Skip to main content

नरसिंह राव: एक मूल्यांकन यह भी

नरसिंह रावजी में कुछ खास बातें थीं, यदि उन्होंने समझ लिया कि अमुक समस्या का समाधान नहीं है तो वे उसे टालते जाते थे और कुछ करके नया विवाद पैदा कर उस समस्या को अधिक उलझाने से बचते थे, उनका विश्वास था कि ऐसी समस्यायें समय के साथ स्वतः सुलझ जाती हैं. उनकी सबसे अधिक अनुकरणीय विशेषता थी कि अपने पूरे राजनैतिक जीवन में उन्होने शायद ही कभी कोई विवादास्पद वक्तव्य दिया हो. उन्हें कभी यह कहने की जरूरत ही नहीं पड़ी कि मैंने ऐसा नही कहा और मीडिआ ने मेरी बातों को तोड़ मरोड़कर पेश किया है. आलोचकों के द्वारा बार-बार “मौनी बाबा” एवं “निष्क्रियता और अनिर्णय की प्रतिमूर्ति” कहे जाने के बाद भी उन्होंने न तो अपनी कार्यशैली बदली, न किसी के खिलाफ कुछ बोले, न ही कभी बौखलाकर कुछ सफाई दी और न कभी किसी पर कोई आरोप लगाया.
नरसिंह रावजी अद्भुत और प्रकांड विद्वान थे. साइंस और लॉ में स्नातक होने के साथ-साथ 17 देशी विदेशी भाषाएं लिखने, पढ़ने और बोलने में पारंगत थे. एक ही व्यक्ति में विज्ञान, कानून और साहित्य के साथ राजनीति का ऐसा मणिकांचन संयोग असंभव नहीं तो दुर्लभ जरूर है. 70 वर्ष की उम्र में उन्होंने कंप्युटर पर काम करना सीखा और उसमें भी निपुणता प्राप्त कर ली. 77 वर्ष की उम्र में 700 पृष्ठों की बहुचर्चित आत्मकथा ही रोचक उपन्यास के रूप में लिख डाली. हिन्दी का एक भी वाक्य शुद्ध न बोल सकनेवाले लालू और मुलायम को हिन्दी प्रदेशों के महामहिम पदों पर प्रतिष्ठित देख शर्म आती है. शत-प्रतिशत शुद्ध हिन्दी धाराप्रवाह बोलनेवाले दक्षिण भारतीय नरसिंह रावजी तो हिन्दी प्रदेशों के द्वारा सिर पर बैठाए जाने के लायक थे, लेकिन हिन्दीभाषियों ने उनके सम्मान की जगह उनकी टांग खींचने में ही अधिक रुचि ली. अर्जुन सिंह हों, या चन्द्रशेखर या वी.पी.सिंह या नारायण दत्त तिवारी या अटलबिहारी या अन्य अनेक-अनेक शीर्ष नेता, आज जब वे अपने अंतर्मन में झांकेंगे तो कुछ पछतावा जरूर होगा कि उन्होंने अपने समकालीन नरसिंह रावजी की प्रतिभा के साथ न्याय नहीं किया, उन्हें उचित सम्मान नहीं दिया और आज उनका कुछ बहुमूल्य खो गया.
नरसिंह रावजी बिना किसी शोरगुल के चुपचाप इस दुनिया से चले गये. गनीमत है कि हाल – हाल में अदालत ने सारे मामलों में उन्हें बरी कर दिया था, कुछ तो राहत उन्होंने महसूस की ही होगी. अगले कुछ दिनों तक उन्हें श्रद्धांजलियां दी जायेंगी, राजकीय शोक मनाया जायेगा, उनका गुणगान किया जायेगा, याद में कसीदे पढे जायेंगे. लेकिन साथ-साथ सेंट किट्स, लखूभाई और हर्षद मेहता के सूटकेस वाले मामलों को छोड दिया जाये तो भी हर जगह इंदिराजी की हत्या के बाद भडके दंगों पर गृहमंत्री के रूप में कंट्रोल न कर पाने, बाबरी मस्जिद के विध्वंस को न रोक पाने और अपनी सरकार को बचाने के लिये झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को धन देने के आरोप उनपर बारंबार दुहराये जायेंगे, वैसे तो ये ऐसे संवेदनशील मसले हैं जिनके लिये कोई सफाई देने की जगह उन्होंने आजीवन मौन रहना ही उचित और गरिमापूर्ण समझा. आइये देखें कि ये उनकी गलतियां थीं या सोच समझकर देश हित में उठाये गये कदम.
सिख सुरक्षाकर्मियों की गद्दारी से हुई इंदिराजी की हत्या के बाद सिख भाइयों के द्वारा नासमझी में जगह जगह आतिशबाजी की गयी और खुले आम मिठाइयां बांटी गयीं, लगातार कई सालों से जारी भिंडरावालां और दूसरे आतंकवादियों के अत्याचारों से आहत हिन्दू जनमानस इस क्रूर विश्वासघात को बर्दाश्त नहीं कर पाया और अंधी प्रतिक्रिया में भूल गया कि सिख भी अपने भाई हैं. उसके बाद तो जो कुछ भी हुआ वह स्वाभाविक होने के बावजूद घृणास्पद ही था. भले ही दंगे भडकाने का सारा दोष कॉंग्रेसी नेताओं पर आ गया हो और दंगों को कंट्रोल न कर पाने के लिये तत्कालीन गृहमंत्री नरसिंह राव की निपुणता पर सवाल कर दिया गया हो, लेकिन जो हुआ वह होना ही था. उनकी जगह कोई भी होता, उनसे बेहतर शायद ही कुछ कर पाता.
विराट स्तर पर सुनियोजित साजिश के तहत बाबरी मस्जिद ढहाई गयी, सारा दोष उनपर मढ दिया गया, कहा गया कि उन्हें पूरे मामले में हस्तक्षेप करके अयोध्या में सेना भेजने का साहसिक निर्णय लेना था और ‘मौनी बाबा’ चुपचाप बैठे रहे. उन दिनों भाजपा और हिन्दूवादी संगठनों के लगभग सभी शीर्ष नेता अयोध्या में मौजूद थे और वहां अपने आह्वान पर पूरे देश से आकर एकत्र लाखों कारसेवकों की भीड को उकसाने में जी जान से सक्रिय थे, सभी का एकमात्र एजेंडा था –बाबरी मस्जिद को ढहा देना, सारी तैयारियां पूरी थीं. उत्तर प्रदेश में जनता के द्वारा मस्जिद मंदिर मुद्दे पर ही चुनी हुई भाजपा की लोकप्रिय सरकार थी, और साजिश में आकंठ डूबे मुख्य मंत्री कल्याण सिंह ने कोर्ट में मस्जिद की यथास्थिति बनाये रखने का शपथ पत्र दाखिल कर रखा था जिसे चुनौती देने का कोई कानूनी अधिकार नरसिंह राव को नहीं था. साजिश इतनी ठोस एवं चालाकी भरी थी कि हर स्थिति में मस्जिद को उस दिन टूटना ही था. यदि वे कोई भी कदम उठाते, तो साजिशकर्ता यही कहते कि उनकी कार्यवाही के ही कारण वहां एकत्र लाखों कारसेवक भडके और उन्होंने मस्जिद गिरा दी (इससे पहले हुए अयोध्या कांड में कारसेवकों की मौत के लिये मुलायम के उस बयान को भडकाऊ और जिम्मेदार ठहराया गया था जिसमें उन्होंने कहा था कि अयोध्या में ऐसा इंतजाम है कि चिडिया भी पर नहीं मार सकती) , इसके अलावे जो भगदड होती, दंगे होते, गोलियां चलतीं और अनगिनत जानें जातीं सबके लिये कसूरवार नरसिंह राव ही ठहराए जाते, भाजपा ने गहरी साजिश के तहत कुछ ऐसी स्थिति पैदा कर दी थी कि उस दिन वहां “चित भी उनकी और पट भी उनकी” का मामला था. बाबरी मस्जिद की सुरक्षा न हो सकी, इसका रत्ती भर भी दोष नरसिंह रावजी को नहीं दिया जा सकता, उन्होंने तो उस दिन उत्तर प्रदेश की सरकार के खिलाफ कोई कदम न उठाकर बहुत ही बुद्धिमत्ता का परिचय दिया, अन्यथा मस्जिद तो गिरती ही, वहां भयंकर रक्तपात होता और प्रतिक्रिया स्वरूप पूरे देश में आग लग जाती , दंगों की श्रंखला ही शुरू हो जाती. नरसिंह रावजी के इस कदम के लिये उनकी प्रशंसा की जानी चाहिये, लेकिन अफसोस तो तब होता है जब कॉंग्रेस के अन्य वरिष्ठ नेताओं ने भी उनको ही बलि का बकरा ठहरा कर अपने पल्लू झाड लिये.
चुनकर आयी उनकी सरकार अल्पमत में थी और घातक परिस्थितियों को देखते हुए देश को स्थिर सरकार की ही सख्त जरूरत थी . झामुमो सांसदों को अपने पाले में करने के लिये मंत्रीपद देकर अयोग्य लोगों को पांच साल मंत्रिमंडल में झेलने और ब्लैकमेल होने की जगह एक दो करोड रुपए देकर राव ने उन्हें अपनी ओर कर लिया और बाद के झंझटों से मुक्ति पा ली, अनैतिक होते हुए भी यह कदम विराट देश-हित में था.
अत्यंत कठिन और विषम परिस्थितियों में उन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में देश का सफल नेतृत्व कर देश को आर्थिक संपन्नता की दिशा में अग्रसर किया, बाद में प्रशंसा और सम्मान की जगह उनपर अनेक मुकदमे लाद दिये गये और उनकी अपनी ही पार्टी ने उन्हें हासिये पर डाल दिया. बहुमत में न होने के बावजूद भी संसद में चुनकर आयी सबसे बडी पार्टी के नेता होने के कारण नरसिंह रावजी को प्रधान मंत्री पद की शपथ दिलाई गयी. अल्पमत सरकार के मुखिया के सामने विचित्र और विपरीत परिस्थितियां थीं. सांप्रदायिक दंगों और आरक्षण संबंधी आंदोलनों से राष्ट्रीय एकता का कचूमर बनाया जा रहा था, देश का सोना गिरवी रखकर विदेशी मुद्राकोष रिक्त होने की गिनती शुरू हो गयी थी, लग रहा था कि पंजाब और कशमीर “ अब गये और तब गये ” – सरकार बचाने की जिम्मेदारी अलग से थी, मैडम सोनिया शोकग्रस्त हो वैराग्य के मूड में थीं. उस समय देश को एक संयमित, शांत और धीरगम्भीर नेतृत्व की जरूरत थी और राव साहब अपनी विशेष कार्यशैली के कारण उस कसौटी पर एकदम खरे उतरे, उन परिस्थितियों का विश्लेषण कर यदि उनकी उपलब्धियों का आकलन किया जाये तो उनकी कार्यशैली आलोचना के बजाय प्रशंसा की हकदार होगी और राष्ट्र उनका कृतज्ञ होगा.

Comments

Popular posts from this blog

“हर घड़ी शुभ घड़ी, हर वार शुभ वार”

रांची के हरमू स्थित श्मशान घाट का नाम ‘मुक्तिधाम’ है जिसे मारवाड़ी सहायक समिति ने बहुत सुंदर बनाया है, बारिश एवं धूप से चिताओं की सुरक्षा हेतु बड़े- बड़े शेड बने हैं, चिता बुझने का इंतजार करने वाले लोगों के लिये बैठने की आरामदायक व्यवस्था है, जिंदगी की क्षणभंगुरता को व्यक्त करते एवं धर्म से नाता जोड़ने की शिक्षा देते दोहे एवं उद्धरण जगह- जगह दीवारों पर लिखे हैं. हर तरह के लोग वहां जाते हैं, दोहे पढ़ते हैं, कुछ देर सोचते भी हैं, मुक्तिधाम से बाहर निकलते ही सब कुछ भूल जाते हैं. इन दोहों का असर दिमाग पर जीवन से भी अधिक क्षणभंगुर होता है.मुक्तिधाम में गुरु नानकदेव रचित एक दोहा मुझे बहुत अपील करता है- “हर घड़ी शुभ घड़ी, हर वार शुभ वार; नानक भद्रा तब लगे जब रूठे करतार.” पता नहीं दूसरे क्या समझते व सोचते हैं. आज से पचास साल पहले लोग यात्रा पर निकलने से पूर्व मुहूर्त दिखला लेते थे, जिस दिशा में जाना है, उधर उस दिन दिशाशूल तो नहीं, पता कर लेते थे. अमुक- अमुक दिन दाढी नहीं बनवानी, बाल एवं नाखून नहीं कटवाने, इसका भी कड़ाई से पालन करते थे. मूल नक्षत्र में कोई पैदा हो गया, तो अनिष्ट की आशंका दूर करने हेतु ...

रैगिंग- क्या, क्यों और क्यों नहीं ?

हर वर्ष नये एडमिशन के बाद पूरे देश के अनेक इंजीनियरिंग, मेडिकल, मैनेजमेंट और कुछ अन्य कॉलेजों में जब नये छात्र प्रवेश लेते हैं, तो पुराने सीनियर छात्र उन्हें नये माहौल में ढालने के नाम पर उनकी रैगिंग करते हैं. रैगिंग का मतलब ही होता है किसी की इतनी खिंचाई करना कि उसके व्यक्तित्व और स्वाभिमान के चीथड़े- चीथड़े हो जाएं. कई सीनियर छात्रों के द्वारा किसी एक नये छात्र को घेरकर ऊलजलूल सवाल करना और हर जबाब को गलत बताते हुए खिल्ली उड़ाना, ऊटपटांग हरकतें करवाना, गालीगलौज और अश्लील बातें करके नये छात्रों को मानसिक और शारीरिक यंत्रणा देना ही रैगिंग है. रैगिंग के परिणाम स्वरूप हर वर्ष दो-चार छात्र आत्महत्या कर लेते हैं, कुछ मानसिक रूप से गंभीर बीमार हो जाते हैं. वैसे तो अधिकांश नये छात्र रैगिंग के फलस्वरूप अल्ट्रामॉडर्न बन जाते हैं, लेकिन कुछ लड़कों को रैगिंग के दौरान जबर्दस्त झटका लगता है. वे जो कुछ बचपन से किशोरावस्था तक पहुंचने में सीखे हुए होते हैं, सब एक झटके में धराशायी हो जाता है. यहां तो हर वाक्य में “मां-बहन” को लपेटती हुई बुरी- बुरी गालियां दी जाती हैं, सिखाई और रटवाई जाती हैं, वर्जित सेक्स ...

आखिर कितना बडा अपराध कर दिया रवि राज ने ?

सुनहले भविष्य का सपना आंखों में संजोए 21 वर्ष का होनहार कस्बाई युवा रवि राज शिकार हो गया है बचकानी गफलत का, क्रूर मीडिआ ने उसे कुछ इस प्रकार बार- बार पेश किया है जैसा किसी आतंकवादी को भी नहीं किया जाता. उसके सिर पर कपडा डालकर चारों ओर से उसे घेरकर ढेर सारे पुलिस के जवान कोर्ट में पेश करने के लिये ले जा रहे हैं – दिन में पचास बार इसी दृश्य को दिखलाकर क्या मकसद पूरा हुआ ? कोर्ट में उसपर मुकदमा चलेगा, लंबा भी खिंच सकता है, उसे कुछ होने का नहीं, छूट जायेगा क्योंकि उसने ऐसा कोई अपराध किया ही नहीं. लेकिन शायद पुलिस और मीडिआ का यह व्यवहार उस होनहार लडके को हमेशा के लिये नॉर्मल जिन्दगी से दूर कर दे, लडका डिप्रेशन में भी जा सकता है, आत्महत्या कर सकता है या फिर स्थायी रूप से अपराधों की दुनिया में जा सकता है. एक तरफ तो तिहाड जेल में शातिर अपराधियों को सुधारने के प्रोग्राम चलाये जाते हैं, दूसरी ओर सस्ती सनसनी के लिये इतने नाजुक मामले को पुलिस और मीडिआ इतने क्रूर और नासमझ तरीके से हैंडिल करती है और पूरा देश चस्के लेता है. जो कुछ भी इंटरनेट पर सर्वसुलभ था, उसकी सी. डी. बनाकर उसने बाजी डॉटकॉम पर बे...