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रैगिंग- क्या, क्यों और क्यों नहीं ?

हर वर्ष नये एडमिशन के बाद पूरे देश के अनेक इंजीनियरिंग, मेडिकल, मैनेजमेंट और कुछ अन्य कॉलेजों में जब नये छात्र प्रवेश लेते हैं, तो पुराने सीनियर छात्र उन्हें नये माहौल में ढालने के नाम पर उनकी रैगिंग करते हैं. रैगिंग का मतलब ही होता है किसी की इतनी खिंचाई करना कि उसके व्यक्तित्व और स्वाभिमान के चीथड़े- चीथड़े हो जाएं. कई सीनियर छात्रों के द्वारा किसी एक नये छात्र को घेरकर ऊलजलूल सवाल करना और हर जबाब को गलत बताते हुए खिल्ली उड़ाना, ऊटपटांग हरकतें करवाना, गालीगलौज और अश्लील बातें करके नये छात्रों को मानसिक और शारीरिक यंत्रणा देना ही रैगिंग है. रैगिंग के परिणाम स्वरूप हर वर्ष दो-चार छात्र आत्महत्या कर लेते हैं, कुछ मानसिक रूप से गंभीर बीमार हो जाते हैं.
वैसे तो अधिकांश नये छात्र रैगिंग के फलस्वरूप अल्ट्रामॉडर्न बन जाते हैं, लेकिन कुछ लड़कों को रैगिंग के दौरान जबर्दस्त झटका लगता है. वे जो कुछ बचपन से किशोरावस्था तक पहुंचने में सीखे हुए होते हैं, सब एक झटके में धराशायी हो जाता है. यहां तो हर वाक्य में “मां-बहन” को लपेटती हुई बुरी- बुरी गालियां दी जाती हैं, सिखाई और रटवाई जाती हैं, वर्जित सेक्स की बातें खुलेआम की जाती हैं, अप्राकृतिक यौनसंबंधों की चर्चा होती है, कभी कभी तो मानसिक रूप से रुग्ण कुछ सीनियर्स के द्वारा सारी मर्यादाएं पारकर नये छात्रों को अप्राकृतिक यौनक्रियाओं में लिप्त होने के लिये भी बाध्य कर दिया जाता है, उनमें से कुछ तो बाद में इसके आदी भी हो जाते हैं.
रैंग़िंग के दौरान सीनियर्स नये छात्रों को बुरी तरह डांटते और लथाड़ते हैं, उनके साथ गुलामों से भी बदतर व्यवहार करते हैं, शारीरिक और मानसिक यंत्रणा देकर सामूहिक रूप से मजा लेते हैं. अपने जूते पॉलिश करवाना, झाड़ू दिलवाना, गर्म चाय एक घूंट में पिलाकर या लाल मिर्चें मुंह में ठूंसकर फ्रेशर की छटपटाहट पर ठहाके लगाना, चार-पांच घंटे बाथरूम के शॉवर के नीचे खड़ा रखना, रातभर जगाए रखना, आदेश न मानने पर कुहनी के बल रेतीले फर्श पर रेंगने की सजा देना- ये सब तो मामूली यंत्रणाएं हैं. हद तो तब हो जाती है जब नये छात्रों को चड्ढी बनियान तक उतारकर एकदम नंगा करवाया जाता है, उनसे अश्लील मजाक किये जाते हैं, उनके साथ अश्लील हरकतें की जाती हैं, उनसे अप्राकृतिक यौन क्रियाएं करवाई जाती हैं. उन्हें जोर का झटका और जोर से लगता है. सभी रंगरूटों का स्वाभिमान शीशे की तरह चकनाचूर हो जाता है, ऐसे में कुछ लड़के-लड़कियां मानसिक तौर पर बुरी तरह टूट जाते हैं, कॉलेज छोड़कर चले जाते हैं, एकाध तो आत्महत्या भी कर लेते हैं.
जुलाई का महीना है, आइये चलें एक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज के एक कमरे में जहां एक नये यानि फ्रेशर लड़के को घेरकर आठ दस सीनियर छात्र बैठे हैं. फ्रेशर की सिट्टीपिट्टी गुम है, मानो एक चिड़िया कई बाजों के चंगुल में फंस गयी हो. एक ने कड़ककर पूछा, “क्या नाम है बे तेरा?” सहमते हुए उसने बताया, “राम परसाद मिसरा”. दूसरा चिल्लाया “साले सिर उठाकर बात करता है, यहां सब तेरे बाप लोग बैठे हैं, सिर नीचाकर और कमीज का तीसरा बटन देख” , दूसरा बोला, “ये इतना झड़ूस नाम कौन रखा हे रे, और ये ‘परसाद मिसरा’ क्या होता है, ‘प्रसाद मिश्रा’ बोलते नहीं बनता और चला आया है इंजीनियरिंग कॉलेज में? कहां से आया है बे?” लड़का झिझकते हुए बोला, “जौनपुर से ”. “अबे साले, अभी तक तमीज नहीं आयी? यहां क्या तेरे यार लोग बैठे हैं, सीनियर्स को ‘सर’ कौन बोलेगा, तेरा बाप?” कांपते हुए बेचारा बोला ‘सारी सर’.
पीछे से एक आवाज आयी ‘और, कभी कोई लड़की-वड़की पटाई कि नहीं?’ लड़का चुप रहा तो उसने हड़काया ‘साले बोलता है या दूं दो झापड़’. लड़का धीमे से बोला ‘सर नहीं, हमलोग के यहां यह सब नहीं होता.’ तुरंत एक चिल्लाया “क्या बोला बे, शरीफ बनता है, हम लोग बदमाश नजर आते हैं? ये जो तेरे सामने बिग बॉस बैठे हैं, ये बैच टॉपर हैं और इनकी तीन गर्ल फ्रेंड हैं. तुमलोग साले चुपचाप अपनी कजिंस के साथ मस्ती करते हो और सबको दिखलाते हो कि हम तो ये सब कुछ जानते ही नहीं और अभी महतारी का ही दूध पीते हैं’
बेचारे फ्रेशर लड़के से रहा नहीं गया, बोल पड़ा, “देखिये सर, मां बहन को गाली मत दीजिये.’ इतना सुनते ही सब भड़क गये, जोर जोर से चिल्लाने लगे, “ मा....,ब... और देंगे, तू क्या कर लेगा? ले जाओ हरामजादे को चेरापूंजी, उतार साले सब कपड़े, अभी देखते हैं तेरी मां बहन को” और तमाम विरोधों के बावजूद सभी ने उसे नंगा कर दिया, चढ्ढी-बनियाइन तक उतार दी और बाथरूम में ले जाकर शावर के नीचे खड़ा कर दिया, लड़का डर व ठंढ से कांपता रहा और सीनियर्स घंटे भर उसके साथ अश्लील मजाक और हरकतें करते रहे. लड़के को वापस कमरे में लाया गया, कोई बोला “देखो तो साले को, कैसा कांप रहा है, ठंढ लग रही है, गरम करो इसको, खिलाओ लाल मिर्च.” उसे जबर्दस्ती दस-बीस लाल मिर्चें खिलाई गयीं, आंख-नाक से पानी गिरता रहा और सब ठहाके लगाते रहे. तीन चार घंटों के इस टॉर्चर के बाद उसे छात्रावास के लॉन में लाया गया जहां मास रैगिंग के लिये दूसरे नंगधड़ंग लड़कों को भी इकट्ठा किया गया था.
मास रैगिंग तो और भी वीभत्स होती है. अश्लीलता की सारी ह्दें पर हो जाती हैं. चालीस पचास छात्रों को एकदम नंगा करके छात्रावास के लॉन में लाया जाता है, म्युजिक बजाया जाता है, सभी फ्रेशर नाचते हैं, सीनियर्स चारों ओर खड़े होकर तमाशा देखते हैं, अश्लील बातें करते हैं, फब्तियां कसते हैं, गालियां देते हैं. इसके बाद सभी की परेड होती है, संस्कारों की धज्जियां उड़ाते हुए अश्लील शब्दों में पिरोयी सलामी ली जाती है, सलामी के शब्द ऐसे कि यदि साधारण मां-बाप सुन लें तो लड़के को तुरंत वापस बुला लें. देर रात तक यह सब कुछ चलता है. फिर सीनियर्स अगले दिन के लिए अपने लिये नये मुर्गे चुनते हैं, सभी को इस आदेश के साथ छोड़ा जाता है कि अगले दिन इस - इस रूम नंबर में इतने बजे हाजिरी बजानी है.अगले दिन नया कमरा, नये सीनियर्स और नये ढंग से रैगिंग. सहमे- डरे फ्रेशर्स के पास कोई उपाय भी तो नहीं होता, शुरू में रुलानेवाली रैगिंग में फिर रस आने लगता है. महीने दो महीने चलने वाला रैगिंग का दौर अलग अलग पृष्ठभूमि से आये मासूम सुसंस्कृत किशोरों को कामुक युवकों में बदल देता है.
मेरी बातों से जो अभिभावक डर गये हों उन्हें यहां एक बात बताना जरूरी है कि सभी सीनियर्स ऐसे नहीं होते, वे रैगिंग करते हैं ,पर उनका तरीका अलग होता है. वे पार्टियों में शामिल होने के गुर एवं डायनिंग टेबुल के मैनर्स सिखाते हैं, चम्मच-कांटों से खाना सिखाते हैं, स्मार्ट और बोल्ड बनाने के लिये उच्च सोसाइटी में पहनने-ओढ़ने, उठने-बैठने और बोलने-चालने की ट्रेनिंग रैगिंग के बहाने दे देते हैं. वे यह भी बताते हैं कि सिर्फ किताबी कीड़ा बनकर सफलता नहीं मिल सकती, जीवन में सफल होना है तो खेलकूद, सांस्कृतिक एवं दूसरी गतिविधियों में भाग लेकर व्यक्तित्व का विकास करना आवश्यक है. ये लोग भी सेक्स की बातें करते हैं, लेकिन हल्की फुल्की. उद्देश्य होता है - उनके अंदर से झिझक दूर कर देना. ऐसे सीनियर्स अपनी किताबें और नोट्स वगैरह भी फ्रेशर्स को दे देते हैं, फाइनल इयर के कुछ सीनियर्स तो कूलर, प्रायवेट फर्नीचर एवं दूसरे कीमती सामान भी फ्रेशर्स को दे देने में नहीं झिझकते. वे आदरणीय बड़े भाई और प्यारे छोटे भाई का ऐसा रिश्ता बना लेते हैं जो आजीवन चलता है, कॉलेज के ये सीनियर्स बाद में नौकरी के दौरान भी अपने ज़ूनियर्स को सही सलाह देते हैं और अच्छा जॉब दिलाने में मदद करते हैं. वे अपने जूनियर्स से कभी कुछ लेने की इच्छा नहीं रखते, उन्हें देने में ही विश्वास रखते हैं.
आइये देखें राम परसाद मिसरा का क्या हुआ? रैगिंग के बाद से वे अपने को आर.पी.मिश्रा कहलाना पसंद करने लगे, पाजामे की जगह जीन्स ने ले ली , चुटिया कट गयी, फ्रेंचकट दाढ़ी आ गयी, बालों में से तेल गायब हो गया, रोजाना सैंपू करने लगे, हररोज शाम को सिविल लाइंस जाकर होटलबाजी जरूरी हो गयी, हर फिल्म का पहला शो देखना जरूरी हो गया, भोजपुरी की जगह हिंग्लिश ने ले ली. अगले साल नये लड़कों की रैगिंग करने में मिश्राजी सबसे आगे नजर आये.
रैग़िंग सिर्फ लड़कों में नहीं होती, लड़कियां भी बढ़चढ़कर करती हैं. पहले केवल मेडिकल कॉलेजों एवं मिरांडा हाउस जैसे अल्ट्रा मॉडर्न कॉलेजों में ही लड़कियां रैगिंग करती थीं. आजकल तो इंजीनियरिंग कॉलेजों एवं मैनेजमेंट स्कूलों में भी लड़कियां बड़ी संख्या में आने लगी हैं, वे भी रैगिंग का पूरा मजा लेती हैं, उनके यहां भी अश्लीलता की कोई सीमाएं नहीं होतीं.सबसे बड़ी समस्या तो यह खड़ी हो गयी है कि प्रोफेशनल कॉलेजों की नकल करते हुए डिग्री कॉलेजों में भी रैग़िग का घुन लग गया है., प्रोफेशनल कॉलेजों में पढ़नेवालों का कैरियर कम अधिक निर्धारित हो चुका होता है, इसलिये यदि थोड़ा लक्ष्य से फिसल भी गये तो विशेष नुकसान नहीं होता. लेकिन सामान्य डिग्री कॉलेजों में होनेवाली रैगिंग अनेक मेधावी छात्रों को बर्बाद कर देती है, समय से पूर्व सेक्स की तरफ झुकाव पैदा हो जाता है और तब वे “डेटिंग” वगैरह में फंसकर अपने को बर्बाद कर लेते हैं, सामान्य सी स्नातक डिग्री लेकर बाहर निकलते हैं जहां बेरोजगारी उनका बाट जोह रही होती है. और अधिक गड़बड़ तो यह हो रही है कि कुछ स्कूलों में भी रैगिंग की परंपरा बन गयी है, “फ्रेशर डे ” की तैयारी के नाम पर नये छात्रों की जमकर खिंचाई होती है, उनका मजाक बनाया जाता है, सताया जाता है. देश के हर कोने से हर वर्ष रैगिंग के कारण घटी कुछ दुर्घटनाओं की खबरें आती हैं, जिनकी चर्चा मीडिया में दो चार दिन होती है और फिर लोग सबकुछ भूलकर अपनी दिनचर्या में लग जाते हैं.
आइये जरा गौर करें, रैगिंग के पक्ष में बोलनेवाले क्या तर्क देते हैं. उनका कहना है कि हर प्रोफेशन की अपनी तहजीब होती है, उठने- बैठने , बोलने- चालने , दूसरों से व्यवहार करने के अपने तरीके होते हैं. कामयाब इंजीनियर बनना है तो साहबी रोब भी आना चाहिये, क्योंकि मजदूरों से, जूनियर अफसरों से और दबंग ठेकेदारों से जूझना पड़ेगा. मजदूरों से काम निकालने के लिये डांटना-फटकारना, गालियां देना और पुचकारना आना चाहिये क्योंकि वे सुसंस्कृत भाषा नहीं समझते. इंजीनियरिंग कॉलेजों में सीधे-साधे पढ़ाकू लड़के आते हैं, यदि उनके अंदर से शर्म-संकोच न निकाले गये तो फील्ड में गालियों की भाषा सुनते ही उनके हाथ पैर ढीले हो जाएंगे. इसीलिये उन्हें गालियां देने और सुनने का अभ्यस्त बनाया जाता है. उन्हें बड़े साहबों के साथ बड़ी पार्टियों में शामिल होने के आभिजात्य तरीकों की भी पूरी जानकारी दी जाती है ताकि बड़े लोगों के संपर्क में आने पर वे अपने को मिसफिट न पाएं, वहां भी उनका व्यवहार सहज और सामान्य रहे. ऐसे सामंती माहौल में किसी अफसर ने जरा भी दब्बूपन दिखलाया, तो उसका नाजायज फायदा उठाने में ठेकेदार चूकेंगे नहीं. अलग अलग माहौल से, छोटे घरों और पिछड़े इलाकों से आनेवाले लड़कों में सुसंस्कार के नाम पर यह झिझक तो रहती ही है जो बड़े माहौल में एवं बड़े लोगों के सामने आने पर इनफीरियोरिटी कॉम्प्लेक्स में बदल जाती है. रैगिंग का उद्देश्य ही है सभी को ठोंक बजाकर ,रगडकर उनके अंदर साहबी आदतें पैदा कर देना ताकि वे अपने को चीफ इंजीनियर से कम न समझें. उनके अंदर इतना आत्मविश्वास आ जाए कि अब उन्हें हर बात में मम्मी-पापा के मार्गदर्शन की जरूरत न रहे. लड़कियों और महिलाओं से बात करने में हिचकिचाहट न हो.
रैग़िंग से फायदे गिनानेवाले कितनी भी लंबी- चौड़ी लिस्ट क्यों न बना दें, इससे होनेवाले अनंत नुकसानों की भरपायी नहीं हो सकती. आजकल तो कॉलेजों में सीनियर्स भी अपनी जाति, धर्म या क्षेत्र के आधार पर अलग अलग ग्रुप बना लेते हैं, अपने ग्रुप के नये छात्रों को तो रैगिंग से बचाते हैं और दूसरों की जमकर रैगिंग करते हैं, फलस्वरूप कॉलेज में तनावपूर्ण माहौल हो जाता है, मारपीट तक की नौबत आ जाती है. रैगिंग के नाम पर बदमाश लड़के लड़कियां खुलकर खेलते हैं, अपनी धाक नये छात्रों के बीच जमाने की पूरी कोशिश क्रूर, अश्लील और वीभत्स तरीकों से करते हैं. कॉलेज प्रबंधकों एवं शिक्षकों की तमाम कोशिशों के बावजूद रैगिंग नहीं रुक पा रही. अपने जमाने में उनकी भी रैगिंग हुई थी, उन्होंने भी रैगिंग की थी, शायद इसीलिये वे नहीं मानते कि रैगिंग में बुराइयां ही बुराइयां हैं. जितने इंजीनियर और डॉक्टर हैं, सभी रैगिंग के भुक्तभोगी हैं, लेकिन उनमें से शायद कोई दस बीस ही अपनी शर्मनाक यंत्रणा पब्लिक में स्वीकार करेंगे, वे यही कहेंगे कि वे तो रैगिंग से बच गये थे, उनके दोस्तों की जमकर रैंगिंग हुई थी. फिर उन्होंने भी कॉलेज के अगले तीन वर्षों में जो अश्लीले रैग़िंग की उसका वर्णन अपने लड़कों-लड़कियों और पोते-पोतियों के सामने क्यों करना चाहेंगे?
इसीलिये एकतरह से रैगिंग को इन सभी का मौन समर्थन ही रहता है. लोग यदि रैगिंग की बुराइयों को समझ सकें और निःसंकोच इसपर खुली चर्चा कर सकें, तभी इसके खिलाफ जन जागरुकता लाई जा सकती है, अन्यथा यदि इसका घुन सामान्य स्कूल - कॉलेजों को लग गया तो बस कयामत ही आ जाएगी, वैसे शुरुआत हो चुकी है, त्वरित कदम उठाने की जरूरत है. अतः यदि रैगिंग को रोकना है तो इसके खिलाफ जागरुकता लानी ही होगी, लोगों को, अभिभावकों को बेझिझक बतलाना होगा कि रैगिंग में क्या-क्या होता है. विस्तार से चर्चा हो, लोग इसकी बुराइयों से वाकिफ हों, तभी रैगिंग रुक सकती है.
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर केन्द्र सरकार ने रैगिंग रोकने के उपाय सुझाने के लिये एक समिति का गठन किया है.समिति के अध्यक्ष सी बी आई के पूर्व निदेशक आर के राघवन हैं, उनके अलावे आई आई टी के निदेशक एस जी ढांडे , दिल्ली के मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज के डीन ए के अग्रवाल , रामजस कॉलेज के प्रधानाचार्य राजेन्द्र प्रसाद और मानव संसाधन विकास मंत्रालय के संयुक्त सचिव सुनील कुमार शामिल हैं.यह समिति आम लोगों के अलावे छात्रों, विशेषज्ञों और शिक्षकों से राय लेगी. आइये उम्मीद करें कि अंग्रेजों के द्वारा दी गयी इस
बुराई पर लगाम लगाने में यह समिति सफल हो पाएगी.

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