Skip to main content

किसने तोडा बेहतर राँची का सपना ?

किसी भी राजधानी की अपनी जरूरतें होती हैं, पूरे राज्य का प्रशासन वहीं से होता है, नीतियां वहीं बनती हैं, सारे मंत्रालय और सचिवालय वहीं होते हैं, बडी बडी कंपनियों के दफ्तर वहीं होते हैं, राज्य के दूसरे जिलों से अपना काम लेकर आने वालों की भीड दिन में तो बेइन्तिहा बढती ही है और रात में भी रुककर दूसरे दिन काम करने वालों की संख्या काफी होती है. राजधानी में दिन की इसी बढी आबादी के कारण आम नगरों से अधिक सशक्त सुविधाओं की जरूरत होती है. राजधानी की तुलना अन्य आम नगरों से नहीं की जा सकती. किसी भी राज्य की राजधानी में ही शिक्षा एवं स्वास्थ्य की बेहतरीन सुविधाएं अपेक्षित रहती हैं. इतने बड़े-बड़े कार्यालयों में सारे काम सुचारू रूप से चलें , इसी के लिये जरूरी है कि राजधानी में बिजली, पानी, सडकें, ट्रैफिक, विधि-व्यवस्था, अस्पताल, साहित्य-कला-संस्कृति-संगीत, स्कूल-कॉलेज, खेल-कूद, और मनोरंजन आदि की सुविधाएं उच्च स्तर की हों. रांची का राजधानी के रूप में विकास की कौन कहे, इसका तो सामान्य नगर के रूप में भी विकास अभी तक प्रतीक्षित है. ग्रेटर रांची, रिंग रोड और फ्लाइ ओवरों के शिगूफे टांय टांय फिस्स हो गये, ट्रैफिक की समस्या ज्यों की त्यों बरकरार है, बिजली,पानी और विधि व्यवस्था की कोई न्यूनतम गारंटी नहीं, सड़कों और गलियों में कुछ सुधार हुआ , पर बहुमंजिली इमारतों के बेलगाम विकास ने सड़कों और नालियों को वापस पुरानी स्थिति में ला दिया. बेहतर चिकित्सा के लिये अभी भी वेल्लोर, मुम्बई और दिल्ली दौड़ना पड़ता है, उच्च शिक्षा के लिये पूने, बंगलोर और दिल्ली की राह पकड़नी पड़ती है. राजधानी बनने के बाद जो कुछ भी यहाँ उपलब्ध था उसे ही ठीक से संजोया जाता , प्रशासन चुस्त दुरुस्त रहता, अपनी नीतियों पर स्थिर रहते हुए उन्हें कडाई से लागू करता तो पाँच सात - साल ऐसे ही चल जाता, तब तक बडी योजनायें बनाकर उनपर आराम से काम किया जा सकता था.
सडकों एवं गलियों को चौडा किया गया, पक्का किया गया, चौराहों पर मास्ट लाइट लगाई गई, यह अच्छा काम हुआ, लेकिन अतिक्रमण हटाने की हिम्मत किसी को नहीं हुई : खोमचेवाले, फुटपाथ दुकानदार, हर जगह पर बेतरतीब पार्किंग, दुकानों के आगे की सडक को घेरकर माल रखने की जुर्रत, अनुचित राजनैतिक दबाव के कारण किसी पर लगाम लगाने को कोई तैयार नहीं. हर सडक के किनारे भगवान के मन्दिर बनते जा रहे हैं या सडक का अतिक्रमण कर बढते जा रहे हैं, अगल बगल के दुकानदारों के सहयोग से. बहुत दूर की सोचकर ये दुकानदार सहयोग देते हैं, जब कभी सडक को चौडा करने की बात उठेगी, मन्दिर के कारण किसी को आगे बढने की हिम्मत नहीं होगी और दुकानों की क्षति बच जायेगी. अतिक्रमण में कितना प्रभावी योगदान भगवान से लिया जा रहा है.

चालीस वर्ष पूर्व रांची की आबादी कम थी, यह खूबसूरत शहर था, एच.ई.सी, मेकॉन , कोल इंडिया आदि के आने के साथ- साथ अधिक से अधिक लोग आते गये और बसते गये. सरकार और प्रशासन का कोई नियंत्रण नहीं होने के कारण लोग बेतरतीब तरीके से मकान बनाते गये, बिना किसी नक्शे के कॉलोनियां बसती गयीं, सरकार सोई रही. म्युनिस्पैलिटी थी, कॉरपोरेशन बना, मास्टर प्लान भी बना, लेकिन रिश्वत और पैरवी का दबाव बढता गया और उसे लागू करने की सुध किसी को नहीं हुई, हालत बिगडती गयी, उस समय से नियंत्रण किया गया होता, तो शायद रांची भी दूसरा चंडीगढ या बंगलोर बन सकती थी. लेकिन सरकार तो उस समय भी आंख मूंदे रही जब झारखंड बन गया, मास्टर प्लान बस्ते में बन्द रहा, अतिक्रमण से सडकें पतली होती रहीं, नियमों का घोर उल्लंघन कर बहुमंजिली इमारतें बनती रहीं, नालियां गायब होती गयीं, जल - आपूर्ति की व्यवस्था ठीक से न होने के कारण गहरी गहरी बोरिंग की जाती रही, भूगर्भ स्तर खतरनाक स्थिति तक नीचे पहुंच गया. एक आदर्श नगर बसाने का अवसर हम चूक गये और निरंतर चूकते जा रहे हैं.
बेतरतीब शहर बसता रहा, आबादी बढती रही, आधारभूत सुविधाओं के विकास पर किसी का ध्यान नहीं गया, सिर्फ मुंगेरीलाल के हसीन सपने देखे और दिखाए गये. जेल और यूनिवर्सिटी का नयी जगहों पर स्थानांतरण , तारामंडल, साइंस सिटी, इंडस्ट्रियल कॉरीडोर, ट्रांसपोर्ट नगर, ग्रेटर रांची, रिंग रोड , फ्लाइ ओवर, रिम्स, रूर वैली, ढेरों नये इंजीनियरिंग- मेडिकल कॉलेज और पोलीटेक्निक, अनेक देशी और विदेशी निवेश, सरप्लस पावर , रांची-लोहरदगा-टोरी रेलवे लाइन और साथ में हर वर्ष फायदे का सरकारी बजट – बस ऐसा लगा कि सब कुछ मुठ्ठी में है, लेकिन वह तो मुठ्ठी की रेत ही साबित हुआ. पूरे चार वर्ष बीत गये ; अच्छे राज्यपाल, मुख्य न्यायाधीश, मुख्य सचिव और असेंबली- स्पीकर मिले, लेकिन उनके प्रयासों की भ्रूण हत्या कर दी नालायक और स्वार्थी मंत्रियों ने, भ्रष्ट अफसरों और कामचोर कर्मचारियों ने. यह झारखंड का दुर्भाग्य है कि समर्पित, विजनरी और ईमानदार मंत्री बनने के योग्य कोई राजनेता न तो पहले मिला और न आगे नजर आता है. एक मरांडी जायेंगे, तो दूसरे मुंडा आ जायेंगे, एक केसरी जायेंगे तो दूसरे महतो आ जायेंगे.
अगर हर मंत्री के कार्यकाल में उसके द्वारा किये गये कार्यों का आकलन किया जाये , तो तस्वीर खुलकर सामने आ जाएगी. सारा दोष अफसरों पर थोप दिया गया, लाल फीताशाही को गुनह्गार ठहरा कर मंत्रियों ने पल्लू झाड लिया. अफसरों की नकेल मंत्रियों के हाथों में होती है, लेकिन इन मंत्रियों में से कितनों ने अपने विभाग के काम को समझने के लिये समय दिया, अफसरों को जिम्मेदारी दी और समय समय पर रिपोर्ट ली? इन्हें तो उदघाटन एवं दूसरे समारोहों में मुख्य अतिथि पद सुशोभित करने से फुर्सत नहीं मिली, एक दूसरे पर आरोप लगाने में, टाँग खींचने में ही समय गुजर गया. फाइलों का ढेर बनता गया, लेकिन इन मंत्रियों को तो दस्तखत करने की ही फुर्सत नहीं थी.
विभाग के काम और नियमों को समझने की मेहनत करनी थी, लेकिन ये दरबार लगाते रहे, लाल बत्ती लगाकर दौरा करते रहे , कभी समझ में आया कि काम करना चाहिये तो अफसर को बुला कर एक फतवा जारी कर दिया, पता ही नहीं कि उसका पालन नियम –विरुद्ध होगा. जब पालन नहीं हुआ, अफसरों के तबादले का हुक्म दे दिया, अखबार वालों को बुलाकर दुखडा रो दिया कि अफसर काम ही नहीं करने देते. एक तो खुद काबिल नहीं थे, ऊपर से काम समझने की कोशिश ही नहीं की, किसी पर भरोसा भी नहीं किया, किसी ने आगे बढकर करने की कोशिश की तो उसे भी पीछे खींच लिया. अफसरों और कर्मचारियों के लिये ऐसी स्थिति बडी सुखद होती है, उन्हें खुली चरागाह मिलती है. शुरू में तो परियोजनाओं पर काम टलता जायेगा और जब मार्च आयेगा या चुनाव सिर पर होगा, तब सारे बकाया कामों को तत्काल पूरा करने का आदेश मुख्य मंत्री जारी कर देंगे: छह महीनों में एक लाख तालाब खुदवाने का असंभव काम हो या पाँच दिन में पचास हजार साइकिलें खरीदनी हों, या आवेदन मंगाकर इम्तहान लेकर पंदरह हजार सिपाहियों की नियुक्ति पंदरह दिनो में करने की बात हो या जाडा खत्म होने पर कंबल खरीदने हों, सारी प्रक्रिया ताक पर रखकर इन सरकारी कर्मचारियों को मनमानी करने और कमाने खाने की पूरी छूट मिल जाती है.
यदि एक रिंग रोड बन जाती , तो रांची के ट्रैफिक की आधी समस्या हल हो जाती, लेकिन इतने महत्वपूर्ण प्रॉजेक्ट पर कुछ नहीं हुआ. रांची की सडकों और चौराहों पर ट्रैफिक का अध्ययन कर सर्वोत्तम समाधान देने की जिम्मेदारी किसी विशेषज्ञ एजेंसी को नहीं दी गयी, कभी किसी सुखदेव सिंह ने अपना हिटलरी फरमान जारी किया, तो कभी किसी प्रदीप कुमार ने अतिक्रमण हटाने का नाटक चार दिन करके हडकंप पैदा कर दिया. ट्रैफिक समस्या के टोटल सोल्युशन के लिये कोई प्रयास नहीं किया गया. पतली गलियों के दुकानदार अपनी दुकानों के आगे सुबह से शाम तक अपनी गाडी पार्क कर आधा रास्ता जाम कर देते हैं, कोई बोलनेवाला नहीं. सँकरे रास्तों पर ऐसे बैंक और दफ्तर खुलते रहे जहाँ आम जनता अधिक आयेगी और अपने वाहन खडे करेगी, रास्ता जाम होगा, एक बच्चा भी इसकी कल्पना कर लेगा, लेकिन कोई मना करने वाला नहीं.
किसी के अंदर सिविक सेंस नहीं, यह आता है अच्छे संस्कारों से या अनुशासन से, राँची में दोनो की कमी है. बच्चों और अभिभावकों में इसके प्रति जागरुकता उत्पन्न करने के लिये स्वयंसेवी संस्थाओं को आगे आना होगा, स्कूल – कॉलेजों में सघन अभियान चलाने होंगे, लेकिन साथ- साथ प्रशासन को सख्ती से ट्रैफिक नियम लागू करने होंगे, निष्पक्ष होकर अतिक्रमण हटाने होंगे, तभी सकारात्मक परिणामों की उम्मीद की जा सकती है.
आज राँची में पार्क –बगीचे एवं मैदानों की कमी है, तालाबों को भरकर कॉलोनियां बनायी जा रही हैं, खूबसूरत तालाबों और पहाडियों का स्वरूप अतिक्रमण से निरंतर बिगड रहा है , पर प्रशासन सो रहा है. नियम बन जाना चाहिये कि अब किसी भी मैदान के साथ छेड छाड की अनुमति नहीं मिलेगी.
बी.आइ.टी ने अपना विस्तार किया, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय में सुधार हो रहा है लेकिन राँची विश्वविद्यालय की हालत अभी भी खस्ता है, मेडिकल कॉलेज को रिम्स बनाकर समझ लिया गया कि उसकी तरक्की हो गयी, लेकिन वहाँ जाने वालों को स्थिति बदतर ही नजर आती है. सदर अस्पताल के बारे में बात न करें, वही ठीक है. कुछ प्रायवेट अस्पताल एवं नर्सिंग होम हैं , लेकिन सुपर स्पेशलिस्ट की कौन कहे, कायदे के स्पेशलिस्ट भी उपलब्ध नहीं.
यहाँ व्यापार बढा, बडी कंपनियों के अपने दफ्तर खुले, सी एंड एफ एजेंट बहाल हुए, बैंकों के रीजनल ऑफिस आ गये, रेलवे के डी आर एम आ गये, कुछ नयी रेलगाडियों की सौगात मिल गयी, भीड भाड बढ गयी, लेकिन नये कारखाने नहीं खुले, उम्मीद भी नहीं लगती.
एक राजधानी के अनुरूप न तो साइंस पार्क है , न कोई इनडोर स्टेडियम, वर्तमान चिडियाघर और अजायबघर के विस्तार की जरूरत है, आर्ट गैलरी और ऑडिटोरियम की कल्पना काफी दूर लगती है. रिंग रोड की तत्काल आवश्यकता है, ग्रेटर राँची तो अपने आप उसके आस पास बसती जायेगी.
बेहतर राँची का सपना तोडने में मुख्य रूप से सभी मंत्री और उनकी सरकार जिम्मेदार है, गुनहगार हैं अफसर और सरकारी कर्मचारी , लेकिन जनता भी कम दोषी नहीं. कहीं पर कुछ बनाने का प्रस्ताव आया नहीं कि लोगों का अडंगा पहले आ जाता है. विस्थापन के खिलाफ आवाज बुलन्द होने लगती है. मुझे समझ में नहीं आता कि मुआवजे में धन क्यों दिया जाता है, जमीन के बदले आस-पास में कुछ अधिक जमीन क्यों नहीं दी जाती. सरकार की जमीन तो सभी जगह है. विस्थापितों के लिये ईमानदारी से आस पास ही एक सर्व सुविधा संपन्न कॉलोनी बना देनी चाहिये, समय के साथ उसकी कीमत मूल जमीन से भी अधिक हो जायेगी. आरक्षण के नाम पर स्वार्थी राजनैतिक दलों और नेताओं ने और बडी बाधा खडी कर रखी है, किसी भी विभाग में कोई नियुक्ति कायदे से नहीं हो पा रही. शिक्षकों के स्थान पर पारा- शिक्षक और नियमित डॉक्टरों की जगह सालभर की नियुक्ति – सारी नियुक्तियाँ रुकी पडी हैं. काबिल लोगों को लिया जा सकता, तो विकास को गति मिलती, लेकिन आदिवासी-सदान और भीतरी-बाहरी के नाम पर सब कुछ रुका पडा है. वर्ग संघर्ष के नाम पर उत्पात मचा रहे उग्रवादी तो और भी बडी अडचन हैं. जब राँची ही बेहतर न बन सकी , तो झारखंड के विकास का दावा स्वयं बेमानी हो जाता है.

Comments

Popular posts from this blog

“हर घड़ी शुभ घड़ी, हर वार शुभ वार”

रांची के हरमू स्थित श्मशान घाट का नाम ‘मुक्तिधाम’ है जिसे मारवाड़ी सहायक समिति ने बहुत सुंदर बनाया है, बारिश एवं धूप से चिताओं की सुरक्षा हेतु बड़े- बड़े शेड बने हैं, चिता बुझने का इंतजार करने वाले लोगों के लिये बैठने की आरामदायक व्यवस्था है, जिंदगी की क्षणभंगुरता को व्यक्त करते एवं धर्म से नाता जोड़ने की शिक्षा देते दोहे एवं उद्धरण जगह- जगह दीवारों पर लिखे हैं. हर तरह के लोग वहां जाते हैं, दोहे पढ़ते हैं, कुछ देर सोचते भी हैं, मुक्तिधाम से बाहर निकलते ही सब कुछ भूल जाते हैं. इन दोहों का असर दिमाग पर जीवन से भी अधिक क्षणभंगुर होता है.मुक्तिधाम में गुरु नानकदेव रचित एक दोहा मुझे बहुत अपील करता है- “हर घड़ी शुभ घड़ी, हर वार शुभ वार; नानक भद्रा तब लगे जब रूठे करतार.” पता नहीं दूसरे क्या समझते व सोचते हैं. आज से पचास साल पहले लोग यात्रा पर निकलने से पूर्व मुहूर्त दिखला लेते थे, जिस दिशा में जाना है, उधर उस दिन दिशाशूल तो नहीं, पता कर लेते थे. अमुक- अमुक दिन दाढी नहीं बनवानी, बाल एवं नाखून नहीं कटवाने, इसका भी कड़ाई से पालन करते थे. मूल नक्षत्र में कोई पैदा हो गया, तो अनिष्ट की आशंका दूर करने हेतु ...

रैगिंग- क्या, क्यों और क्यों नहीं ?

हर वर्ष नये एडमिशन के बाद पूरे देश के अनेक इंजीनियरिंग, मेडिकल, मैनेजमेंट और कुछ अन्य कॉलेजों में जब नये छात्र प्रवेश लेते हैं, तो पुराने सीनियर छात्र उन्हें नये माहौल में ढालने के नाम पर उनकी रैगिंग करते हैं. रैगिंग का मतलब ही होता है किसी की इतनी खिंचाई करना कि उसके व्यक्तित्व और स्वाभिमान के चीथड़े- चीथड़े हो जाएं. कई सीनियर छात्रों के द्वारा किसी एक नये छात्र को घेरकर ऊलजलूल सवाल करना और हर जबाब को गलत बताते हुए खिल्ली उड़ाना, ऊटपटांग हरकतें करवाना, गालीगलौज और अश्लील बातें करके नये छात्रों को मानसिक और शारीरिक यंत्रणा देना ही रैगिंग है. रैगिंग के परिणाम स्वरूप हर वर्ष दो-चार छात्र आत्महत्या कर लेते हैं, कुछ मानसिक रूप से गंभीर बीमार हो जाते हैं. वैसे तो अधिकांश नये छात्र रैगिंग के फलस्वरूप अल्ट्रामॉडर्न बन जाते हैं, लेकिन कुछ लड़कों को रैगिंग के दौरान जबर्दस्त झटका लगता है. वे जो कुछ बचपन से किशोरावस्था तक पहुंचने में सीखे हुए होते हैं, सब एक झटके में धराशायी हो जाता है. यहां तो हर वाक्य में “मां-बहन” को लपेटती हुई बुरी- बुरी गालियां दी जाती हैं, सिखाई और रटवाई जाती हैं, वर्जित सेक्स ...

मैं छात्र नेता बना

इंटरमीडिएट के बाद मैंने डिग्री कालिज में प्रवेश लिया, महत्वाकांक्षाओं और संकल्पों के साथ. घर से दूर छात्रावास में रहने का पहला अनुभव था. पहले ही दिन सीनियर छात्रों के द्धारा तंग किया गया. बड़ी लानत-मलानत हुई. एक ने कहा, “साला बड़ा उजड्ड दीखता है! अबे, काठ के उल्लू, क्या बाप ने मुर्गीखाना समझ कर भेज दिया है ? यह सिर का एरियल क्या...” एक भद्दी सी गाली मिली. दूसरा चिल्लाया, बेटा, 70 परसेंट लेने से कोई फायदा नहीं. आजकल नालेज और परसेंटेज को कोई नहीं पूछता. होनी चाहिए स्मार्टनेस और धांसू परसनैलटी या फिर सोर्स. यदि इसी तरह 18 इंच मोहरी की पैंट पहने और सिर पर एरियल रखे घूमते रहोगे, तो कोई चवन्नी भर को भी न पूछेगा.” “अरे, छोड़ो यार, ये साले बलियाटिक क्या जानें पहनना और ओढ़ना. सारी उमर तो भैंस चराने में बीती. चले आए यहां डिग्री लेने.” “चल बे चल साले. अगर कल यह एरियल और मूंछ नजर आई तो यहीं पर उखाड़ कर फेंक दूंगा,” कह कर उस ने मेरी मूंछें कस कर मरोड़ दीं. मैं दर्द से बिलबिला पड़ा. मन तो हुआ कि इसी जगह पर निपट लिया जाए, पर उन की संख्या अधिक देख कर खून का घूंट पी गया. सब से ज्यादा खल रहे थे मेरी जाति, परिव...