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डर है कि कहीं फिर से गुलाम न हो जाएं

पीछे चलने की जगह साथ-साथ क्यों न चलें?
वर्ष 1947 से इन्दिराजी के काल तक हमारी पॉलिसी थी, जिन वस्तुओं का आयात किया जा रहा है, उन्हें बनाने की टेक्नॉलॉजी यहीं पर विकसित की जाए, इस तरह के इंपोर्ट सब्स्टीच्युशन पर सरकार प्रोत्साहन के तौर पर वित्तीय सहायता एवं पुरस्कार भी देती थी. राजीव गांधी ने कहा कि हमें वस्तुओं के आयात के साथ उन्हें बनाने की टेक्नॉलॉजी का भी आयात करना चाहिये, अपने यहां टेक्नॉलॉजी विकसित करने के चक्कर में हम पीछे रह जाते हैं. जब तक हम उन्नत देशों के पुराने स्तर पर पहुंचते हैं वे हमसे काफी आगे निकल जाते हैं.
बी एच.यू के सेरेमिक्स डिपार्टमेंट के एक प्रोफेसर से मेरी बातें हो रही थीं. उन्होंने एक घटना का जिक्र करते हुए बताया कि एक प्रकार के सेरेमिक मैटीरियल का बहुत ऊंचे दाम पर आयात किया जा रहा था, उसे बनाने की टेक्नॉलॉजी उनके विभाग में विकसित की गयी. जैसे ही उसके उत्पादन की तैयारी होने लगी, उस विदेशी कंपनी ने दाम इतने गिरा दिये कि यहां बनाना घाटे का सौदा हो गया. इस बीच में उस कंपनी ने अपनी टेक्नॉलॉजी को अधिक उन्नत कर उत्पादन लागत बहुत कम कर लिया था. इंपोर्ट सब्स्टीच्युशन के मामले में इसी प्रकार देश को अधिकांश मामलों में नुकसान ही हुआ. उन्नत देश आज जहां हैं वहां तक हम किसी प्रकार अपने दम पर दस साल में हांफते हुए पहुंचते हैं तो पाते हैं कि दुनिया पन्द्रह साल और आगे चली गयी.
श्रीनिवास रामानुजन की गिनती विश्व के सर्वकालीन चार सर्वश्रेष्ठ गणितज्ञों में होती है. सिर्फ मैट्रिक पास थे, गरीबी के कारण उन्हें उच्च गणित की किताबें भी उपलब्ध नहीं थीं. दूसरे देशों में क्या शोध हो चुकी, क्या हो रही है, उन्हें कुछ भी पता नहीं था. वे तो अपनी धुन में एब्स्ट्रैक्ट मैथेमेटिक्स में नित्य नये फॉर्मूले एवं थ्योरम निकालते जा रहे थे और संक्षेप में लिखते जा रहे थे. 33 वर्ष की अल्पायु में उनका निधन हुआ, उनकी चारों नोटबुक का अध्र्ययन करने पर निष्कर्ष निकला कि उनके सारे शोध एकदम मौलिक थे, लेकिन दुर्भाग्य से कई शोध ऐसे भी थे जो पहले ही कहीं न कहीं किसी ने कर लिये थे जिनके बारे में उन्हें नहीं पता था, उनका कितना बहुमूल्य समय इस तरह के अनुसंधानों में बेकार चला गया, यदि दुनिया के साथ चलने का मौका उन्हें मिला होता तो पता नहीं और क्या- क्या अद्भुत उन्होंने विश्व को दिया होता.
प्लास्टिक मशीनों की एक अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी में मैने गौर किया कि यूरोपियन देशों के द्वारा तकरीबन एक करोड़ रुपयों में बेची जा रही इंजेक्शन मोल्डिंग मशीनों से उसी प्रकार की चायनीज मशीनों का दाम लगभग आधा था. मेरे पूछने पर एक भलेमानुस चायनीज सेल्समैन ने बहुत ईमानदारी से जबाब दिया कि यूरोपियन मशीनों में जो विशेषताएं हैं, फीचर्स हैं, उन्हें अपनी मशीनों में हमें विकसित करने में अभी कम से कम दस साल लगेंगे. यह हाल तो तब है जब चीन इन उन्नत देशों की उन्नत टेक्नॉलॉजी पिछले बीस वर्षों से प्राप्त कर रहा है.
हम भारतीय तो इन चीनियों से भी पीछे हैं क्योंकि हमें उन्नत देशों की टेक्नॉलॉजी लेने के लिये किये गये समझौतों से ही एलर्जी है, हमें यही डर लगता है कि हमें फिर से गुलाम बनाने की कोशिश हो रही है. हमने पोखरण में विस्फोट कर लिये, यह बहुत ही खुशी की बात है. लेकिन यह भी सत्य है कि हमारे वैज्ञानिकों ने अपने दम पर कोई मौलिक टेक्नॉलॉजी विकसित नहीं की, जो कुछ भी विदेशों में हो रहा था, वह किताबों और शोधपत्रों में उपलब्ध था, बस उसे अपने संसाधनों से कॉपी करना था, वही इंपोर्ट सब्स्टीच्युशन का काम करना, लेकिन इस बीच में दुनिया बहुत आगे चली गयी है, हम उनसे न्युक्लियर टेक्नॉलॉजी में बीस-पचीस साल पीछे हो गये हैं.
यहां एक बात गौर करने की है, जब हम किसी से एक टेक्नॉलॉजी लेते हैं तो वह अकेली नहीं होती, उसके साथ छोटी- बड़ी अनेक तकनीकें भी साथ में आती हैं, वहां से आगे कुछ विकसित व शोध करने की रफ्तार अचानक बढ़ जाती है. हमारे यहां भी कंप्युटर और टेलीकम्युनिकेशन के विकास के कारण हर क्षेत्र में प्रगति की रफ्तार बहुत बढ़ गयी है, समाजवादियों ने मजदूर संघों के माध्यम से बेरोजगारी बढ़ने के बहाने जबर्दस्त विरोध किया था. यदि हमने टेलीकम्युनिकेशन के आधुनिकतम उपकरण एवं कंप्युटर विदेशों से आयात न किये होते, विदेशी कंपनियों का रास्ता रोककर खड़े होते, तो आज हमारा क्या हश्र होता सोचकर बदन मे झुरझुरी होने लगती है.
विरोध करना है तो ठोस व पारदर्शी कारण बताइये
सबसे बड़ा अफसोस तो इस बात का होता है कि इस देश के धूर्त नेता अपना उल्लू सीधा करने के लिये भोली भाली अशिक्षित जनता को बरगलाने का कोई मौका नहीं चूकते. उन्हें देश के दूरगामी हित से कोई मतलब नहीं होता, वे तो तत्काल विरोध कर यदि कोई फायदा मिल रहा है तो उसे भुनाने की कोशिश करते हैं. जब कभी टेक्नॉलॉजी के क्षेत्र में दूसरे देशों से सहयोग की बात होती है, इन्हें तुरंत ईस्ट इंडिया कंपनी का भूत सताने लगता है, देश भक्ति की दुहाई देने लगते हैं, दूसरे देशों का गुलाम बन जाने का हव्वा खड़ा कर देते हैं, इनके पास कुछ रटे रटाए जुमले होते हैं बार बार दुहराने के लिये. नासमझ जनता की भावनाओं को उत्तेजित कर ये आंदोलन व विरोध के लिये उन्हें उकसाने में सफलता पा लेते हैं. जब भाखड़ा नांगल डैम बन रहा था, ये ही लोग आम किसानों को भड़का रहे थे, जब डैम के पानी से सरकार बिजली बनाएगी, तब पानी से सारी ताकत निकल जाएगी , उसके बाद फिर उससे खेत क्या सींचोगे, कोई असर ही नही होगा, फसल मारी जाएगी. इसे मुद्दा बनाकर वोट भी मांगे गये.
अंग्रेजी में शिक्षा देने का तो विरोध होता ही रहा, कई प्रदेशों से अंग्रेजी को अनिवार्य विषयों की सूची से ही हटा दिया गया, बिना अंग्रेजी के मैट्रिक पास करने वालों की पीढ़ी ने ही बाद में इन राज्यों की बागडोर संभाली, अब सोचने की बात है कि अंग्रेजी और आधुनिक विज्ञान टेक्नॉलॉजी से एलर्जी रखनेवाले इन नेताओं ने इन राज्यों की कितनी दुर्दशा की होगी. यदि इन लोगों की चलती तो आज भारत आइ. टी. में दुनिया के शीर्ष पर न होता और न हमारे पास होता इतना विदेशी मुद्रा भंडार जिसपर ये आज इतना इतरा रहे हैं. समाजवादी जॉर्ज फर्नेंन्डीज ने तो सभी विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बाहर निकाल कर इस देश को वापस उन्नीसवीं शताब्दी में पहुंचाने की पूरी तैयारी ही कर दी थी.
आज परमाणु समझौते के मुद्दे पर इसी प्रकार का हौव्वा खड़ा किया जा रहा है. भाजपा इसलिये विरोध कर रही है कि समझौते की बात उसके शासन काल में शुरू हुई और सारा क्रेडिट काँग्रेस अकेले ले जा रही है. कारण बताने के लिये बस वही पुराने जुमले ‘स्वदेशी, गुलामी और देश को बेच दिया’ . कम्युनिस्टों का विरोध समझौते से नहीं, अमेरिका से है, इससे कड़ी और विपरीत शर्तों पर भी चीन या रूस से समझौते की बात होती तो भी वे तुरंत तैयार हो जाते, उनकी देशभक्ति रूस और चीन के लिये है. यही समझौता चीन का अमेरिका के साथ है. हो सकता है कि चीन के इशारों पर ही वे यह विरोध कर रहे हों, ताकि भारत अधिक मजबूत होकर चीन का प्रतिद्वन्द्वी न बन जाए. इनके भी वही पुराने रटे रटाए जुमले. मायावती तो यू .पी. का चुनाव क्या जीत गयीं, अपने को सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान ही समझने लगीं. क्या बोलती हैं क्या बोलेंगी, वही समझती हैं. छोटे दलों और स्वतंत्र सांसदों की देशभक्ति तो उनके अपने चुनावी क्षेत्र के वोट बैंक तक ही सीमित है, या फिर स्थिति को अपने पक्ष में भुनाने में ही है. इस देश को वे भी बिकने नहीं देना चाहते, कौन खरीदेगा चिड़ियाघर के जानवरों से भी बदतर राजनेताओं के इस देश को, खरीद भी लिया तो माथा पीटेगा.
हमारे देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि परमाणु शक्ति का ‘क –ख- ग’ न जानने वाले सांसद और नेता इस मुद्दे पर इस देश का भविष्य तय करते हैं. सिद्धांततः परमाणु करार से इस देश के परमाणु विशेषज्ञों की सहमति है, अब्दुल कलाम सहित अन्य प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों ने अपनी हरी झंडी दिखा दी है. इन सभी दलों से अच्छे तो मुलायम सिंह निकले जिन्होंने परमाणु क्षेत्र में अपनी और अपनी पार्टी की अज्ञानता को स्वीकार करते हुए सीधी बातचीत कलाम साहब से की और उनकी सहमति के आधार पर अपने दल की नीति इस जटिल मुद्दे पर तय की. जिन दलों और व्यक्तियों ने करार के पक्ष में मत दिया है, विडंबना तो यह है कि उन्हें भी इस मुद्दे पर कोई जानकारी नहीं है, सिर्फ अपने किसी न किसी स्वार्थ के वश में उन्होंने सरकार को समर्थन दिया है. अन्यथा कभी “आइ- फाइटी क्या होता है” कहनेवाले लालूजी के द्वारा दिए गये समर्थन के पीछे उनकी क्या समझ हो सकती है? हां, हो सकता है कि वे आजकल इन मुद्दों पर अपनी उच्च शिक्षित लड़कियों और आइ. टी इंजीनियर दामाद से समझकर अपनी राय बनाते हों, यदि ऐसा है तो बुरा नहीं है. बिना समझे विरोध करने से तो अच्छा यही है.
जब वर्ष 1991 में अपने यहां उदारीकरण का दौर शुरू हुआ, चारों ओर इसके विरोध में यही हल्ला सुनाई पड़ने लगा कि अब भारतीय कंपनियां विदेशी कंपनियों के सामने टिक नहीं पाएंगी, या तो दिवालिया हो जाएंगी या बहुराष्ट्रीय कंपनियों के द्वारा निगल ली जाएंगी. लेकिन हुआ उलटा, भारतीय कंपनियों ने ही हर क्षेत्र में बड़ी- बड़ी विदेशी कंपनियों का अधिग्रहण कर लिया. टाटा स्टील कभी कोरस कंपनी को ले लेगी, कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था. “टेटली” को टाटा टी ने ले लिया, टाटा मोटर्स ने जगुआर और लैंड रोवर जैसे प्रतिष्ठित ब्रान्डों पर कब्जा कर लिया. दवा कंपनियां हों या ऑटो पार्ट्स बनाने वाली कंपनियां, हरएक ने विदेशों में कंपनियों को लेने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखलाई. आदित्य बिड़ला ग्रुप की ग्रासिम हो या अनिल अग्रवाल की स्टरलाइट यानि वेदांत,रिलायेंस का तो जबाब नहीं, ये सारी कंपनियां आज स्वयं बहुराष्ट्रीय कंपनियां बन गयी हैं. आज भारत फोर्ज दुनिया में दूसरे नंबर पर है, सीडी बनानेवाली मोजर बायर कंपनी चौथे नंबर पर है. स्टील सम्राट मित्तल को तो अधिग्रहण किंग भी कहा जाता है. टाटा की नैनो कार ने उत्पादन के पहले ही विश्व में तहलका मचा दिया.
उदारीकरण के बाद तो जैसे भारतीय कंपनियों में अपनी मशीनों और टेक्नोलॉजी को विश्व स्तर पर लाने की होड़ मच गयी. प्रचुर विदेशी मुद्रा भंडार की वजह से विदेश-यात्राओं की खुली छूट मिली और आयात पर लगे अधिकांश प्रतिबंध हटा लिये गये, बस जैसे एक फाटक खुल गया हो, लेटेस्ट टेक्नोलॉजी की बाढ़ सी आ गयी. लोगों ने विदेशी कंपनियों के साथ ग़ंठजोड़ किया, उनकी आधुनिकतम मशीनें मिलीं, विश्व बाजार में टिकने के लिये क्वालिटी में तत्काल सुधार लाना और उन्नत तकनीक एवं मैनेजमेंट से लागत में कमी लाना इनकी मजबूरी हो गयी और वे इन सब में सफल भी हुईं. इस प्रकार भारतीय कंपनियों को चौतरफा फायदा हुआ. कोई भी टेक्नोलॉजी एक क्षेत्र में आती है, उसका फायदा अनेक क्षेत्र उठाते हैं. शुरू में मारुति के अधिकांश पुर्जे सुजुकी कंपनी जापान से भेजती थी, लेकिन उसके पुर्जे बनाने के लिये अनेक अनुषंगी इकाइयां भी सुजुकी टेक्नोलॉजी के साथ चालू हुईं, आज ये इकाइयां इतनी आगे चली गयी हैं कि उनसे विश्व के दूसरे कार निर्माता भी अपने लिये पुर्जे खरीद रहे हैं.
आइये अब बातें करें परमाणु करार की, वास्तव में यह समझौता सिर्फ भारत और अमेरिका में नहीं है, बल्कि अमेरिका के माध्यम से पूरे विश्व के साथ है. पिछले 33 सालों से हम परमाणु सामग्री और संयत्र के मामले में पूरी दुनिया में अलग- थलग कर दिये गये हैं, हमारा पुराना मित्र रूस भी हमारी मदद नहीं कर पा रहा. परमाणु अप्रसार संधि पर दुनिया के 189 देशों ने हस्ताक्षर किये हैं, हमने नहीं किया. दूसरों की नजर में हम विश्व शांति के खलनायक हैं. चीन और पाकिस्तान जैसे दुश्मन हमारी गर्दन पर सवार बैठे हैं, फलतः हमारा नजरिया अलग होगा ही, दुनिया के दूसरे देश हमारे नजरिये को तभी समझेंगे जब हम सुपर पावर बन जाएं या हमारे यहां उनकी गर्दन फंसी हो. आज हमारे यहां न तो कोई इंदिरा जैसा कद्दावर नेता है, न कोई मजबूत राजनैतिक दल जो अपने बूते सरकार बना ले, अब मिली जुली अस्थिर सरकारें ही बनेंगी जो पांच साल तक अपने अस्तित्व के लिये ही संघर्ष करती रहेंगी, इसलिये सुपर पावर बनने का सपना तो फिलहाल स्थगित कर देना चाहिए. हां यदि यह समझौता हो जाता है तो परमाणु संयंत्र बेचने के लिये बहुराष्ट्रीय कंपनियां हमारे यहां लाइन लगा देंगी. वे यहां परमाणु संयंत्र के निर्माण के लिये प्लांट भी लगाएंगी, हमें अपनी टेक्नोलॉजी देंगी, यहां से निर्यात भी करेंगी. हमारी बी.एच.ई.एल एवं एल एंड टी जैसी कंपनियों ने तो कुछ कंपनियों से करार भी कर लिया है, अपने संसाधनों के बूते पर एच.ई.सी जैसी कंपनियों के भी पौ बारह हो जाएंगे. भारतीय कंपनियों के साथ मिलकर या स्वतंत्र रूप से लगाने दीजिये उन बहुराष्ट्रीय कंपनियों को प्लांट यहां पर, तभी तो उनकी गर्दन हमारी मुठ्ठी में आयेगी. वे जब यहां आएंगे, तभी पड़ोसियों से मिलने वाले हमारे दुख दर्द को समझेंगे, उन्हें खुद ही अपने प्लांट की सुरक्षा की चिंता होगी, वे दुनिया में हमारे विरोध में खड़ी लॉबी को तोड़ेंगे और हमारे पक्ष में लॉबी तैयार करेंगे. हम न्युक्लियर क्षेत्र में सशक्त निर्यातक देश की भूमिका में आ जाएंगे, हमारी आवाज उन्हें सुननी पड़ेगी. हम इतने ताकतवर स्वयं होंगे कि हम कोई भी समझौता तोड़ें, कोई कुछ भी नही कर पाएगा. सुपर पावर बनना है तो साम दाम दंड भेद का इस्तेमाल कर दुनिया को मुठ्ठी में करना ही होगा, इस युग में हमें हरीश्चन्द्र, दशरथ-राम या भीष्म बनने की क्या जरूरत, बनना है कृष्ण और चाणक्य.

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