Skip to main content

थोड़ी आंच बनी रहने दो, थोड़ा धुआँ निकलने दो

इस्लामी दहशतगर्दों ने इस विशाल भारत देश के विभिन्न हिस्सों में बार-बार अपनी हिंसक घिनौनी हरकतों से यही कोशिश की है कि हिंदू-मुस्लिम दंगे भड़कें, मुस्लिम बड़ी संख्या में मारे जाएं, ताकि दुनिया के तमाम मुस्लिम देशों को भारत के खिलाफ एकजुट किया जा सके. दंगे तो नहीं हुए, लेकिन इन आतंकवादियों के खिलाफ भारतीय मुसलमानों की चुप्पी से जनमानस में आशंका गहराने लगी कि स्थानीय मुसलमानों के सहयोग एवं स्वीकृति से ही ये आतंकवादी इतने बड़े हादसे करने में कामयाब हो पाते हैं. आग तो बुझी रही, लेकिन अंगारों पर घी पड़ता रहा. निदा फाज़ली को भी बहुत ही दर्दभरे शब्दों में लिखना पड़ा– उठ-उठ के मस्जिदों से नमाज़ी चले गये, दहशतगरों के हाथ में इस्लाम रह गया.

और, अचानक हुआ मुंबई का हादसा, सैकड़ों लोग मरे, हिंदू-मुस्लिम खून साथ- साथ बहे एवं एक साथ उबले. मुंबई के मुसलमानों ने एलान कर दिया कि मारे गए नौ दहशतगर्दों में से किसीको भी मुस्लिम कब्रिस्तान में दफनाने नहीं दिया जाएगा. देश के अन्य शहरों में भी मुस्लिम संस्थाओं ने इनके खिलाफ जुलूस निकाले, नारे लगाए. दिल्ली के शाही इमाम ने कहा कि यह जेहाद नहीं जघन्य अपराध है, उन्होंने भारत में इस प्रकार की दहशत फैलाने के लिये पाकिस्तान की भर्त्सना भी की. फतेहपुरी मस्जिद के इमाम ने भी ऐसी हरकतों को इस्लाम के खिलाफ बतलाया. पूरे देश में बकरीद के दिन अधिकांश मुसलमानों ने मुंबई की घटना के विरोध में बाहों पर काली पट्टियां बांध रखी थीं. भारतीय मुसलमानों ने पाकिस्तान और इन मक्कार जेहादियों के खिलाफ पहली बार अपना मुंह खोला. सभी को अच्छा लगा.निदा फाजली को भी अच्छा लगा होगा कि नमाजी वापस आने लगे हैं. पहले चाहकर भी नहीं बोल पाने के अनेक कारण रहे होंगे, कुछ धर्म के भय से, कुछ यों ही.

इन आतंकवादियों की योजना थी, बड़े- बड़े लोगों जिनमें विदेशी भी होते को बंधक बनाकर अपनी मांगें मनवाने की, पाँसा उल्टा पड़ गया, बंधकों की जान की चिंता कम करते हुए आतंकियों को मार गिराने पर अधिक ध्यान दिया गया, जनता दल के शासन काल में अपहृत रूबिया को छुड़ाने के लिये आतंकियों के सामने झुकने का जो सिलसिला शुरू हुआ था उसपर रोक लगी. पुलिस, सेना और कमांडो की साख बढ़ी, राजनेताओं की किरकिरी हुई, शायद इनमें से कुछ सुधर जाएं और भविष्य में हास्यास्पद बयानबाजी से बचें एवं गंभीर दुखद मुद्दों में भी राजनैतिक लाभ खोजने से बाज आएं. वैसे केरल और गुजरात के मुख्यमंत्रियों को अपनी बेइज्जती से अच्छा सबक मिला होगा, बशर्ते कि वे दुहराने की भूल न करें. मालेगांव मामले में करकरे के विरोध में दिया गया वक्तव्य आडवाणीजी को आज उनकी शहादत के बाद जरूर चुभता होगा, भलेही वे माफी न मांगें. आतंकवादियों के खिलाफ किये गये मुस्लिम प्रदर्शनों ने हिंदू-हितचिंतकों की उग्रता को थोड़ा नरम जरूर किया होगा. नटखट राज ठाकरे की बोलती भी अभी बंद है, आतंकवादियों से मुकाबला करते हुए विभिन्न प्रदेशों से आए जवानों की शहादत ने उनकी “मुंबई सिर्फ मराठियों के लिये” वाली थ्योरी की धज्जियाँ उड़ा दी हैं. अबतक हम अकेले बोलते थे, लेकिन पूरे हादसे के लाइव मीडिया कवरेज ने पूरी दुनिया को पाकिस्तान के खिलाफ हमारे साथ खड़ा कर दिया है.

दहशतगर्दों की लाशों को किसी भी मुस्लिम कब्रगाह में जगह न दिये जाने का बहुत बड़ा असर भविष्य के आतंकवादियों की सोच पर पड़ेगा. प्रशिक्षण के दौरान उन्हें समझाया जाता है कि वे काफिरों के खिलाफ जेहाद में शामिल हो रहे हैं, इस्लाम की जड़ें मजबूत कर रहे हैं और यदि मरे तो सीधे जन्नत नसीब होगी. जब उन्हें पता चलेगा कि इस प्रकार मरने के बाद उन्हें इस्लामी संस्कारों के साथ दफन नहीं किया जाएगा, तो शायद वे ऐसी मौत के लिये आसानी से तैयार न हों क्योंकि जन्नत जाना तो दूर की बात है, उनकी रूह जिन्न- प्रेत बनकर भटकती रहेगी. भला कौन भटकना चाहेगा ऐसे ?

मुंबई हादसे ने हमें दर्द का अथाह समंदर दिया है, लेकिन बहुत कुछ खोने के बाद काफी कुछ मिला भी है. हम एक होने की बातें दिल से करने लगे हैं, अपनी सुरक्षा के लिये सजग हुए हैं, अधिक मजबूत होने के संकल्प पर अमल करने में तत्परता दिखा रहे हैं, जरूरत है दुष्यन्त के शब्दों में- बस थोड़ी आंच बनी रहे, थोड़ा धुआँ निकलता रहे.

Comments

Popular posts from this blog

“हर घड़ी शुभ घड़ी, हर वार शुभ वार”

रांची के हरमू स्थित श्मशान घाट का नाम ‘मुक्तिधाम’ है जिसे मारवाड़ी सहायक समिति ने बहुत सुंदर बनाया है, बारिश एवं धूप से चिताओं की सुरक्षा हेतु बड़े- बड़े शेड बने हैं, चिता बुझने का इंतजार करने वाले लोगों के लिये बैठने की आरामदायक व्यवस्था है, जिंदगी की क्षणभंगुरता को व्यक्त करते एवं धर्म से नाता जोड़ने की शिक्षा देते दोहे एवं उद्धरण जगह- जगह दीवारों पर लिखे हैं. हर तरह के लोग वहां जाते हैं, दोहे पढ़ते हैं, कुछ देर सोचते भी हैं, मुक्तिधाम से बाहर निकलते ही सब कुछ भूल जाते हैं. इन दोहों का असर दिमाग पर जीवन से भी अधिक क्षणभंगुर होता है.मुक्तिधाम में गुरु नानकदेव रचित एक दोहा मुझे बहुत अपील करता है- “हर घड़ी शुभ घड़ी, हर वार शुभ वार; नानक भद्रा तब लगे जब रूठे करतार.” पता नहीं दूसरे क्या समझते व सोचते हैं. आज से पचास साल पहले लोग यात्रा पर निकलने से पूर्व मुहूर्त दिखला लेते थे, जिस दिशा में जाना है, उधर उस दिन दिशाशूल तो नहीं, पता कर लेते थे. अमुक- अमुक दिन दाढी नहीं बनवानी, बाल एवं नाखून नहीं कटवाने, इसका भी कड़ाई से पालन करते थे. मूल नक्षत्र में कोई पैदा हो गया, तो अनिष्ट की आशंका दूर करने हेतु ...

रैगिंग- क्या, क्यों और क्यों नहीं ?

हर वर्ष नये एडमिशन के बाद पूरे देश के अनेक इंजीनियरिंग, मेडिकल, मैनेजमेंट और कुछ अन्य कॉलेजों में जब नये छात्र प्रवेश लेते हैं, तो पुराने सीनियर छात्र उन्हें नये माहौल में ढालने के नाम पर उनकी रैगिंग करते हैं. रैगिंग का मतलब ही होता है किसी की इतनी खिंचाई करना कि उसके व्यक्तित्व और स्वाभिमान के चीथड़े- चीथड़े हो जाएं. कई सीनियर छात्रों के द्वारा किसी एक नये छात्र को घेरकर ऊलजलूल सवाल करना और हर जबाब को गलत बताते हुए खिल्ली उड़ाना, ऊटपटांग हरकतें करवाना, गालीगलौज और अश्लील बातें करके नये छात्रों को मानसिक और शारीरिक यंत्रणा देना ही रैगिंग है. रैगिंग के परिणाम स्वरूप हर वर्ष दो-चार छात्र आत्महत्या कर लेते हैं, कुछ मानसिक रूप से गंभीर बीमार हो जाते हैं. वैसे तो अधिकांश नये छात्र रैगिंग के फलस्वरूप अल्ट्रामॉडर्न बन जाते हैं, लेकिन कुछ लड़कों को रैगिंग के दौरान जबर्दस्त झटका लगता है. वे जो कुछ बचपन से किशोरावस्था तक पहुंचने में सीखे हुए होते हैं, सब एक झटके में धराशायी हो जाता है. यहां तो हर वाक्य में “मां-बहन” को लपेटती हुई बुरी- बुरी गालियां दी जाती हैं, सिखाई और रटवाई जाती हैं, वर्जित सेक्स ...

आदिवासी मुख्यमंत्रियों से बेहतर है राष्ट्रपति शासन ?

झारखंड राज्य के गठन के बाद नौ बार गणतंत्र दिवस समारोह का आयोजन किया जा चुका. आदिवासी बहुल इस क्षेत्र को अलग raajy बनाने के लिये बहुत लंबा आंदोलन चला, मान्यता यही थी कि खनिजसंपन्न इस क्षेत्र में आदिवासियों का सर्वांगीण विकास अपने अलग राज्य में ही उनके ही हाथों से हो सकता है. विगत आठ वर्षों में यहां भयंकर राजनैतिक उथल पुथल हुई, एक निर्दलीय भी मुख्यमंत्री बना, अन्य आदिवासी मंत्रियों ने भी भ्रष्टाचार की हुगली में नंगा स्नान किया, इनके एजेंडे में झारखंड या अदिवासियों के विकास की बात दूर -दूर तक नही रही, सब ने मिलकर इतनी छीछालेदर कर दी कि राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा. राज्य-गठन के आठ वर्षों में झारखंड में चार मुख्य मंत्री हुए, चारों आदिवासी, अधिकांश मंत्री भी आदिवासी ही रहे, काबिल या नाकाबिल होने से कोई फर्क नहीं पड़ता, बस आदिवासी होने का ठप्पा होना चाहिये. वैसे तो ऐसा कोई कानून नहीं है, केवल आदिवासियों के तुष्टिकरण के लिये यह प्रथा चल पडी है.झारखंड गठन के प्रथम दिवस से ही हम एक गलत सोच के शिकार हैं कि आदिवासी ही आदिवासियों की समस्याओं को समझकर उनका निदान निकाल सकते हैं. झारखंड और छत्तीसगढ़ राज्य...