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विरोधाभासों के युग में जीने को अभिशप्त हम सब

प्राकृतिक चुनौतियों से हारना आदमी को कभी बर्दाश्त नहीं रहा, इसीलिये लगातार संघर्षकर उसने सुख और सुरक्षा के अनगिनत साधन जुटा दिये हैं, मनोरंजन की तो परिभाषा ही बदल दी है. बैठे- बैठे एक बटन दबाइये, मनचाहा मनोरंजन आपके सामने हाजिर है. आज के आदमी की क्षमता मशीनों की मदद से असीम हो गयी है, लेकिन इन सब सुख- सुविधाओं एवं उपलब्धियों की बहुत बड़ी कीमत उसे चुकानी पड़ी है. आज व्यक्ति के निजी जीवन में, पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय जीवन में विरोधाभास ही विरोधाभास भर गया है.
मेरे पास अंग्रेजी में एक ईमेल आया जिसमें आज के अनेक विरोधाभासों का बहुत सुंदर उल्लेख था, वाकई आज हम विरोधाभासों के युग में जी रहे हैं. शायद हम दोराहे पर खड़े हैं जहां एक ओर अंधविश्वास और धार्मिक कर्मकांडों की बेड़ियों को तोड़ नहीं पा रहे, दूसरी ओर वैज्ञानिक विचारधारा को भी पूरे मन से नहीं अपना पा रहे. हमारे पास उच्च शिक्षा की डिग्रियां अधिक हो गयी हैं, लेकिन कॉमन सेंस कम हो गया है. हमारा ज्ञान बढ़ गया है, पर विवेक कम हो गया है. आज अधिक उन्नत दवाएं हैं, लेकिन हम पहले से कम स्वस्थ हैं. हमने अपनी जिन्दगी में अनेक वर्ष जोड़ लिये हैं, लेकिन उन वर्षों से जिन्दगी गुम हो गयी है. रास्ते चौड़े होते जा रहे हैं, लेकिन हमारी विचारधारा संकीर्ण होती जा रही है. आज हम चांद पर जाकर वापस आ गये हैं , लेकिन सड़क के उस पार रहने वाले पड़ोसी तक को नहीं जानते. टेलीकम्युनिकेशन में हमारी स्पीड का जबाब नहीं, पर आपस में संवादहीनता की स्थिति है. व्यापार में गगनचुंबी मुनाफे हैं, तो आपसी छिछले संबंधों का आडंबर भी साथ है. खूबसूरत से खूबसूरत मकान हैं ,तो टूटते हुए घर परिवार भी. समय है कद में लंबे होते लोगों और बौने चरित्रों का. धन से घर भरा है, लेकिन मूल्यों में भयंकर गिरावट आ गयी है.
आदमी की कथनी और करनी में जमीन -आसमान का अंतर आ गया है, भारत एवं अन्य एशियाई देशों में यह अंतर अधिक दिखलाई पड़ता है. यहां राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित नेता भी हजारों की भीड़ के सामने सुबह कुछ कहते हैं और दोपहर को नकार जाते हैं. अमेरिका में एक टेप कांड के कारण राष्ट्रपति निक्सन की गद्दी उलट जाती है, मोनिका लेवंस्की से अपने संबंध की बात एक बार नकार का झूठ बोलने के लिये क्लिंटन की छीछालेदर हो जाती है. लेकिन हमारे यहां झूठों और घोटालों की माला पहनकर घूमनेवाले नेताओं का कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाता, चुनावों में वे बार बार चुने जाते हैं. वे अपने मित्र और दुश्मन अपनी शर्ट की तरह बदलते हैं. राजनैतिक दल भी अपनी नीतियों पर स्थिर नही.यदि एक दल ने रोते-गाते किसी प्रकार अपने किसी भ्रष्ट नेता को निकाल बाहर किया तो दूसरे दल उसे लपकने के लिये तैयार खड़े होते हैं क्योंकि अगले चुनावों के लिये उन्हें एक जीतने की संभावनावाला प्रत्याशी मिल जाता है, भले ही उसके खिलाफ कितना शोरगुल उन्होंने ही क्यों न मचाया हो. हिमाचल प्रदेश के सुखराम का घिनौना प्रकरण भाजपा के अवसरवादी चरित्र को उजागर करता है.
झूठ बोलना हमारा राष्ट्रीय चरित्र बन गया है, दोष किसे दिया जाये ? धर्म हमें “सत्यमेव जयते” की शिक्षा देता आया है, फिर हम इतने झूठे क्यों हो गये हैं कि छोटी छोटी बात पर झूठ बोलते हैं. सोचते कुछ हैं, बोलते कुछ हैं,चाहते कुछ हैं, करते कुछ और हैं. हमारी अभिशप्त पीढ़ी ऐसे ही विरोधाभासों के बीच जी रही है, हर जगह नाकाबिल नेताओं की हां में हां मिलाती, उनके द्वारा इस्तेमाल होती हुई.

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