खबर थी झारखण्ड की राजधानी के लिए रांची से पंद्रह किलोमीटर पर एक नये अत्याधुनिक शहर का निर्माण किया जायेगा, जिसके लिए दो हजार करोड़ रुपयों के व्यवस्था की जा रही है और जिसके प्रारूप का दायित्व मेकॉन को दिया गया है. मेकॉन के इंजीनियरों ने प्रारंभिक प्रारूप बनाकर प्रस्तुत भी कर दिया है, जिसे मुख्य सचिव ने कई परिवर्तनों का सुझाव देते हुए उसमें सुधार करने का निर्देश दिया है. झारखण्ड आन्दोलन का उद्देश्य कभी भी यह नहीं रहा कि रांची को हाइटेक सिटी बनाया जाय या चण्डीगढ़ की तर्ज पर इसका पुनर्निर्माण किया जाय. दो हजार करोड़ की रकम एक बहुत बड़ी धनराशि है, जिसका उपयोग यदि विवेकपूर्ण एवं ईमानदार ढंग से किया जाय, तो यहां के दो हजार गांवों को आदर्श गांव बनाया जा सकता है. एक गांव के विकास के लिए एक करोड़ की धनराशि का काफी महत्व होता है, हां ईमानदारी एवं गांववालों की सम्मिलित सहमति से इसे खर्च करने की जरूरत है. राजधानी के लिए रांची में जितनी सुविधाएं है, अगले बीस वर्षों के लिए काफी हैं – सिर्फ जरूरत है रांची शहर के प्रबंधन की. सड़कों का अतिक्रमण सख्ती से हटा कर उन्हें चौड़ा करना, मुख्य सड़कों पर जुलूस और धरनों पर प्रतिबंध, विद्युत उत्पादन और आपूर्ति में सुधार. अस्पतालों और स्कूलों के प्रबंधन में सुधार, पेयजल व्यवस्था की उचित देखरेख, विधि-व्यवस्था के लिए पुलिस विभाग को हर प्रकार से सशक्त बनाना. रांची की वर्तमान सुविधाओं की देखरेख एवं उनका प्रबंधन यदि योग्य हाथों में दिया जाय, राजनैतिक हस्तक्षेप को एकदम रोक दिया जाये, तो बिना अधिक खर्च के वर्तमान रांची की एक आदर्श राजधानी की शर्तों पर खरा उतरेगी. नया शहर बसाकर सिर्फ मंत्रियों और उनके अफसरों को अधिक विलासितापूर्ण जीवन ही मुहैया कराया जाएगा. उनकी कार्यक्षमता में कोई वृद्धि नहीं होगी. अति साधारण सुविधाओं का उपयोग करते हुए गांधीजी ने बहुत कम समय में इतने बड़े-बड़े काम कर दिये – आज लोग इस बात को भूल जाते हैं. काम करने के लिए कुछ आधारभूत सुविधाओं के साथ चाहिये लगन, ईमानदारी और इच्छाशक्ति. झारखण्ड सरकार को चाहिए कि अपने सीमित संसाधनों का उपयोग यहां के गावों और पिछड़े इलाकों का विकास करने में करे, ताकि आम आदमी का जीवन स्तर सुधरे और उग्रवाद की समस्या हल हो. मेकॉन, सी.एम.पी.डी.आई., सी.सी.एल. और बी.आई.टी जैसे तकनीकी संस्थानों को वर्तमान रांची शहर की समस्याओं को दूर करने के उपाय निकालने का प्रोजेक्ट देना चाहिए – ऐसे उपाय जिनमें फिजूलखर्ची न हो – अण्णा हजारे जैसे समर्पित लोगों से सुझाव मांगने चाहिये तथा उन्हें परामर्शदाता बनाकर प्रोजेक्ट बनवाने चाहिए और फिर नयी राजधानी के लिए प्राप्त होने वाली दो हजार करोड़ की राशि को गांवों के विकास कार्यों पर खर्च करना चाहिये. यह निवेश दूरगामी परिणाम देगा. गांवों की समृद्धि व शांति लायेगी. उग्रवाद खत्म होगा, औद्योगिक विकास का रास्ता साफ होगा
रांची के हरमू स्थित श्मशान घाट का नाम ‘मुक्तिधाम’ है जिसे मारवाड़ी सहायक समिति ने बहुत सुंदर बनाया है, बारिश एवं धूप से चिताओं की सुरक्षा हेतु बड़े- बड़े शेड बने हैं, चिता बुझने का इंतजार करने वाले लोगों के लिये बैठने की आरामदायक व्यवस्था है, जिंदगी की क्षणभंगुरता को व्यक्त करते एवं धर्म से नाता जोड़ने की शिक्षा देते दोहे एवं उद्धरण जगह- जगह दीवारों पर लिखे हैं. हर तरह के लोग वहां जाते हैं, दोहे पढ़ते हैं, कुछ देर सोचते भी हैं, मुक्तिधाम से बाहर निकलते ही सब कुछ भूल जाते हैं. इन दोहों का असर दिमाग पर जीवन से भी अधिक क्षणभंगुर होता है.मुक्तिधाम में गुरु नानकदेव रचित एक दोहा मुझे बहुत अपील करता है- “हर घड़ी शुभ घड़ी, हर वार शुभ वार; नानक भद्रा तब लगे जब रूठे करतार.” पता नहीं दूसरे क्या समझते व सोचते हैं. आज से पचास साल पहले लोग यात्रा पर निकलने से पूर्व मुहूर्त दिखला लेते थे, जिस दिशा में जाना है, उधर उस दिन दिशाशूल तो नहीं, पता कर लेते थे. अमुक- अमुक दिन दाढी नहीं बनवानी, बाल एवं नाखून नहीं कटवाने, इसका भी कड़ाई से पालन करते थे. मूल नक्षत्र में कोई पैदा हो गया, तो अनिष्ट की आशंका दूर करने हेतु ...
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