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और, और, और ....माँगे आदमी !

पुराणों में एक विनोद कथा है. एकबार ब्रह्माजी ने घोषणा की कि सृष्टि के सभी लोग अपनी पसंद का एक एक पात्र लेकर आएं, वे जो कुछ भी मांगेगे उनके लाए हुए पात्र में पूरा भरकर दे दिया जाएगा. लोग अपनी -अपनी क्षमता के अनुरूप अलग- अलग पात्र लेकर आए. सभी के पात्र भर- भर कर उनकी इच्छित वस्तु ब्रह्मा ने दे दी. एक व्यक्ति कपड़े से ढंका हुआ छोटा सा पात्र लेकर आया था, ब्रह्मा अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद उसका पात्र भरने में सफल नहीं हुए, तब चकित होकर पात्र को देखने की इच्छा से उन्होंने कपड़ा हटाने को कहा. पात्र लानेवाला व्यक्ति कपड़ा हटाने को राजी नहीं, जब डाँट पड़ी तो उसने कपडा हटाया. कपड़े के अंदर से निकली आदमी की खोपड़ी. ब्रह्मा ने कहा कि मुझे तो पहले ही समझ जाना चाहिये था कि पूरी सृष्टि में आदमी ही ऐसा जीव है जिसकी सभी इच्छाएं कभी पूरी नहीं की जा सकतीं. उसकी “और, और ,और .. “ की रट कभी खत्म होने को ही नहीं.
पूरी सृष्टि में आदमी से बड़ा याचक दूसरा नहीं. यही आदमी अधिक हास्यास्पद तो तब लगता है, जब वह भगवान को ही घूस देने का प्रस्ताव रखता है. मेरा यह काम हो जाए तो सवा मन प्रसाद चढ़ाऊं. ऐसा हो जाए तो मंदिर में शृंगार कराऊं, वैसा हो जाए तो महाआरती कराऊं. कुछ लोग तो सवा रुपए के ही प्रसाद का लोभ देकर भगवान से बड़ा काम करवा लेने की चालाकी भी करते हैं. बड़ी मनोकामनाओं के लिये भगवान से मांगें तो कुछ बात भी हो, लेकिन हम इतने स्वार्थी हैं कि छोटी-छोटी इच्छाओं की पूर्ति के लिये भी भगवान को ही कष्ट देते हैं, मानो भगवान हमारे सेवक हों और हमारी मांग पर दौड़े चले आना उनकी ड्युटी है. यदि हम बहुत थक गये, तो मनाएंगे “हे भगवान, गली के मोड़ पर ही रिक्शा मिल जाए”. मई का महीना है, उमस भरी गर्मी से बेहाल लोग भगवान से बारिश की प्रार्थना कर रहे हैं, उधर किसी के यहां लड़की की शादी है, बारात आने वाली है, बारिश न होने के लिये टोटका हो रहा है, प्रसाद चढ़ाने की मनौती मानी जा रही है. भगवान परेशान कि किसकी सुनें. चोर जब आधी रात को चोरी करने निकलता है तो यही मनाता है कि लोग गहरी नींद सोते मिलें और वह सुरक्षित सारा माल लेकर वापस आ जाए. वहीं रात को धनवान सोने से पहले भगवान की गुहार लगाता है कि भगवान ही उसके धन की रक्षा करें. अब भगवान यदि सुन रहे हैं तो किसकी सुनें, विपरीत माँगों वाले दोनों पक्षों ने ही दिल से प्रार्थना की है. हम भगवान को अपना काम स्वतंत्रतापूर्वक क्यों नहीं करने देते, अपनी उल्टी सीधी मांगों से उन्हें बार- बार ऊहापोह में क्यों डाल देते हैं?
पाने का विश्वास नहीं तो मांगना क्यों जरूरी ?: वैसे एक बात बड़ी मजेदार है. भगवान से मांगना हमारे लिये तकियाकलाम बन गया है. हमें विश्वास नहीं होता कि जो मांग रहे हैं मिल जाएगा, लेकिन मांगते जाएंगे. एक गांव में लंबे समय से बारिश नहीं हुई, गांववालों ने तय किया कि किसी दिन एक जगह पर सभी लोग एकत्र होकर सामूहिक यज्ञ करेंगे, तो अवश्य बारिश हो जाएगी. निश्चित दिन सभी लोग सुबह -सुबह एक निश्चित जगह पर इकठ्ठे हुए. एक लड़का छाता लेकर आया था, उसे अनावश्यक छाता ढोते देखकर लोगों ने मजाक में पूछा, ‘बिन बारिश के छतरी?’, लड़के ने कहा कि यज्ञ के बाद तो बारिश होनी ही है, छतरी उसी समय काम आएगी. लड़के के जबाब से वे लोग भले ही शर्मिन्दा न हुए हों, लेकिन भगवान अपने भक्तों से अवश्य निराश हुए होंगे, हुए क्या होंगे, रोज ही हो रहे हैं.

बिना विश्वास के भगवान से मांगना, मांग पूरी होने के लिये चढ़ावे का प्रस्ताव देना- यही तो है चालाक आदमी की फितरत जो भगवान को भी हर कदम पर धोखा दे रहा है.
हरिद्वार के मनसादेवी मंदिर के एक वृक्ष की सभी डालियों में लाखों की संख्या में मनौती के लाल धागे बंधे हुए हैं. यहाँ आनेवाले दर्शनार्थी अपनी किसी एक कामना की पूर्ति के लिये एक धागा डाली के चारों ओर लपेट देते हैं, कामना पूरी हो जाने पर धागा खोलने के लिये वर्षों बाद वापस आते हैं, अपना धागा तो क्या पहचान में आएगा, कोई भी धागा खोलकर खुश हो जाते हैं, इस प्रकार के अनेक मंदिर पूरे भारतवर्ष में बिखरे पड़े हैं, मनौती मनाने के लिये हम मंदिर में जाते हैं, अन्यथा शायद जाएं ही नहीं. भगवान के पास गये तो मांगना जैसे आवश्यक हो. हम भगवान से मांगते तो हैं लेकिन हमें भगवान पर ही विश्वास नहीं होता. यदि हम मानते हैं कि सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी और अंतर्यामी परमात्मा ने ही हम सभी को बनाया है, तो हमे यह भी मानना चाहिये कि जो कुछ भी हो रहा है, वे हमारी भलाई के लिये ही कर रहे हैं. लेकिन जैसे ही हमने कुछ मांग लिया, वह यही दर्शाता है कि हमें या तो परमात्मा के सब कुछ जानने पर विश्वास नहीं, या फिर इसपर विश्वास नहीं कि वही सृष्टि के रचयिता हैं, सृष्टि को चलानेवाले परमपिता हैं. ऐसे याचक जब अपने को भगवान का बड़ा भक्त कहते हैं, भगवान की मूर्तियों को उठाने-सुलाने, नहलाने-धुलाने, कपड़े पहनाने-उतारने, आरती करने और भोग लगाने में घंटों बिताते नजर आते हैं तो उनपर मुझे हंसी आती है. एक तरफ तो इतना भक्तिभाव, दूसरी तरफ विश्वास का टोटा. उनसे तो नास्तिक भले जो भगवान के अस्तित्व को ही नकार देते हैं, कुछ मांगने का सवाल ही नहीं होता.
हम तत्काल लाभ देखते हैं और भगवान हमारा भविष्य संवारते हैं:एक मंत्री को भगवान पर अनन्य विश्वास था. राजा की एक उंगली तलवारबाजी के अभ्यास के दौरान कटकर अलग हो गयी, मंत्री ने सांत्वना में कहा कि भगवान की कृपा है, इसमें जरूर भविष्य की कोई भलाई छिपी है. राजा चिढ़कर सबक सिखाने हेतु शिकार के बहाने मंत्री को घने जंगल में ले गया और गहरे-सूखे कूएं में ढकेलकर व्यंग्य से बोला “बेटा कूएं में ही भूखे प्यासे तुम्हारी जान चली जाएगी, इसमें भी अपनी कोई भलाई देखते रहना और भगवान को धन्यवाद देते रहना.” मंत्री अविचलित भाव से बोला “राजन भगवान कभी भी अपने बच्चों का बुरा नहीं करते”, इतना कहकर वह मस्ती में भजन गाने लगा. चिढ़कर राजा आगे बढ़ गया और रास्ता भूल गया, साथ में तो कोई था नहीं . कुछ दूर पर आदिवासियों ने उसे पकड़ लिया. मानव-बलि के लिये वह कोई विशेष दिन था. राजा को बलि-वेदि पर लाया गया, लेकिन पाहन ने बलि लेने से इंकार कर दिया क्योंकि राजा की एक उंगली ही गायब थी और अंगभंग व्यक्ति बलि के योग्य नहीं होता. आदिवासियों ने राजा को छोड़ दिया. छूटते ही कांपता–सहमता राजा उस कूएं के पास वापस आया और मस्ती में झूमते मंत्री को उसने बाहर निकाला. राजा ने बताया कि कटी उंगली के कारण ही जान बच गयी. मंत्री ने कहा कि हुजूर मुझे भी देखिए, मैं यदि भूखा प्यासा कूएं में न पड़ा रहकर आपके साथ होता तो सभी अंग सलामत रहने के कारण आज मेरी ही बलि चढ़ जाती, भगवान ने थोड़ा कष्ट देकर जान बचा दी.
यह भले ही कपोल कल्पित कथा हो, लेकिन यदि हम अपने अतीत में घटी घटनाओं का निष्पक्ष विश्लेषण करें तो पाएंगे कि हमारे साथ भी कम ज्यादा ऐसा ही होता आ रहा है.हर बुरी लगनेवाली, कष्ट देनेवाली घटना के गर्भ में अच्छे भविष्य के बीज छिपे हुए मिलेंगे. अधिक परेशानियों से हम घबड़ाते हैं लेकिन विकट परिस्थितियों में ही हमारे व्यक्तित्व का सही विकास होता है जो हमें भविष्य के अधिक कठिन कामों के लिये तैयार करता है. बड़े लक्ष्य की प्राप्ति के लिये छोटे कष्ट तो सहने ही पड़ेंगे. यदि एक पहलवान अखाड़े में पसीना बहाने से पीछे हट जाए, तो वह कभी कुश्ती नहीं जीत पाएगा. सालों- साल अखाड़े में कष्ट सहकर उसकी मांसपेशियां पुष्ट होती हैं, उनकी ताकत बढ़ती है, तब वह राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय चैंपियन बन पाता है.

एक बात समझने की है. भगवान से कुछ मांगकर तो हम अपनी नासमझी से अपने लिये ही गढ्ढा खोद लेते है. लड़की को देखने के लिये लड़केवाले आए हैं, हम भगवान से प्रार्थना कर लेते हैं कि संबंध हो जाए. हम उस लड़के और परिवार का वर्तमान देख रहे हैं जो अति उत्तम दिखलाई पड़ रहा है. हो सकता है कि उसका भविष्य बहुत खराब होने जा रहा है, हो सकता है कि लड़के की आयु बहुत कम हो, व्यवसाय में लंबा घाटा लगनेवाला हो.भगवान हमारी बेटी की भलाई को देखते हुए यह संबंध कभी नहीं करवाते. लेकिन हमने मनौती मान ली कि यह संबंध हो जाए तो सवा मन प्रसाद चढाएंगे, भगवान ने हमारी बात मान ली, नतीजा ??
कैसी हो हमारी प्रार्थना? नेहरूजी ने एक जगह पर लिखा है कि आदमी ही रोता हुआ जन्मता है, शिकायतें करता हुआ जीता है और असंतुष्ट मरता है. कारण बस वही कि उसे भगवान की क्षमता पर अविश्वास होता है और उसकी इच्छाएं अनंत होती हैं. यदि हमें भगवान की दयालुता और न्याय पर विश्वास है, तो हमें उनसे कुछ मांगना ही नहीं चाहिये, न कभी शिकवा शिकायत ही करनी चाहिए. हमें तो भगवान के सामने जाने पर अपने शरीर के सभी सही सलामत अंगों एवं दिमाग के लिये धन्यवाद देना चाहिये, फिर उन सभी सुविधाओं और सगे-संबंधियों के लिये आभार प्रकट करना चाहिये जो उन्होंने हमें दिये हैं. मांगना है तो मांगें कि हमें उनपर अधिक गहरा विश्वास हो, सृष्टि के सभी जीव सुखी हों, सभी का कल्याण हो. बाइबिल में स्पष्ट निर्देश है कि इतने सरल शब्दों में प्रार्थना करें जो स्वयं को समझ में आए, प्रार्थना में भगवान को धन्यवाद दें, कुछ मांगें नहीं, प्रार्थना का ढोल न पीटें, उपवास रखा है तो सारे नित्यकर्म यथावत हों, किसी को उपवास के बारे में पता न लगे. गीता में भी निष्काम कर्म करने का संदेश है. वैसे तो हम साधारण मानव हैं और पूर्ण निष्काम कर्म करना हमारे वश में नहीं, फिरभी कोशिश तो कर ही सकते हैं. जब बहुत कष्ट में हों, और भगवान की प्रार्थना करने से ही सहारा मिलता है तो प्रार्थना कर लें, मांग भी लें कि कष्ट से छुटकारा मिल जाए. कुछ हद तक यह उचित हो सकता है, पर हमेशा छोटी -छोटी मांगों से भगवान को परेशान करना हमें छोड़ देना चाहिये, आदत छोड़ने में समय जरूर लगेगा, लेकिन आइए कोशिश तो करें.

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