सभी सरकारी निगम आज या तो बीमार हैं या मृतप्राय. बिहार राज्य पथ परिवहन निगम हो या रांची नगर निगम या फिर बिजली बोर्ड – हर जगह कर्मचारियों का यही कहना है कि भ्रष्ट अफसरों ने हर प्रकार की खरीद और पेमेंट में खूब खा-पीकर इन निगमों को दीमक की तरह चाटकर खोखला बना दिया है. अफसरों का कहना है कि हड़तालों और मांगों का ब्रह्मास्त्र हाथों में और राजनैतिक नेताओं का वरदहस्त सिर पर रखे यूनियन नेताओं ने खुद तो ऐश-मौज किया ही, कर्मचारियों को भी निकम्मा और कामचोर बना दिया. किसी के विरूद्ध छोटी सी भी अनुशासनिक कार्रवाई नहीं की जा सकती, यूनियन के बल पर ये लोग मारपीट, गाली-गलौज और हड़ताल पर उतारू हो जाते हैं. यदि किसी भी प्रकार की सजा का डर न हो, तो कामचोरी बढ़ेगी ही और इसी कामचोरी ने इन निगमों को बीमार बनाने में अहम भूमिका निभायी है. निगमों की खराब स्थिति के लिए अफसर और कर्मचारी दोनों ही दोषी नजर आते हैं. भ्रष्ट अफसरों ने इन निगमों का पैसा हजम कर बड़ी अट्टालिकाएं बना ली हैं, अकूत सम्पदा अपने लिए इकट्ठी कर ली है. परंतु नीचे के कर्मचारी, जो अपने को ईमानदार कहते हैं, वे इन अफसरों की पोल क्यों नहीं खोलते? यदि खुलकर सामने नहीं आ सकते, तो कम से कम चुपचाप अखबारों को इनके भ्रष्ट कारनामों का पूरा विवरण क्यों नहीं दे देते, बिना अपना काम बतलाए. दफ्तर की हर फाइल तक इन कर्मचारियों की पहुंच होती है, यदि ये अपने निगम के प्रति वफादार हैं, तो अफसरों के भ्रष्ट कारनामों का चिट्ठा खोलकर निगम को क्यों नहीं बचाते? निगमों की बदहाली का मूल कारण मुझे तो ये श्रमिक युनियनें ही नजर आती हैं जिनके नेताओं ने सारा अनुशासन खत्म कर दिया, कार्य संस्कृति नष्ट कर दी, अफसरों के साथ हर प्रकार की लूट-खसोट में शामिल होकर इन संस्थाओं को जर्जर बना दिया. देश का नुकसान तो हुआ ही, इन कर्मचारियों को भी कई निगमों के बंद होने के कारण छंटनी और बेरोजगारी का सामना करना पड़ रहा है. महीनों तनख्वाह नहीं मिलती, जिंदगी अस्त-व्यस्त हैं. सोने का अंडा देनेवाली मुर्गी का पेट काटकर सभी अंडे एक साथ हथिया लेने के लोभ ने बहुत बड़ा नुकसान कर दिया है जिसकी पूर्ति नहीं हो सकती. इन अफसरों और कर्मचारियों के कारनामों के कारण सार्वजनिक उपक्रमों की विशेषताएं छिप गयीं, सिर्फ खामियां ही बढ़-चढ़ कर सामने आयीं. आज हम सार्वजनिक उपक्रमों को हिकारतभरी नजरों से देखते हुए प्राइवेट उपक्रमों की तरफदारी कर रहे हैं – कुएं से बचकर खाई की तरफ बढ़ रहे है.
रांची के हरमू स्थित श्मशान घाट का नाम ‘मुक्तिधाम’ है जिसे मारवाड़ी सहायक समिति ने बहुत सुंदर बनाया है, बारिश एवं धूप से चिताओं की सुरक्षा हेतु बड़े- बड़े शेड बने हैं, चिता बुझने का इंतजार करने वाले लोगों के लिये बैठने की आरामदायक व्यवस्था है, जिंदगी की क्षणभंगुरता को व्यक्त करते एवं धर्म से नाता जोड़ने की शिक्षा देते दोहे एवं उद्धरण जगह- जगह दीवारों पर लिखे हैं. हर तरह के लोग वहां जाते हैं, दोहे पढ़ते हैं, कुछ देर सोचते भी हैं, मुक्तिधाम से बाहर निकलते ही सब कुछ भूल जाते हैं. इन दोहों का असर दिमाग पर जीवन से भी अधिक क्षणभंगुर होता है.मुक्तिधाम में गुरु नानकदेव रचित एक दोहा मुझे बहुत अपील करता है- “हर घड़ी शुभ घड़ी, हर वार शुभ वार; नानक भद्रा तब लगे जब रूठे करतार.” पता नहीं दूसरे क्या समझते व सोचते हैं. आज से पचास साल पहले लोग यात्रा पर निकलने से पूर्व मुहूर्त दिखला लेते थे, जिस दिशा में जाना है, उधर उस दिन दिशाशूल तो नहीं, पता कर लेते थे. अमुक- अमुक दिन दाढी नहीं बनवानी, बाल एवं नाखून नहीं कटवाने, इसका भी कड़ाई से पालन करते थे. मूल नक्षत्र में कोई पैदा हो गया, तो अनिष्ट की आशंका दूर करने हेतु ...
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