मार्च का महीना आया और मार्च लूट की चर्चा शुरू हो गयी. जबसे होश सँभाला मार्च लूट देखता और सुनता आ रहा हूँ. अखंड बिहार में तो यह रोग़ बेरोकटोक चलता रहा, झारखंड में भी जारी है, दूसरे सभी राज्यों में भी कमोबेश यह बीमारी मौजूद ही है. अंग्रेजी सुशासन की देन ही लगती है. हाल- हाल में मैने एक उच्च वित्तीय सरकारी पदाधिकारी से ‘मार्च लूट’ को परिभाषित करने को कहा. पहले तो वे हिचकिचाए, फिर उन्होंने कारण गिनाने शुरू किये, अंत में उन्होंने कहा कि मार्च महीने में विभिन्न विभागों को माल खरीदने या कोई निर्माण कराने के लिये जब ऊपर से कोई धन -आवंटन आता है, तो समयाभाव के बावजूद गलत और दोषपूर्ण तरीके से क्रय या निर्माण की प्रक्रिया को पूरा करने की कोशिश से भ्रष्टाचार के अनेक अवसर उत्पन्न होते हैं , आपूर्तिकर्ताओं, ठेकेदारों, अफसरों एवं कर्मचारियों के द्वारा उन्हे भुनाने की प्रक्रिया को ही ‘मार्च लूट’ का नाम दिया जा सकता है. मुझे यह परिभाषा सटीक लगी.
राज्य के विभिन्न विभागों के द्वारा अगले वित्तीय वर्ष में किये जानेवाले खर्चों का बजट लगभग मार्च महीने में ही असेंबली में पारित हो जाता है, विभिन्न मदों में धन का आवंटन तीन तीन महीनों में करने की परंपरा है, पहली किस्त जून जुलाई में आती है. यहाँ मान लें कि पूरे सिंचाई विभाग को 400 करोड़ रुपए मिले जिन्हें पूरे झारखंड में खर्च करना है, पूरे झारखंड को सिंचाई विभाग ने अनेक सर्किल में, हर सर्किल को अनेक डिवीजन में और फिर हरएक डिवीजन को अनेक सबडिवीजन में बांटा है. पूरे 400 करोड रुपयों को इन सभी उपविभागों में बाँटने का अधिकार विभाग के सर्वोच्च पदाधिकारी को होता है.
कुछ तो बजट बनाते समय विभागों के द्वारा की गयी माँगों के अनुसार उसे धन आवंटित करना होता है, कुछ आवंटन अधिकारी के विवेक पर होता है. बिना अधिक सोचे समझे आपाधापी में कई प्रोजेक्ट बनाए जाते हैं, जमीनी हकीकत से दूर होते हैं, तकनीकी खामियों से भरे होते हैं, या फिर किसी दबंग अफसर के ‘अहं’ का प्रतिफल होते हैं. इस प्रकार के प्रोजेक्ट के लिये खर्चे का आकलन भी त्रुटिपूर्ण होता है, कभी तो जानकारी और अनुभव आधारित विचार विमर्श के अभाव में, तो कभी जानबूझकर घपले की नीयत से. यही त्रुटिपूर्ण आकलन बजट में डाल दिया जाता है, पारित भी हो जाता है, विभाग में आवंटन भी आ जाता है.
प्रोज़ेक्ट के क्रियांवयन के लिये अब शुरू होती है बड़े और छोटे अफसरों के बीच खींचतान. मक्खियों के रूप में विभागों में भनभना रहे ठेकेदारों को प्रोजेक्ट की भनक लग जाती है, हर विभाग के अफसरों के अपने अपने चहेते ठेकेदार होते हैं. एक अफसर को एक ठेकेदार ने सेट किया, कुल 30% कमीशन पर बात पक्की हो गयी, उस अफसर ने बाकी साथियों को 15% मिलने और बाँटने की बात की, बाकी चुपचाप खुद हड़प जाने की प्लानिंग कर ली. फाइल पर नोट लिखकर आगे बढ़ाया. जिस अफसर के पास फाइल गयी उसकी दूसरे ठेकेदार से ऐसी ही अलग सेटिंग है, वह कैसे इस प्रस्ताव को पचाए, बस फाइल में कुछ त्रुटियाँ निकाल दीं, केस लटक गया. एक दो महीने बाद फिर किसी ने जोर मारा, तीसरे ने लँगड़ी मार दी, फिर मामला स्थगित. प्रोजेक्ट था जनता की भलाई के लिये, अफसरों की आपसी खींचतान में फंस गया, बड़ा अफसर छोटे को दोष दे रहा है, छोटा बड़े को. कोल्ड वार जारी रही. करते करते 10-11 महीने बीत गये और आ गया मार्च, यदि प्रोजेक्ट की धनराशि को अब खर्च न किया गया तो 31 मार्च के बाद वह लैप्स हो जाएगी, यानि वापस हो जाएगी.
संकट की इस घड़ी में अफसरों में कुछ तालमेल बढ़ता है, समझौते हो जाते हैं, ठेकेदारों का भी इसमें रोल होता है, वे अधिक कमीशन का प्रस्ताव देते हैं, अफसरों का हिस्सा बढ़ जाता है, असंतुष्ट भी मजबूरी में या अधिक कमीशन की एवज में शांत हो जाते हैं, फाइल तेजी से आगे बढ़ने लगती है. ठेकेदार को कमीशन का अधिकांश हिस्सा एडवांस में देने को मजबूर किया जाता है, बाद की रिस्क कौन ले. हाथोंहाथ आपूर्तिकर्ताओं या ठेकेदार से तीन कोटेशन लिये जाते हैं,तत्काल आपूर्ति आदेश या कार्यादेश पर हस्ताक्षर किये जाते हैं , बिल जमा करने को कहा जाता है, बिल पास करके दस्तूरी के साथ ट्रेजरी में भेज दिया जाता है, दूसरे महीनों के मुकाबले दस्तूरी का रेट जरूर बढ़ जाता है, ट्रेजरी से बिल पास हो जाने पर पार्टी के नाम से बैंक ड्राफ्ट बन जाता है जिसे अफसर अपने पास रख लेता है, माल की आपूर्ति अप्रैल या मई या उसके बाद जब भी पूरी होती है, ड्राफ्ट आपूर्तिकर्ता को सौंप दिया जाता है.
ऊपर से पूरी प्रक्रिया में कोई गडबड़ी नजर नहीं आती, लेकिन सबकुछ गड़बड़ ही गड़बड़ होता है. तीस चालीस प्रतिशत कमीशन एडवांस में देनेवाले ठेकेदार का भी तो बीस तीस प्रतिशत कमाने का हक बन जाता है. कोटेशन की दर बाजार दर के मुकाबले काफी अधिक हो जाती है, चूना सरकारी कोष को लगता है, ठेकेदार के ऊपर काम जल्दी जल्दी निपटाने का दबाव बनाया जाता है क्योंकि बिना काम के पेमेंट का एडवांस ड्राफ्ट बनाकर रखना स्वयं में नियम विरुद्ध है, अफसर जानते हैं. जल्दी जल्दी में ढलाई या प्लास्टर के बाद जितना पानी पटाना चाहिये, नहीं पटता और क्योरिंग के लिये निर्धारित 15 दिनों की जगह दो- चार- पाँच दिनों में ही काम चला लिया जाता है, बिल्डिंग दो चार साल में क्रैक न हो या न ढहे, तो यह सातवाँ आश्चर्य ही होगा. सामान खरीदा गया है, तो प्रक्रिया पूरी करने की आपाधापी में हैवी कमीशन से मुँह बंद किये अफसर बिना अधिक जाँच पड़ताल के घटिया माल स्वीकार करने को मजबूर होते हैं. मार्च लूट की दूसरी चोट सरकारी खजाने को घटिया गुणवत्ता वाले माल या काम से लगती है. पूरी प्रक्रिया यदि 11 महीनों में पूरी कर ली जाती तो शायद घपला इतना बड़ा न होता.
कभी कभी इन अफसरों की आपसी खींचतान खत्म नहीं होती और प्रोजेक्ट के लिये आवंटित फंड लैप्स होने की कगार पर आ जाता है, तब आनन-फानन में आवंटन अधिकारी इसे चालाकी से दूसरे प्रोजेक्ट को डायवर्ट कर देता है जहां से उसे अच्छा व्यक्तिगत रिटर्न मिलता है. अब यह स्वतः समझने की बात है कि इस दूसरी जगह दस पन्द्रह दिनों में किस प्रकार मार्च का फायदा उस धनराशि की बंदरबाँट को मिलेगा.
आवंटन अधिकारी कुछ फंड तो बजट के अनुरूप विभिन्न उपविभागों में देने को मजबूर होते हैं, लेकिन कुछ फंड वे अपने हाथों में रखते हैं. जिस अफसर से ज्यादा मिला, उसे दे दिया, न दे पाए तो मार्च तक इंतजार करने को कह दिया. मार्च में अनेक उपविभाग पहले से आवंटित धनराशि का उपयोग डरपोक और निकम्मे अफसरों के कारण या फिर अफसरों की आपसी खींचतान के कारण न् जब दूसरों के द्वारा उपयोगअ कर पाने पर उसे लौटा देते हैं. आवंटन अधिकारी तत्काल उस धनराशि को अपने किसी चहेते अफसर के विभाग को आवंटित कर देता है, जहाँ उसे बुक करने की सारी तैयारियाँ पहले से रहती हैं, तत्काल ड्राफ्ट बनवाकर रख दिया जाता है. ऐसी राशियों की लूट बेरहमी से होती है.
इधर कई वर्षों से काफी काम ठेकेदारों से न कराकर विभागों द्वारा खुद कराया जाता है, इन कामों के लिये झूठे मस्टर रोल बनाए जाते हैं, नापी की किताबों में झूठी ऎंट्री कर दी जाती है, ट्रेजरी से इफरात पैसे मार्च में निकाल लिये जाते हैं. खुद ही काम करना है, खुद ही बिल बनाना है, उसकी जाँच भी खुद ही करनी है, लूटने का इससे अच्छा मौका कहां मिलेगा. सारे झंझट खत्म, ए.जी. का ऑडिट होगा , उस समय भी हर तरह से ऑडिटर की पूजा कर ली जाएगी. बस मौज ही मौज है, अपने को जो कमीशन मिलता था , वह तो मिला ही, ठेकेदार वाला प्रॉफिट भी हाथ आ गया.
विभागों में कर्मचारियों की तनख्वाह निश्चित होती है, भवन का किराया, बिजली टेलीफोन के बिल आदि भी देने होते हैं, इन सभी के लिये भी आवंटन बिना चढ़ावे के नहीं आता, आवंटन अधिकारी के क्लर्क और ट्रेजरी में बिना चढ़ावे के शायद ही कोई काम होता हो, मार्च की भीड में बस कमीशन अधिक लगता है और अनाप शनाप बिल भी पास करा लिये जाते हैं.
राज्य के विभिन्न विभागों के द्वारा अगले वित्तीय वर्ष में किये जानेवाले खर्चों का बजट लगभग मार्च महीने में ही असेंबली में पारित हो जाता है, विभिन्न मदों में धन का आवंटन तीन तीन महीनों में करने की परंपरा है, पहली किस्त जून जुलाई में आती है. यहाँ मान लें कि पूरे सिंचाई विभाग को 400 करोड़ रुपए मिले जिन्हें पूरे झारखंड में खर्च करना है, पूरे झारखंड को सिंचाई विभाग ने अनेक सर्किल में, हर सर्किल को अनेक डिवीजन में और फिर हरएक डिवीजन को अनेक सबडिवीजन में बांटा है. पूरे 400 करोड रुपयों को इन सभी उपविभागों में बाँटने का अधिकार विभाग के सर्वोच्च पदाधिकारी को होता है.
कुछ तो बजट बनाते समय विभागों के द्वारा की गयी माँगों के अनुसार उसे धन आवंटित करना होता है, कुछ आवंटन अधिकारी के विवेक पर होता है. बिना अधिक सोचे समझे आपाधापी में कई प्रोजेक्ट बनाए जाते हैं, जमीनी हकीकत से दूर होते हैं, तकनीकी खामियों से भरे होते हैं, या फिर किसी दबंग अफसर के ‘अहं’ का प्रतिफल होते हैं. इस प्रकार के प्रोजेक्ट के लिये खर्चे का आकलन भी त्रुटिपूर्ण होता है, कभी तो जानकारी और अनुभव आधारित विचार विमर्श के अभाव में, तो कभी जानबूझकर घपले की नीयत से. यही त्रुटिपूर्ण आकलन बजट में डाल दिया जाता है, पारित भी हो जाता है, विभाग में आवंटन भी आ जाता है.
प्रोज़ेक्ट के क्रियांवयन के लिये अब शुरू होती है बड़े और छोटे अफसरों के बीच खींचतान. मक्खियों के रूप में विभागों में भनभना रहे ठेकेदारों को प्रोजेक्ट की भनक लग जाती है, हर विभाग के अफसरों के अपने अपने चहेते ठेकेदार होते हैं. एक अफसर को एक ठेकेदार ने सेट किया, कुल 30% कमीशन पर बात पक्की हो गयी, उस अफसर ने बाकी साथियों को 15% मिलने और बाँटने की बात की, बाकी चुपचाप खुद हड़प जाने की प्लानिंग कर ली. फाइल पर नोट लिखकर आगे बढ़ाया. जिस अफसर के पास फाइल गयी उसकी दूसरे ठेकेदार से ऐसी ही अलग सेटिंग है, वह कैसे इस प्रस्ताव को पचाए, बस फाइल में कुछ त्रुटियाँ निकाल दीं, केस लटक गया. एक दो महीने बाद फिर किसी ने जोर मारा, तीसरे ने लँगड़ी मार दी, फिर मामला स्थगित. प्रोजेक्ट था जनता की भलाई के लिये, अफसरों की आपसी खींचतान में फंस गया, बड़ा अफसर छोटे को दोष दे रहा है, छोटा बड़े को. कोल्ड वार जारी रही. करते करते 10-11 महीने बीत गये और आ गया मार्च, यदि प्रोजेक्ट की धनराशि को अब खर्च न किया गया तो 31 मार्च के बाद वह लैप्स हो जाएगी, यानि वापस हो जाएगी.
संकट की इस घड़ी में अफसरों में कुछ तालमेल बढ़ता है, समझौते हो जाते हैं, ठेकेदारों का भी इसमें रोल होता है, वे अधिक कमीशन का प्रस्ताव देते हैं, अफसरों का हिस्सा बढ़ जाता है, असंतुष्ट भी मजबूरी में या अधिक कमीशन की एवज में शांत हो जाते हैं, फाइल तेजी से आगे बढ़ने लगती है. ठेकेदार को कमीशन का अधिकांश हिस्सा एडवांस में देने को मजबूर किया जाता है, बाद की रिस्क कौन ले. हाथोंहाथ आपूर्तिकर्ताओं या ठेकेदार से तीन कोटेशन लिये जाते हैं,तत्काल आपूर्ति आदेश या कार्यादेश पर हस्ताक्षर किये जाते हैं , बिल जमा करने को कहा जाता है, बिल पास करके दस्तूरी के साथ ट्रेजरी में भेज दिया जाता है, दूसरे महीनों के मुकाबले दस्तूरी का रेट जरूर बढ़ जाता है, ट्रेजरी से बिल पास हो जाने पर पार्टी के नाम से बैंक ड्राफ्ट बन जाता है जिसे अफसर अपने पास रख लेता है, माल की आपूर्ति अप्रैल या मई या उसके बाद जब भी पूरी होती है, ड्राफ्ट आपूर्तिकर्ता को सौंप दिया जाता है.
ऊपर से पूरी प्रक्रिया में कोई गडबड़ी नजर नहीं आती, लेकिन सबकुछ गड़बड़ ही गड़बड़ होता है. तीस चालीस प्रतिशत कमीशन एडवांस में देनेवाले ठेकेदार का भी तो बीस तीस प्रतिशत कमाने का हक बन जाता है. कोटेशन की दर बाजार दर के मुकाबले काफी अधिक हो जाती है, चूना सरकारी कोष को लगता है, ठेकेदार के ऊपर काम जल्दी जल्दी निपटाने का दबाव बनाया जाता है क्योंकि बिना काम के पेमेंट का एडवांस ड्राफ्ट बनाकर रखना स्वयं में नियम विरुद्ध है, अफसर जानते हैं. जल्दी जल्दी में ढलाई या प्लास्टर के बाद जितना पानी पटाना चाहिये, नहीं पटता और क्योरिंग के लिये निर्धारित 15 दिनों की जगह दो- चार- पाँच दिनों में ही काम चला लिया जाता है, बिल्डिंग दो चार साल में क्रैक न हो या न ढहे, तो यह सातवाँ आश्चर्य ही होगा. सामान खरीदा गया है, तो प्रक्रिया पूरी करने की आपाधापी में हैवी कमीशन से मुँह बंद किये अफसर बिना अधिक जाँच पड़ताल के घटिया माल स्वीकार करने को मजबूर होते हैं. मार्च लूट की दूसरी चोट सरकारी खजाने को घटिया गुणवत्ता वाले माल या काम से लगती है. पूरी प्रक्रिया यदि 11 महीनों में पूरी कर ली जाती तो शायद घपला इतना बड़ा न होता.
कभी कभी इन अफसरों की आपसी खींचतान खत्म नहीं होती और प्रोजेक्ट के लिये आवंटित फंड लैप्स होने की कगार पर आ जाता है, तब आनन-फानन में आवंटन अधिकारी इसे चालाकी से दूसरे प्रोजेक्ट को डायवर्ट कर देता है जहां से उसे अच्छा व्यक्तिगत रिटर्न मिलता है. अब यह स्वतः समझने की बात है कि इस दूसरी जगह दस पन्द्रह दिनों में किस प्रकार मार्च का फायदा उस धनराशि की बंदरबाँट को मिलेगा.
आवंटन अधिकारी कुछ फंड तो बजट के अनुरूप विभिन्न उपविभागों में देने को मजबूर होते हैं, लेकिन कुछ फंड वे अपने हाथों में रखते हैं. जिस अफसर से ज्यादा मिला, उसे दे दिया, न दे पाए तो मार्च तक इंतजार करने को कह दिया. मार्च में अनेक उपविभाग पहले से आवंटित धनराशि का उपयोग डरपोक और निकम्मे अफसरों के कारण या फिर अफसरों की आपसी खींचतान के कारण न् जब दूसरों के द्वारा उपयोगअ कर पाने पर उसे लौटा देते हैं. आवंटन अधिकारी तत्काल उस धनराशि को अपने किसी चहेते अफसर के विभाग को आवंटित कर देता है, जहाँ उसे बुक करने की सारी तैयारियाँ पहले से रहती हैं, तत्काल ड्राफ्ट बनवाकर रख दिया जाता है. ऐसी राशियों की लूट बेरहमी से होती है.
इधर कई वर्षों से काफी काम ठेकेदारों से न कराकर विभागों द्वारा खुद कराया जाता है, इन कामों के लिये झूठे मस्टर रोल बनाए जाते हैं, नापी की किताबों में झूठी ऎंट्री कर दी जाती है, ट्रेजरी से इफरात पैसे मार्च में निकाल लिये जाते हैं. खुद ही काम करना है, खुद ही बिल बनाना है, उसकी जाँच भी खुद ही करनी है, लूटने का इससे अच्छा मौका कहां मिलेगा. सारे झंझट खत्म, ए.जी. का ऑडिट होगा , उस समय भी हर तरह से ऑडिटर की पूजा कर ली जाएगी. बस मौज ही मौज है, अपने को जो कमीशन मिलता था , वह तो मिला ही, ठेकेदार वाला प्रॉफिट भी हाथ आ गया.
विभागों में कर्मचारियों की तनख्वाह निश्चित होती है, भवन का किराया, बिजली टेलीफोन के बिल आदि भी देने होते हैं, इन सभी के लिये भी आवंटन बिना चढ़ावे के नहीं आता, आवंटन अधिकारी के क्लर्क और ट्रेजरी में बिना चढ़ावे के शायद ही कोई काम होता हो, मार्च की भीड में बस कमीशन अधिक लगता है और अनाप शनाप बिल भी पास करा लिये जाते हैं.
Comments
Post a Comment