Skip to main content

पोस्टिंग के लिए साल भर से बैठे हैं डॉक्टर

बिहार सरकार हमेशा ही खजाना खाली होने का रोना रोती रही है. ठीक है कि आर्थिक संसाधनों की कमी है, लेकिन इसके लिए वह स्वयं ही जिम्मेदार है. जो भी साधन उपलब्ध है, उनका ठीक से प्रबंधन यह सरकार विगत दस वर्षों में नहीं कर पायी. घोटालों की वजह से जो बर्बादी हुई है और हो रही है, उसकी बात तो अलग ही है, लेकिन दैनिक प्रशासनिक कार्यकलापों में भी बदइंतजामी बदस्तूर जारी है, कोई मां-बाप नहीं है. एक डाक्टर हैं जिनका ट्रांसफर साल भर पहले हो गया, लेकिन किसी भी नयी जगह पर उन्हें पोस्टिंग आज नहीं मिली. एक डाक्टर पर बिहार सरकार को लगभग औसतन पंद्रह हजार रुपये खर्च करना पड़ा है और करीब 120 डाक्टर बिना पोस्टिंग के बैठे हैं. उन्हें कोई चिंता भी नहीं क्योंकि खाली बैठने की अवधि का वेतन भी उन्हें भी बाद में मिल ही जाना है. बिना पोस्टिंग के खाली बैठे 120 डॉक्टरों पर सरकार को लगभग अठारह लाख रुपये प्रतिमाह का खर्च आ रहा है. ऐसा नहीं है कि ये डॉक्टर सरप्लस है. आज भी अनेक अस्पतालों में डॉक़्टर न होने का रोना सरकार रोती जा रही है, फिर क्या औचित्य है इन डॉक्टरों को खाली बैठाने की. पोस्टिंग का सारा खेल सेक्रेटेरिएट के ये बाबू लोग पहले झारखण्ड क्षेत्र के डॉक्टरों की पोस्टिंग उत्तर बिहार में और वहां के डॉक्टरों का पोस्टिंग झारखण्ड में कर देते थे. उसके बाद शुरू होता था इन डॉक्टरों की दौड़ – सेक्रेटेरियट तक और मंत्रियों के पास, अपने-अपने क्षेत्र में पोस्टिंग के लिए. हथेलियां गर्म करने का सिलसिला जारी हो जाता था और मोटी रकमें इन बाबुओं और मंत्रियों के जेब में पहुंच जाती थी. झारखण्ड राज्य बनने के साथ ही इन बाबुओं का खेल गड़बड़ा गया है. झारखण्ड वाले झारखण्ड में और बिहार के डॉक्टर बिहार में. नतीजा इन बाबुओं की जेब गर्म करने को कोई तैयार नहीं और बाबुओं को भी पोस्टिंग की फाइल मंत्रियों तक बढ़ाते की कोई हड़बड़ी नहीं, मंत्रियों को भी फाइलों को सूखा निपटाने में कोई रूचि नहीं. बर्बाद होता रहे सरकार का अठारह लाख रुपया हर महीने जो साल भर में जुड़कर सवा दो करोड़ पहुंच जायेगा. अनेक डॉक्टरों की पोस्टिंग तो सालभर से नहीं हुई. यह सिर्फ एक विभाग का मामला नहीं – पूरे राज्य का ट्रांसफर-पोस्टिंग खेल इसी प्रकार चल रहा है – सरकारी खजाने को चबना लगे तो लगे-विभागों में विकास कार्य ठप्प पड़ा रहे तो रहे, विकास कार्यों के लिए आयी धनराशि केन्द्र सरकार को भले ही लौट जाए, इन कर्मचारियों, बाबुओं और अफसरों को तनख्वाह मिलती रहेगी, मंत्रियों के घरों में घोटालों की धनराशि का बड़ा हिस्सा पहुंचता रहेगा. शायद यह नतीजा है, आरक्षण की बैसाखी पर ऊपर पहुंचे पदाधिकारियों और मंत्रियों की नाकाबलियत और निष्क्रियता का. कुछ सीखकर आगे बढ़ने की अपनी क्षमता बढ़ाने की किसी भी इच्छाशक्ति का अभाव दिखलायी पड़ता है इनमें. बिना मेहनत के जब कुछ मिल जाता है तो उसकी कीमत समझ में नहीं आती. खैर जो भी हो, बिहार को कंगाल बनाने में सभी का हाथ है. चाहे वे आरक्षित सीट से आये हों, या सामान्य वर्ग. अब समय आ गया है कि प्रबंधन की त्रुटियों को तत्काल दूर किया जाए और दोनों राज्यों को बदइंतजामी के अभिशाप से मुक्ति दिलायी जाए – इसका सबसे कारगर उपाय है ‘ई-गवर्नेंस’ सारी ट्रांसफर-पोस्टिंग यदि कम्प्यूटर से हो तो आधा भ्रष्टाचार वहीं खत्म हो जाए.

Comments

Popular posts from this blog

“हर घड़ी शुभ घड़ी, हर वार शुभ वार”

रांची के हरमू स्थित श्मशान घाट का नाम ‘मुक्तिधाम’ है जिसे मारवाड़ी सहायक समिति ने बहुत सुंदर बनाया है, बारिश एवं धूप से चिताओं की सुरक्षा हेतु बड़े- बड़े शेड बने हैं, चिता बुझने का इंतजार करने वाले लोगों के लिये बैठने की आरामदायक व्यवस्था है, जिंदगी की क्षणभंगुरता को व्यक्त करते एवं धर्म से नाता जोड़ने की शिक्षा देते दोहे एवं उद्धरण जगह- जगह दीवारों पर लिखे हैं. हर तरह के लोग वहां जाते हैं, दोहे पढ़ते हैं, कुछ देर सोचते भी हैं, मुक्तिधाम से बाहर निकलते ही सब कुछ भूल जाते हैं. इन दोहों का असर दिमाग पर जीवन से भी अधिक क्षणभंगुर होता है.मुक्तिधाम में गुरु नानकदेव रचित एक दोहा मुझे बहुत अपील करता है- “हर घड़ी शुभ घड़ी, हर वार शुभ वार; नानक भद्रा तब लगे जब रूठे करतार.” पता नहीं दूसरे क्या समझते व सोचते हैं. आज से पचास साल पहले लोग यात्रा पर निकलने से पूर्व मुहूर्त दिखला लेते थे, जिस दिशा में जाना है, उधर उस दिन दिशाशूल तो नहीं, पता कर लेते थे. अमुक- अमुक दिन दाढी नहीं बनवानी, बाल एवं नाखून नहीं कटवाने, इसका भी कड़ाई से पालन करते थे. मूल नक्षत्र में कोई पैदा हो गया, तो अनिष्ट की आशंका दूर करने हेतु ...

रैगिंग- क्या, क्यों और क्यों नहीं ?

हर वर्ष नये एडमिशन के बाद पूरे देश के अनेक इंजीनियरिंग, मेडिकल, मैनेजमेंट और कुछ अन्य कॉलेजों में जब नये छात्र प्रवेश लेते हैं, तो पुराने सीनियर छात्र उन्हें नये माहौल में ढालने के नाम पर उनकी रैगिंग करते हैं. रैगिंग का मतलब ही होता है किसी की इतनी खिंचाई करना कि उसके व्यक्तित्व और स्वाभिमान के चीथड़े- चीथड़े हो जाएं. कई सीनियर छात्रों के द्वारा किसी एक नये छात्र को घेरकर ऊलजलूल सवाल करना और हर जबाब को गलत बताते हुए खिल्ली उड़ाना, ऊटपटांग हरकतें करवाना, गालीगलौज और अश्लील बातें करके नये छात्रों को मानसिक और शारीरिक यंत्रणा देना ही रैगिंग है. रैगिंग के परिणाम स्वरूप हर वर्ष दो-चार छात्र आत्महत्या कर लेते हैं, कुछ मानसिक रूप से गंभीर बीमार हो जाते हैं. वैसे तो अधिकांश नये छात्र रैगिंग के फलस्वरूप अल्ट्रामॉडर्न बन जाते हैं, लेकिन कुछ लड़कों को रैगिंग के दौरान जबर्दस्त झटका लगता है. वे जो कुछ बचपन से किशोरावस्था तक पहुंचने में सीखे हुए होते हैं, सब एक झटके में धराशायी हो जाता है. यहां तो हर वाक्य में “मां-बहन” को लपेटती हुई बुरी- बुरी गालियां दी जाती हैं, सिखाई और रटवाई जाती हैं, वर्जित सेक्स ...

मैं छात्र नेता बना

इंटरमीडिएट के बाद मैंने डिग्री कालिज में प्रवेश लिया, महत्वाकांक्षाओं और संकल्पों के साथ. घर से दूर छात्रावास में रहने का पहला अनुभव था. पहले ही दिन सीनियर छात्रों के द्धारा तंग किया गया. बड़ी लानत-मलानत हुई. एक ने कहा, “साला बड़ा उजड्ड दीखता है! अबे, काठ के उल्लू, क्या बाप ने मुर्गीखाना समझ कर भेज दिया है ? यह सिर का एरियल क्या...” एक भद्दी सी गाली मिली. दूसरा चिल्लाया, बेटा, 70 परसेंट लेने से कोई फायदा नहीं. आजकल नालेज और परसेंटेज को कोई नहीं पूछता. होनी चाहिए स्मार्टनेस और धांसू परसनैलटी या फिर सोर्स. यदि इसी तरह 18 इंच मोहरी की पैंट पहने और सिर पर एरियल रखे घूमते रहोगे, तो कोई चवन्नी भर को भी न पूछेगा.” “अरे, छोड़ो यार, ये साले बलियाटिक क्या जानें पहनना और ओढ़ना. सारी उमर तो भैंस चराने में बीती. चले आए यहां डिग्री लेने.” “चल बे चल साले. अगर कल यह एरियल और मूंछ नजर आई तो यहीं पर उखाड़ कर फेंक दूंगा,” कह कर उस ने मेरी मूंछें कस कर मरोड़ दीं. मैं दर्द से बिलबिला पड़ा. मन तो हुआ कि इसी जगह पर निपट लिया जाए, पर उन की संख्या अधिक देख कर खून का घूंट पी गया. सब से ज्यादा खल रहे थे मेरी जाति, परिव...