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अच्छे काम की सराहना से भी परहेज!

मेरे एक प्रतिष्ठित चार्टर्ड एकाउंटेंट होने के साथ विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष पदों पर सुशोभित हैं. बातचीत के दौरान मैंने मदर टेरेसा के अवसान से उत्पन्न रिक्तता की ओर इशारा किया, तो उन्होंने कहा, “आपको मदर टेरेसा के संबंध में कुछ भी मालूम नहीं – उनके सारे सेवा कार्य तो सिर्फ एक उद्देश्य से संचालित थे कि किस प्रकार अधिकाधिक हिंदुओं को क्रिश्चियन बनाया जाये. यूरोपीय क्रिश्चियन देशों में उनकी मृत्यु पर शोक मनाने की बात तो स्वाभाविक लगती है, लेकिन हिन्दुस्तान में इतना अधिक विलाप एकदम अनावश्यक है और हमारी गुलाम मानसिकता का परिचायक है”.
मैंने उनसे यही कहा कि गरीबों और अनाथों की सेवा में लगी कोई मदर टेरेसा हम हिंदू लोग क्यों नहीं पैदा कर पाये, जो अपने व्यक्तिगत सारे सुखों का त्याग करके गरीबों की सेवा में जुट जाये. पिछले हजारों वर्षों से हमने देश की बड़ी आबादी को धर्म के नाम पर गुलामों से भी बदतर जिंदगी नाली के कीड़ों की तरह जीने को मजबूर किया है. उन्हें अछूत घोषित कर उनकी छाया से बचना, कुओं-मंदिरों और सार्वजनिक स्थलों से उन्हें दूर रखना, उनसे बेगार कराना और उनकी बहु-बेटियों से बलात्कार करते वक्त छूआछूत की बातें भूल जाना. अछूतों और दलितों से घर एवं खेतों में बेगार कराना, फिर पारिश्रमिक देने की जगह गरियाना और लात-घूसों की भाषा में बातें करना – यही तो मानसिकता और व्यवहार है, हमारे समाज के मुट्ठीभर तथाकथित उच्चजाति के लोगों का उस विशाल जनसंख्या के प्रति, जिन्हें अपनी हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी दो जून की रोटी मयस्सर नहीं होती. आज भी यह वर्ग नाली के कीड़ों से भी बदतर जिंदगी जीने को मजबूर है. यदि कोई व्यक्ति इन्हें इस नरक से निकाल कर उनकी सेवा-सुश्रूषा कर, पढ़ा-लिखाकर उन्हें भी “आदमी” बना देता है, उनके मन में आदमी होने का गर्व एवं विश्वास भर देता है, तो वह किसी भी धर्म का शत्रु कैसे हो सकता है. मदर टेरेसा ने अपनी निस्वार्थ सेवा से असहायों का दिल जीता. ऐसे लोगों को आत्मविश्वास से भरा और उन्हें जिंदगी की खूबसूरती दिखलायी. अब यदि उनसे लाभांवित व्यक्तियों ने उनकी सेवा भावना से प्रभावित और प्रेरित होकर धर्मांतरण कर लिया, तो इसमें मदर का क्या दोष? उन्होंने जबरदस्ती तो किसी का धर्म परिवर्तन नहीं किया-कराया. फिर हम हिंदुओं की छाती क्यों फटती है. हम क्यों नहीं अपने इन दलित पीड़ित धर्म- भाइयों के उन्नयन के लिए सम्मिलित और विराट प्रयास करते हैं? हमने हजारों वर्षों तक इन्हें दबाया-कुचला और उनके अंदर यह भावना भरी कि वे जानवरों से भी गये-गुजरे हैं. हमारे बराबर तो वे कभी हो ही नहीं सकते. कोई भी मनुष्य चाहे वह गरीब हो, अमीर हो, उच्चजाति का हो, या निम्न जाति का, गोरा हो या काला, उस परमप्रभु की अनुपम कृति है – इस कृति को अपमानित और प्रताड़ित करने का भयंकर अपराध और पाप हम हिंदुओं ने हजारों वर्षों से किया है – “मदर” ने तो उन्हें बोध कराया कि वे भी मनुष्य हैं. हिंदूवादी संस्थाओं ने तो नफरत और द्वेष की आग उगलती उमा भारती या रितंभरा जैसी महिलाओं पर गर्व किया है – मदर टेरेसा को वे कैसे पचायें. खुद तो कुछ सकारात्मक काम करना नहीं, पर जो लोग कुछ कर रहे हैं, उनकी छवि धूमिल और खंडित करने का प्रयास करना – उन्हें संदेह के घेरे में अवश्य खड़ा कर देना है. मदर टेरेसा का सेवा पथ कठिन है – त्याग, तपस्या और गुमनामी के अंधेरों से ग्रस्त है. प्रसिद्धि और लोक-प्रशंसा का आसान रास्ता है लोगों की भावनाओं को भड़का कर ईर्ष्या और नफरत फैलाना – हर्रे लगे न फिटकिरी, रंग चोखा. अफसोस होता है इतने विशाल दलित वर्ग के लिए हम तो कुछ करेंगे नहीं, दूसरों को भी नहीं करने देंगे. दूसरे करते है, तो हमारी छाती फटती है.

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