आज पूरा देश विश्वास के संकट से गुजर रहा है. करोड़ो रुपयों के घोटालों ने हमारे लोकतंत्र के वटवृक्ष को जड़ों तक झकझोड़ दिया है. एक भी नेता ऐसा नहीं, जिसके बारे में आम जनता विश्वास के साथ कह सके कि वह पाक साफ है. हर्षद मेहता हो या जैन बंधु, जहां तक उनके मौखिक आरोपों का सवाल है – उनसे इस विशाल देश का प्रधानमंत्री भी नहीं बचा. सारे राजनीतिज्ञ एक-दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे हैं – एक दूसरे का चरित्र हनन करने के लिए सारे हथकंडे अपना रहे हैं. अपने को दूसरे से बड़ा सिद्ध करने की कोशिश में, दूसरे को छोटा साबित करने की प्रक्रिया चल रही है. बीरबल ने बादशाह अकबर द्वारा खींची लकीर को छोटा करने के लिए उसे मिटाया नहीं – बल्कि बगल में एक बड़ी लकीर खींच दी. सच्चा नेता वह है, जो अपने व्यक्तित्व को इतना ऊंचा उठाये, महान बनाये कि बाकी लोगों का कद अपने आप उससे नीचे हो जाये. लेकिन, यह रास्ता बहुत कठिन है, मशक्कत वाला है. बड़ा बनने के लिए मेहनत करनी होगी, कुछ रचनात्मक कार्य करने होंगे. मुश्किलें उठानी होंगी. समय भी बहुत लगेगा. दूसरे को नीचा दिखाना, उसे छोटा सिद्ध करना अधिक आसान और शॉर्टकट तरीका है. आज के नेताओं को यही शॉर्टकट तरीका रास आ रहा है, लेकिन इसके दूरगामी दुष्प्रभावों से उन्हें कोई मतलब नहीं. दूसरे पर कीचड़ उछालने का काम इतना आम हो गया है कि, रास्ते चलता एक आम आदमी भी गांधी और नेहरू को गाली दे देने में अपनी बहादुरी मानता है. “राम” और “कृष्ण” जैसे आदर्श पुरुषों को “जय श्रीराम” की राजनीति ने स्वर्ग से उतार कर चौराहों पर पान की दूकानों पर पोस्टर के रूप में चिपका दिया, गंदी गलियों की दीवारों पर नारों के रूप में विराजमान कर दिया.
एक जमाना था कि लोग गांधी-नेहरू जैसे नेताओं के नाम पर अपने बच्चों के नाम रखना फख्र की बात समझते थे, उनकी तस्वीरों से लोगों के ड्राइंग रूम सजे रहते थे. लोग अपने बच्चों को उन जैसा बनने की शिक्षा देते थे. अब लोगों ने इन महापुरुषों की इतनी फजीहत कर दी है कि आज के बाप के पास ऐसा कोई नाम नहीं, जिसके जैसा बनने के लिए वह अपने बच्चों को कह सके. और आज के “महापुरुषों” का तो कहना ही क्या!
आज किसी को किसी पर विश्वास नहीं रहा. बिहार के पशुपालन विभाग के घोटाले ने तो और भी निराशा भर दी है. पूरे सिस्टम पर से भरोसा उठ गया है – जिस मुख्यमंत्री की नाक के नीचे इतना बड़ा हादसा हो जाये, वह इतने बड़े राज्य को क्या संभालेगा. यही बात प्रधानमंत्री पर भी लागू है, जिनकी छत्रछाया में पल रहे लोगों ने हजारों करोड़ का घोटाला कर दिया. यदि उनकी जानकारी में ऐसा हुआ है, तो वे भी अपराधी हैं. यदि वे कहते हैं कि उन्हें मालूम नहीं था, तब तो और भी चिंताजनक बात है. इतने महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोगों में इतनी नाकाबलीयत. उनकी नाक के नीचे इतना कुछ होता रहा और उन्हें पता भी न लगा. महात्मा गांधी ने तीस-पैंतीस वर्षों में जो विश्वास इस देश के जन मन में पैदा किया, उसको मटियामेट करके रख दिया कांग्रेस और विपक्षी नेताओं ने. एक-दूसरे पर विश्वास, सरकार की नीतियों पर विश्वास, नेताओं पर विश्वास और अपने देश की ताकत पर विश्वास- यही तो आधार हैं राष्ट्रीय एकता के. विश्वास टूट रहा है और राष्ट्रीय एकता का अमृत कलश फूट रहा है. हजारों वर्षों से खोयी राष्ट्रीय एकता को बड़ी मुश्किल से फिर पाया था हम लोगों ने, लेकिन शायद उसे पचास वर्षों तक भी संभाल नहीं पाये. गांधी का फिर इंतजार है, लेकिन अफसोस कि गांधी बार-बार नहीं आते.
एक जमाना था कि लोग गांधी-नेहरू जैसे नेताओं के नाम पर अपने बच्चों के नाम रखना फख्र की बात समझते थे, उनकी तस्वीरों से लोगों के ड्राइंग रूम सजे रहते थे. लोग अपने बच्चों को उन जैसा बनने की शिक्षा देते थे. अब लोगों ने इन महापुरुषों की इतनी फजीहत कर दी है कि आज के बाप के पास ऐसा कोई नाम नहीं, जिसके जैसा बनने के लिए वह अपने बच्चों को कह सके. और आज के “महापुरुषों” का तो कहना ही क्या!
आज किसी को किसी पर विश्वास नहीं रहा. बिहार के पशुपालन विभाग के घोटाले ने तो और भी निराशा भर दी है. पूरे सिस्टम पर से भरोसा उठ गया है – जिस मुख्यमंत्री की नाक के नीचे इतना बड़ा हादसा हो जाये, वह इतने बड़े राज्य को क्या संभालेगा. यही बात प्रधानमंत्री पर भी लागू है, जिनकी छत्रछाया में पल रहे लोगों ने हजारों करोड़ का घोटाला कर दिया. यदि उनकी जानकारी में ऐसा हुआ है, तो वे भी अपराधी हैं. यदि वे कहते हैं कि उन्हें मालूम नहीं था, तब तो और भी चिंताजनक बात है. इतने महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोगों में इतनी नाकाबलीयत. उनकी नाक के नीचे इतना कुछ होता रहा और उन्हें पता भी न लगा. महात्मा गांधी ने तीस-पैंतीस वर्षों में जो विश्वास इस देश के जन मन में पैदा किया, उसको मटियामेट करके रख दिया कांग्रेस और विपक्षी नेताओं ने. एक-दूसरे पर विश्वास, सरकार की नीतियों पर विश्वास, नेताओं पर विश्वास और अपने देश की ताकत पर विश्वास- यही तो आधार हैं राष्ट्रीय एकता के. विश्वास टूट रहा है और राष्ट्रीय एकता का अमृत कलश फूट रहा है. हजारों वर्षों से खोयी राष्ट्रीय एकता को बड़ी मुश्किल से फिर पाया था हम लोगों ने, लेकिन शायद उसे पचास वर्षों तक भी संभाल नहीं पाये. गांधी का फिर इंतजार है, लेकिन अफसोस कि गांधी बार-बार नहीं आते.
Comments
Post a Comment