उसने पढ़ लिया कि अमुक विभाग में 15 फुट लंबी और 12 फीट चौड़ी दरियां सप्लाई करनी हैं, उसने सुन रखा है कि सप्लाई में बहुत फायदा होता है. बस निकल पड़ा बाजार में और दरी बेचनेवालों से उसने उनके रेट ले लिये, दरी की मोटाई, वजन और धागों की क्वालिटी का न तो उसे ज्ञान है और न उसने जानने की ही कोशिश की क्योंकि उसे पता है कि सबसे कम दरवाले को ही आपूर्ति आदेश मिलता है. विभाग में जाकर जब उसने पता करने की कोशिश की कि वहां कितना कमीशन चलता है, वहां हरेक ने कहा कि कमीशन का सवाल ही नही उठता. बस उसने खुश होकर बड़ी उम्मीदों के साथ कम से कम दर का कोटेशन डाल दिया.
निश्चित दिन आपूर्तिकर्ताओं की उपस्थिति में टेंडर खुला, उसकी दर न्यूनतम हो गयी. अब शुरू हुई विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों की पैंतरेबाजी, उसके कोटेशन में अनेक त्रुटियां दिखाए जाने का सिलसिला चला, उसे लगा कि हाथ आया ऑर्डर खिसक रहा है, किसी ने समझाया कि कमीशन ऑफर करो, मरता क्या न करता, उसने कमीशन देकर ऑर्डर ले लिया, सोचा कि कम मुनाफा होगा, बर्दाश्त कर लेगें. बाजार से दरी लाकर आपूर्ति कर दी, अब विभाग के दूसरे लोग ऐक्शन में आ गये, कहा कि दरियां बहुत हलकी हैं, नहीं चलेंगीं. बेचारा आकाश से गिरा तो खजूर में अटक गया. माल फंस गया, जहां से दरियां खरीदीं वहां से पेमेंट का तगादा रोज आ रहा है, अपने पैसे तो फंसे ही हैं. फिर कुछ देकर माल पास कराया और राम-राम करते हुए बिल जमा किया कि दो चार दिनों में पेमेंट मिल ही जायेगा. लेकिन यहां तो अकाउंटेंट और बिल क्लर्क के चंगुल में फंस गये, जिन्होंने नियमों का हवाला देकर आपूर्ति आदेश, चालान और बिल में अनेक त्रुटियां निकालकर पेमेंट ही रोक दिया. एक तो कम दर पर माल दिया, मुनाफा दो तीन जगहों पर अनपेक्षित कमीशन देने में ही खत्म हो गया, अब क्या होगा. लेकिन महाजन का तगादा सिर पर हो, अपनी पूंजी फंसी हो, तो ऐसे तनाव से छुटकारा पाने के लिये कोई भी व्यक्ति क्या करेगा, मुनाफा भाड़ में जाये, जो भी देना पड़े देकर अपना पेमेंट निकालेगा. बड़ी उम्मीदों के साथ टेंडर दिया कि सप्लायर बनेंगे, लेकिन चौबेजी छब्बे बनने की जगह दूबे बनकर लौटे. विभाग को घटिया माल मिला, पदाधिकारियों और कर्मचारियों की आत्मा बिकी और आपूर्तिकर्ता की पूंजी टूटी. किसी को पसंद नहीं आती ऐसी स्थिति, लेकिन बदस्तूर जारी है यही सबकुछ. इन नये आपूर्तिकर्ताओं में अधिकांश के पास बिक्री कर का निबंधन नहीं होता, उनके रेट में बिक्री कर शामिल भी नहीं होता, निबंधित आपूर्तिकर्ताओं की दर के मुकाबले उनकी दर स्वतः कम हो जाती है. विभाग भी इस गैरकानूनी बात को नजर अंदाज कर देता है. बतलाने पर जबाब मिलेगा कि हमें तो न्यूनतम दर से ही मतलब है, बिक्री कर निबंधन से क्या लेना-देना. यही आपूर्तिकर्ता सप्लाई करने के बाद बिक्रीकर विभाग के हत्थे चढ़्कर पेनाल्टी देते हैं और नुकसान उठाते हैं. बिना अनुभव वाले आपूर्तिकर्ताओं को बड़े टेंडर में भाग लेने देना ही सभी के लिये नुकसानदेह है. सरकारी खरीद की जो भी पॉलिसी बने उसमें इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिये.
हर बार कुछ नये आपूर्तिकर्ता काम करने के लोभ में कम से कम दर का कोटेशन दे देते हैं, उन्हें न तो माल की क्वालिटी की जानकारी होती है और न विभाग में दिये जानेवाले कमीशन की. अखबार में उसने पढ़ लिया कि अमुक विभाग में 15 फुट लंबी और 12 फीट चौड़ी दरियां सप्लाई करनी हैं, उसने सुन रखा है कि सप्लाई में बहुत फायदा होता है. बस निकल पड़ा बाजार में और दरी बेचनेवालों से उसने उनके रेट ले लिये, दरी की मोटाई, वजन और धागों की क्वालिटी का न तो उसे ज्ञान है और न उसने जानने की ही कोशिश की क्योंकि उसे पता है कि सबसे कम दरवाले को ही आपूर्ति आदेश मिलता है. विभाग में जाकर जब उसने पता करने की कोशिश की कि वहां कितना कमीशन चलता है, वहां हरेक ने कहा कि कमीशन का सवाल ही नही उठता. बस उसने खुश होकर बड़ी उम्मीदों के साथ कम से कम दर का कोटेशन डाल दिया.
निश्चित दिन आपूर्तिकर्ताओं की उपस्थिति में टेंडर खुला, उसकी दर न्यूनतम हो गयी. अब शुरू हुई विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों की पैंतरेबाजी, उसके कोटेशन में अनेक त्रुटियां दिखाए जाने का सिलसिला चला, उसे लगा कि हाथ आया ऑर्डर खिसक रहा है, किसी ने समझाया कि कमीशन ऑफर करो, मरता क्या न करता, उसने कमीशन देकर ऑर्डर ले लिया, सोचा कि कम मुनाफा होगा, बर्दाश्त कर लेगें. बाजार से दरी लाकर आपूर्ति कर दी, अब विभाग के दूसरे लोग ऐक्शन में आ गये, कहा कि दरियां बहुत हलकी हैं, नहीं चलेंगीं. बेचारा आकाश से गिरा तो खजूर में अटक गया. माल फंस गया, जहां से दरियां खरीदीं वहां से पेमेंट का तगादा रोज आ रहा है, अपने पैसे तो फंसे ही हैं. फिर कुछ देकर माल पास कराया और राम-राम करते हुए बिल जमा किया कि दो चार दिनों में पेमेंट मिल ही जायेगा. लेकिन यहां तो अकाउंटेंट और बिल क्लर्क के चंगुल में फंस गये, जिन्होंने नियमों का हवाला देकर आपूर्ति आदेश, चालान और बिल में अनेक त्रुटियां निकालकर पेमेंट ही रोक दिया. एक तो कम दर पर माल दिया, मुनाफा दो तीन जगहों पर अनपेक्षित कमीशन देने में ही खत्म हो गया, अब क्या होगा. लेकिन महाजन का तगादा सिर पर हो, अपनी पूंजी फंसी हो, तो ऐसे तनाव से छुटकारा पाने के लिये कोई भी व्यक्ति क्या करेगा, मुनाफा भाड़ में जाये, जो भी देना पड़े देकर अपना पेमेंट निकालेगा. बड़ी उम्मीदों के साथ टेंडर दिया कि सप्लायर बनेंगे, लेकिन चौबेजी छब्बे बनने की जगह दूबे बनकर लौटे. विभाग को घटिया माल मिला, पदाधिकारियों और कर्मचारियों की आत्मा बिकी और आपूर्तिकर्ता की पूंजी टूटी. किसी को पसंद नहीं आती ऐसी स्थिति, लेकिन बदस्तूर जारी है यही सबकुछ. इन नये आपूर्तिकर्ताओं में अधिकांश के पास बिक्री कर का निबंधन नहीं होता, उनके रेट में बिक्री कर शामिल भी नहीं होता, निबंधित आपूर्तिकर्ताओं की दर के मुकाबले उनकी दर स्वतः कम हो जाती है. विभाग भी इस गैरकानूनी बात को नजर अंदाज कर देता है. बतलाने पर जबाब मिलेगा कि हमें तो न्यूनतम दर से ही मतलब है, बिक्री कर निबंधन से क्या लेना-देना. यही आपूर्तिकर्ता सप्लाई करने के बाद बिक्रीकर विभाग के हत्थे चढ़्कर पेनाल्टी देते हैं और नुकसान उठाते हैं. बिना अनुभव वाले आपूर्तिकर्ताओं को बड़े टेंडर में भाग लेने देना ही सभी के लिये नुकसानदेह है. सरकारी खरीद की जो भी पॉलिसी बने उसमें इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिये.
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