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अपने अंदर भी एक दीप जलाओ

आलोक पर्व की मधुरिम बेला,
मैंने कल रात एक छोटा सा दीप जलाया
आशाओं की बाती को स्नेह से सराबोर कर
मिट्टी की कटोरी में.
नन्हा सा दीप टिमटिमा कर जल उठा,
अमावस्या के अंधेरे की छाती को चीरकर.
मैंने पूछा - नन्हें प्यारे दीप
क्या तुम्हें जरा भी डर नहीं लगता ?
रात का विकराल दानव
तेजस्वी सूर्य को निगल जाता है
तुम टिमटिमाते रहते हो,
आलोक बिखेरते रहते हो.
खिलखिलाया वह नन्हा दीप,
चौंक कर, सहमकर छिटक गये कुछ शलभ
वीणा के तारों को छेड़ दिया हो,
जैसे कुछ नाजुक अंगुलियों ने.
भय, विभ्रम, क्षोभ, असंतोष हैं
कुछ लोगों के भाव,
हैं बड़े लोगों के विकार,
मुझे तो अपने धर्म से है काम
मेरा धर्म है, प्रकाश बिखेरना.

मैं बिखेरता हूं आलोक यही मेरा धर्म है,
अंधकार से क्या वास्ता
मैंने अंधकार को देखा ही नहीं कभी.
सुना है कि अंधकार होता है
तुम्हीं लोग कहते हो,
बहुत विकराल और भयानक होता है
पर मैंने तो कभी नहीं देखा.
मेरी तो मुलाकात ही नहीं कभी अंधकार से.
जिससे मुलाकात ही नहीं,
उससे दुश्मनी कैसी?
मैं अंधकार दूर नहीं करता
मैं तो सिर्फ आलोक बिखेरता हूं.
मुझे नहीं आक्रोश किसी पर.
लाओ एक बोरी अंधकार
उँडेल दो मुझ पर
मैं फिर भी जलता रहूंगा
अपने धर्म का पालन करता हुआ.
दीपावली की इस पुनीत बेला पर
यही संदेश है मेरा.
तुम भी जलते रहो पल-पल,
क्षण-क्षण शिकवों से दूर,
शिकायतों से परे.
अपने धर्म की चिंता करो
दूसरों के धर्म से क्या वास्ता?
अपने-अपने धर्म तलाशो,
अपने आपको पहचानो,
अपने अंदर भी एक दीप जलाओ
जलते-जलते स्वयं दीपक बन जाओ.

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