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आदिवासी मुख्यमंत्रियों से बेहतर है राष्ट्रपति शासन ?

झारखंड राज्य के गठन के बाद नौ बार गणतंत्र दिवस समारोह का आयोजन किया जा चुका. आदिवासी बहुल इस क्षेत्र को अलग raajy बनाने के लिये बहुत लंबा आंदोलन चला, मान्यता यही थी कि खनिजसंपन्न इस क्षेत्र में आदिवासियों का सर्वांगीण विकास अपने अलग राज्य में ही उनके ही हाथों से हो सकता है. विगत आठ वर्षों में यहां भयंकर राजनैतिक उथल पुथल हुई, एक निर्दलीय भी मुख्यमंत्री बना, अन्य आदिवासी मंत्रियों ने भी भ्रष्टाचार की हुगली में नंगा स्नान किया, इनके एजेंडे में झारखंड या अदिवासियों के विकास की बात दूर -दूर तक नही रही, सब ने मिलकर इतनी छीछालेदर कर दी कि राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा.

राज्य-गठन के आठ वर्षों में झारखंड में चार मुख्य मंत्री हुए, चारों आदिवासी, अधिकांश मंत्री भी आदिवासी ही रहे, काबिल या नाकाबिल होने से कोई फर्क नहीं पड़ता, बस आदिवासी होने का ठप्पा होना चाहिये. वैसे तो ऐसा कोई कानून नहीं है, केवल आदिवासियों के तुष्टिकरण के लिये यह प्रथा चल पडी है.झारखंड गठन के प्रथम दिवस से ही हम एक गलत सोच के शिकार हैं कि आदिवासी ही आदिवासियों की समस्याओं को समझकर उनका निदान निकाल सकते हैं. झारखंड और छत्तीसगढ़ राज्य साथ-साथ बने, यहां 26.3% आदिवासी हैं जबकि छत्तीसगढ़ में 31.8% हैं. छत्तीसगढ़ में गैर आदिवासी डॉ रमन सिंह ने विगत 5 वर्षों में वहां मुख्य मंत्री के रूप मे सुशासन और विकास की गंगा बहा दी है और यहां चार आदिवासी मुख्यमंत्रियों ने झारखंड को अराजकता के गर्त में पहुंचा दिया है, अधोपतन इतना कि राष्ट्रपति शासन ही लग गया. छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के विकास की योजनाएं मूर्त रूप ले रही हैं और यहाँ तो अबतक कोई योजना ही नहीं बन पायी. आदिवासी संस्कृति, आदिवासी अस्मिता एवं अस्तित्व की रक्षा के लिये आदिवासी नेतृत्व आवश्यक है, इस बात में कितना दम है इसे आँकने के पहले आइये हम यह तो देखें कि किस आदिवासी संस्कृति और अस्मिता की बातें ये लोग करते हैं

सही हो या गलत, भला लगे या बुरा, लेकिन यह कटु सत्य है कि सभ्यता को वर्तमान स्वरूप तक पहुंचाने में आदिवासियों का कोई योगदान नहीं है. हजारों सालों तक वे विकसित होते समुदायों से हमेशा कटे रहे, दूर रहे.यह भी हो सकता है कि डरा- धमका कर सभ्यता के हर दौर में उन्हें पलायन को मजबूर किया गया हो. आज जब मुख्य धारा में उनके आने का संयोग बन रहा है तो उनके ही स्वार्थी नेता अपनी संस्कृति के लुप्त एवं दूषित हो जाने का भय दिखलाकर रुकावटें खड़ी कर रहे हैं. आदिवासी संस्कृति को बचाने के नाम पर उन्हें आज की सभ्यता-संस्कृति से दूर रखना उन्हें अजायबघर और चिड़ियाघर की चीजें बनाए रखने की तरह है. आदिवासियों के पहनावे में परिवर्तन कितना वांछनीय होगा, यदि वे सिर्फ एक लंगोटी पहनते हैं और उनकी औरतें ब्लाउज से दूर भागती हैं तो क्या उन्हें कुर्ता-पैजामा या कमीज-पैंट और उनकी महिलाओं को साड़ी- ब्लाउज पहनाने से उनकी संस्कृति खतरे में पड़ जाएगी? यदि सिर्फ मांड़-भात, नमक और हड़िया पर उनका गुजारा होता है, तो क्या उन्हें आधुनिक हजारों व्यंजनों से परिचित कराना और उनका चस्का लगाना उनकी संस्कृति को विकृत करना नहीं होगा? इस तरह के अनेक सवाल उनके बर्तनों, घरों और अन्य दैनिक जरूरतों के साधनों के संबन्ध में उठेंगे. फिर बात आएगी यातायात, संचार, मनोरंजन, चिकित्सा और आराम के आधुनिक साधनों के इस्तेमाल की. प्रश्न उठेगा कि बिजली का इस्तेमाल वे कैसे और क्यों करेंगे. क्या होगा उनकी शिक्षा का, व भाषा का, सबकुछ तो एकदम अलग है, क्या छोड़ेंगे, क्या अपनाएंगे और क्यों अपनाएंगे? अब बारी आएगी संगीत, कला और साहित्य की. इन क्षेत्रों में अभी भी वे प्रारंभिक दौर में ही हैं, क्या उन्हें आधुनिक उपकरणों एवं विकास के अन्य सोपानों के इस्तेमाल से परहेज न होगा ?

आदिवासी अपने आप में मस्त होते हैं, ऊपर उठने की कोई ललक उनके अंदर नहीं होती. अपने वर्तमान से संतुष्ट रहने के कारण और अच्छे जीवन स्तर के आनंद से अनभिज्ञ होने के कारण वे कभी अपने काम के प्रति गंभीर नहीं होते, अधिकांश के अंदर औसत से काफी कम इंटेलिजेंस होती है. ताकत तो काफी होती है, सहनशक्ति भी होती है, लेकिन फुर्ती और चपलता का अभाव होता है. निरंतर काम करने की रुचि नहीं होती. मन हुआ तो काम पर गये, वरना हँड़िया या देशी दारू पीकर घर पर ही पड़े रहे. ऐसी हालत में कौन उद्दमी इन्हें अपने यहां काम पर रखकर खुश रहेगा. जबतक इन्हें सही रूप से शिक्षित नहीं किया जाएगा, इनकी सोच में बदलाव नहीं आएगा, कुछ भी दे दिया जाए, कितना भी दे दिया जाए ये वापस दयनीय स्थिति में आ जाएंगे. ईसाई मिशनरियां अपने विद्यालयों में इन्हें उचित शिक्षा देकर एवं गिरजाघरों में सही मार्गदर्शन कर इनकी जीवन शैली एवं जीवन स्तर में गुणात्मक सुधार ले आती हैं. इन मिशनरियों की तरह ही लगन और ईमानदारी से अन्य संस्थाओं को काम करना होगा. हजारों सालों से जिस जड़ता का शिकार ये लोग रहे, उससे बाहर निकलना बहुत मुश्किल होता है, ईमानदार कोशिश कहीं भी नहीं हो रही, अपने और पराए दोनों ही लोग बस उन्हें सीढी बनाकर अपना विकास कर रहे हैं.

आदिवासियों का रत्ती भर भी आर्थिक विकास आठ वर्षों में नहीं हो पाया, हां, कुछ आदिवासी नेता अपने परिवार के साथ करोड़पति और अरबपति अवश्य हो गये.परिस्थितिवश आदिवासियों में अपने अधिकारों के लिये पहली बार कुछ जागरुकता आयी है, लेकिन लूट खसोट एवं भ्रष्टाचार में लिप्त सरकारी कर्मचारियों, पदाधिकारियों और राजनेताओं से त्रस्त होकर वे या तो नक्सलवादी दलों में शामिल हो रहे हैं या फिर अपराध के रास्ते पकड़ रहे हैं. उनके आसपास के गैरआदिवासी अपनी जमीनें बेच- बेचकर लाखों में खेलने लगे, वे बेचारे न तो अपनी जमीन बेच पा रहे, न सरकारी योजनाओं का लाभ उन तक पहुंच रहा, न आरक्षण का ही कोई फायदा उन्हें मिल रहा. उनके बच्चों की निःशुल्क शिक्षा के लिये सरकारी आवासीय विद्यालय हैं, सरकारी धन उपलब्ध कराया जा रहा है, लेकिन नतीजा शून्य है, शिक्षकों एवं शिक्षा-पदाधिकारियों की लूट ने इन विद्यालयों को मुरगी के दरबों से भी बदतर बना दिया है, बच्चे वहां बनने की जगह बिगड़ रहे हैं.इन भोलेभाले आदिवासियों और बाकी लोगों की मानसिक क्षमता एवं मोटिवेशन में इतना बड़ा गैप हो गया है कि वे आधुनिक समाज में मिसफिट हो रहे हैं. जंगल से निकलकर मुख्य धारा में आने की कोशिश में उनकी स्थिति धोबी के कुत्ते जैसी हो गयी है जो न घर का रहा, न घाट का. साथ में अपनी संस्कृति (कौन सी संस्कृति?) को बचाकर रखने का दबाव अलग से बना दिया गया है. एक बड़े भ्रम के भंवर में सब फँस गए हैं, क्या छोड़ें, क्या रखें और क्या नया अपनाएं, कौन स्पष्ट करेगा ? इन आदिवासियों का जीवन स्तर ऊपर उठे, उनकी संस्कृति की अच्छी बातें भी बरकरार रहें, यह सब काम एक ऐसा निस्वार्थ एवं जानकार व्यक्ति ही कर सकता है जो आदिवासियों के साथ लंबे समय से जुड़ा हो, जिसके अंदर प्रशासकीय क्षमता हो,जो विजनरी होने के साथ साथ आधुनिक टेक्नोलॉजी की ताकत को स्वीकारता हो.यदि ऐसा व्यक्ति झारखंड में नहीं और बाहर उपलब्ध है तो बाहर से ही ले आकर मुख्य मंत्री बना देना चाहिए. यहां की व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिये वर्तमान राष्ट्रपति शासन एक अवसर है,.राज्यपाल ने एक काबिल सलाहकार मंडल का गठन कर एवं तत्काल कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लेकर प्रशासन में चुस्ती लाने का सराहनीय प्रयास किया है और नई आशाएं जगाई हैं. राज्य गठन के तुरंत बाद यहां और बिहार में छह महीने का राष्ट्रपति शासन लगा देना था, सभी निगमों और विभागों की परिसंपत्तियों तथा कर्मचारियों का उचित बंटवारा करके, प्रशासन एवं व्यवस्था को ठीक करके ही जनप्रतिनिधियों को सरकार बनाने के लिये आमंत्रित करना था. अनेक परिसंपत्तियों का बंटवारा आज तक नहीं हो पाया. आइये उम्मीद करें कि राष्ट्रपतिशासन इस झारखंड राज्य के लिये लाभकारी होगा.

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