हर वर्ष झारखंड सरकार के विभिन्न विभागों के द्वारा अरबों रुपयों की खरीद की जाती है जिसमें तीस प्रतिशत से अधिक कमीशन की बंदरबाँट लगातार होती जा रही है . जब अरबों रुपयों के घपले मामूली हो गये हों तब सरकारी खरीद एवं कामों में लाखों – करोड़ों की धांधली तो किसी गिनती में नहीं आती. खरीद की प्रक्रिया के लिये सरकारी नियम बने हैं, हर स्तर पर ऑडिट का प्रावधान है, फिर ऐसा क्यों होता है कि ये घपले होते रहते हैं और तभी इनपर उँगली उठती है जब सरकारें बदलती हैं. दस बीस दिन तो घपलों की खबरें मीडिआ में छाई रहेंगी, संबंधित मंत्रियों को भी लपेटा जायेगा, उसके बाद जांच बैठाई जायेगी, मुकदमे चलेंगे, दस बीस सालों के बाद लोअर कोर्ट में कुछ लोगों को सजा भी हो जायेगी जिसे मीडिआ में पुनः उछाला जायेगा, केस उच्च एवं उच्चतम न्यायालय में जायेगा और फिर पाँच दस सालों के बाद इस या उस टेक्निकल ग्राउंड पर सब टाँय –टाँय फुस्स हो जायेगा.
आम जनता कहती है कि चारों ओर भ्रष्टाचार है, नेता कहते हैं कि भ्रष्टाचार के कारण ही विकास नहीं हो रहा, अखबार तो भ्रष्टाचार की खबरों से ही रंगे रहते हैं. लेकिन इसे रोकने के सार्थक उपाय खोजने की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता या जानबूझकर कोशिश ही नहीं की जाती क्योंकि वर्तमान व्यवस्था से ही व्यापारी, नेता, अफसर और बाबू सभी का स्वार्थ सध रहा है. कभी तो धड़ल्ले से क्रय प्रक्रिया के नियमों की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं और कभी बड़ी चालाकी से नियमों को अपने हित में तोड़ मरोड़ लिया जाता है. यदि फाइलों की ठीक से जाँच की जाये तो लगभग हर खरीद में कुछ न कुछ गड़बड़ी मिल जायेगी. ऑडिट होते हैं , लेकिन सालों साल के बाद. ऑडिटर गड़बड़ी पकड़ते भी हैं, लेकिन उन्हें भी खिला पिलाकर, कुछ ले-देकर मामला रफा-दफा कर दिया जाता है.
सरकारी खरीद की कोई भी ठोस और स्पष्ट नीति तय करने की ओर आजतक झारखंड सरकार ने ध्यान ही नहीं दिया, न व्यापारिक संगठनों ने ही आवाज उठाई, जबकि विभागों के द्वारा अरबों रुपयों की खरीद हो चुकी और की जा रही है. अधिकांश में बाजार की कीमतों से दुगने – तीन गुने दामों पर माल खरीदा गया, सामान की क्वालिटी का तो कोई माई बाप ही नहीं, अनाप शनाप कमीशन लेने वालों में नैतिक ताकत ही नहीं होती कि वे सप्लायर का माल क्वालिटी या किसी अन्य कारण से रिजेक्ट करें, वैसे भी उन्हें क्वालिटी का ज्ञान ही नहीं होता और न वे सीखने समझने की कोशिश ही करते हैं. सरकारी कोष उनके लिये कामधेनु गाय है, उसे बेरहमी से दूहने का अधिकार भी तो उन्ही को है. कुछ खरीदना है, तो विभाग में वर्षों से जमे अनुभवी बाबू को बुलाया, पुरानी फाइलें निकाली गयीं, जान पहचान के सप्लायर को बुलाया गया या रोज दरबार लगानेवाले सप्लायरों को कृतज्ञ किया गया, उनसे तीन कोटेशन लिये गये, कमीशन तय हुआ और उनसे माल की आपूर्ति ले ली गयी, लगेगा कि फाइलों में सबकुछ नियमानुसार हो गया.लेकिन लाखों का वारा न्यारा उन्हीं फाइलों में हो गया.
स्टील आलमारी का उदाहरण :
यदि सरकार संकल्प कर ले कि सरकारी खरीद से भ्रष्टाचार मिटाना है, तो इसे बहुत आसानी से किया जा सकता है. आइये एक उदाहरण लें.फर्नीचर और स्टेशनरी की नियमित खरीद हर सरकारी विभाग के द्वारा की जाती है, सभी सामग्रियों की सूची तैयार कर हर एक के विस्तृत स्पेसिफिकेशन को तय कर लेना चाहिये. उदाहरण स्वरूप स्टील की आलमारी चाहिये, तो गोदरेज़ के स्पेसिफिकेशन की नकल से काम नहीं चलेगा, पता करना होगा कि स्थानीय लघु उद्योगों के द्वारा बनाई जा सकने वाली अच्छी से अच्छी आलमारी का क्या स्पेसिफिकेशन होगा, आलमारी के निर्माण में स्टील की चादर इस्तेमाल होती है जिसकी मोटाई का उल्लेख गेज में होता है, 24 से लेकर 18 गेज तक, अधिकांश लोगों को यही पता नहीं होता कि कौन मोटा है , कौन पतला. 24 गेज से बनी आलमारी का वजन 18 गेज से बनी आलमारी से आधा होता है, गेज में मोटाई नापने की सुविधा एवं जानकारी बहुत कम लोगों के पास होती है, यदि आलमारी के स्पेसिफिकेशन में गेज के साथ उसके वजन का भी उल्लेख कर दिया जाये तो घपले का चांस कम हो जाये. पूरे राज्य में किसी भी विभाग के द्वारा आलमारी की खरीद होनी हो , सभी के द्वारा पूर्व निर्धारित एक ही स्पेसिफिकेशन की आलमारी का रेट मांगा जाना चाहिये, विभिन्न आपूर्तिकर्ताओं के द्वारा दी गयी दरों की तुलना करके सबसे कम दर वाले को आपूर्ति आदेश दे देना चाहिये.
राज्य स्तर पर हर सामग्री के स्पेसिफिकेशन निर्धारित किये जायें :एक और आसान तरीका हो सकता है, जानकार व्यक्तियों की टीम बनाकर उन्हें राज्य स्तर पर जिम्मेदारी दी जाये कि एक स्टील आलमारी का क्या स्पेसिफिकेशन होना चाहिये, वर्तमान दर पर उसकी कितनी कीमत हो सकती है, साथ में उल्लेख हो कि कीमत निर्धारित करते समय मुख्य कच्चे माल स्टील शीट की क्या कीमत थी. पूरे राज्य में आलमारी बनानेवाले लघु उद्योगों का पैनल बनाया जाये और निर्धारित स्पेसिफिकेशन एवं दर पर उनसे माल लिया जाये. इस पैनल में प्रतिष्ठित डीलरों को भी शामिल किया जा सकता है. माल की आपूर्ति लेकर एक सप्ताह से एक माह के अन्दर पेमेंट का प्रावधान हो, पेमेंट न करनेवाले पदाधिकारियों पर कड़ी कार्यवाही की जाये.
क्वालिटी कंट्रोल के लिये जांच की प्रक्रिया: क्वालिटी संबंधी घपले रोकने के लिये नियमित अंतराल पर विभिन्न विभागों में सप्लाई की गयी आलमारियों की जांच कड़ाई से हो जिसमें वजन पर ही ध्यान दिया जाये, वजन कम निकलने पर उस आपूर्तिकर्ता एवं माल स्वीकार करनेवाले व्यक्तियों पर कड़ी कार्यवाही की जाये. उस आपूर्तिकर्ता को ब्लैकलिस्ट कर पैनल से बाहर कर दिया जाये.यहां आलमारी का एक उदाहरण दिया गया है, अन्य सामग्रियों के लिये भी यही प्रक्रिया अपनाई जा सकती है. गुणवत्ता की जांच करने वाले पदाधिकारियों के विवेक पर कम से कम निर्णय छोड़े जाने चाहिये ताकि वह भयादोहन कर अपने कमीशन का जुगाड़ करने की स्थिति में न रहे. आलमारी का वजन ही जांच का मुख्य मुद्दा हो, जिसपर कोई विवाद नहीं हो सकता. यदि फिनिश ,ताले की क्वालिटी आदि की बात की जायेगी तो विवाद हो सकते हैं, और जांच अधिकारी अपना रोब जमा सकते हैं. हां पेंट की गारंटी हो कि वह पपड़ी बनकर दस सालों तक नहीं उचड़ेगा, इस बात पर विवाद नहीं हो सकता, इसे जांच में शामिल किया जा सकता है.
स्पेसिफिकेशन निर्धारण में सभी की भागीदारी: हर सामग्री के लिये आलमारी की तरह ही स्पेसिफिकेशन और दर निर्धारित किये जा सकते हैं , सालभर बाद होने वाली आकस्मिक जांच के मुद्दे एवं आर्थिक एवं ब्लैकलिस्टिंग जैसे दंडों के उपाय तय किये जा सकते हैं, अच्छे आपूर्तिकर्ताओं का पैनल तैयार किया जा सकता है, सप्लाई के पांच साल बाद भी जाँच का प्रावधान रखकर आपूर्तिकर्ताओं को ब्लैकलिस्टिंग का भय दिखाकर नैतिक रूप से बाँधा जा सकता है.
ये सबकुछ करने के लिये नये लोगों के नियोजन की जरूरत नहीं, एस आइ एस आइ(S.I.S.I.) एवं उद्योग विभाग जैसे अनेक विभागों में लोग मक्खियां मार रहे हैं, उन्हें जिम्मा दिया जा सकता है, लेकिन सबसे जरूरी है उन सामग्रियों से संबंधित अनुभवी एवं जानकार उत्पादकों एवं आपूर्तिकर्ताओं को भी पूरी प्रक्रिया में शामिल करना. उनसे ही पूछना चाहिये कि सामग्री की गुणवत्ता में घपला रोकने के लिये क्या क्या स्पेसिफिकेशन निर्धारित हों , जांच के लिये किन मुद्दों को रखा जाये जिनपर विवाद कम से कम हो. व्यापारियों एवं लघु उद्योगों के संघों और महासंघों का भी सहयोग लेना चाहिये. शुरू में कुछ समस्यायें भी आयेंगी, विवाद होंगे, लेकिन प्रक्रिया चलती जाये और उसमें सुधार किये जाते रहें तो हम एक ऐसे सिस्टम तक पहुंच सकते हैं जहां सरकारी खरीद में भ्रष्टाचार की गुंजाइश अत्यल्प हो जायेगी. ऐसे माहौल में व्यवसाइयों को अधिक आनंद आयेगा, सरकारी खजाने की लूट कम हो जायेगी.
अबतक हमने ऐसी सामग्रियों की चर्चा की जिनकी नियमित जरूरत और आपूर्ति होती है, लेकिन अन्य मामलों में भी खरीद की प्रक्रिया को ठीक किया जा सकता है. आपको कुछ सामग्री चाहिये, आपूर्तिकर्ताओं से उनके स्पेसिफिकेशन मांग लीजिये, संभव हो तो सैंपुल भी, सबकुछ देखकर स्पेसिफिकेशन निर्धारित कर दीजिये आपूर्तिकर्ताओं से ही विचारविमर्श कर उन बिन्दुओं को तय कर लीजिये जिन्हें माल लेते समय देखा जायेगा, बाद की जांचों में भी जिन्हें शामिल किया जायेगा. इसके बाद आपूर्तिकर्ताओं से उनकी दरें मांग लीजिये, कम दर वाले से माल खरीद लीजिये.बाद में की जानेवाली जांच प्रक्रिया कड़ाई से की जानी चाहिये.
सरकारी विभाग सेल्स टैक्स क्यों देते हैं ?
एक सरकारी नियम बड़ा विचित्र है, सरकारी विभाग भी हर खरीद पर सेल्स टैक्स का भुगतान करते हैं, आखिर इसकी जरूरत ही क्यों. सरकारी विभाग सेल्स टैक्स का भुगतान व्यापारी को करता है जो इसे वापस सरकारी खजाने में जमा करते हैं, इस दोहरी कसरत में हर जगह गड़बड़ी का चांस रहता है, सरकारी विभागों को धन आवंटन करते समय ही सेल्स टैक्स के बराबर की धनराशि कम दी जाये तो क्या नुकसान है?
हर विभाग में धन का आवंटन साल के शुरू में क्यों नहीं, मार्च लूट क्यों?
गड़बड़ी का एक और रास्ता खुलता है मार्च महीने में. बजट में सभी विभागों को आवंटन मिल जाता है. यदि योजना बनाकर त्रैमासिक समय के आधार पर आवंटित धन को खर्च किया जाये, तो काम भी हो और आवंटित राशि लैप्स होने का संकट भी समाप्त हो जाये. लेकिन हर विभाग में आवंटित राशि के ऊपर लोग कुंडली मारकर बैठे रहते हैं, जिस शाखा से मोटे कमीशन का ऑफर मिलता है, उसे तो धन मुहैय्या करा देते हैं, बाकी के लिये मोटे मुर्गे का इंतजार करते रहते हैं. साल बीत जाता है और 31 मार्च सिर पर आ जाता है, इस समय आपाधापी मचती है धन को खर्च करने की. नीचे के पदाधिकारी चालाक होते हैं, वे अपनी मांग की फाइल पहले बढा तो देते हैं ,पर त्वरित कार्यवाही के प्रयास ही नही करते. इंतजार करते हैं मार्च का जब उन्हें आवंटन के लिये आवंटन अधिकारी को कम कमीशन देना होगा, क्योंकि उस समय राशि लैप्स होने का खतरा मंडराता रहता है और गरज उनकी हो जाती है. धन आवंटित होता है और सामग्री आपूर्ति के लिये अव्यावहारिक समय दिया जाता है. 500 चौकियां या आलमारियां सिर्फ 7 दिनों में देनी हैं- स्पष्ट रूप से असंभव, जेन्विन उत्पादक पीछे हट जाते हैं और प्रिय ठेकेदारों को उच्च दरों पर आपूर्ति-आदेश जारी कर दिया जाता, हेरफेर कर ट्रेजरी से पैसे निकाल लिये जाते हैं और ठेकेदार तीन चार महीनों तक सप्लाई करता रहता है, वायदा सात दिनों में सप्लाई का और सप्लाई किया आराम से चार महीनों में, बिल जमा किया 31 मार्च की तारीख का, पदाधिकारी तो हाथ में है, डर किस बात का. यहां गलती व्यवसायी की नहीं, सरकारी विभागों एवं नियमों की है. जो चीज खरीदी जा रही है, उसका प्रावधान तो पिछले बजट में ही बन गया था, फिर सालभर में आवंटन एवं खरीद की प्रक्रिया पूरी न होने का दोषी कौन, यह घपला हर विभाग में सालों साल से चल रहा है, लेकिन मूल समस्या का समाधान कोई नहीं खोज रहा. बहुत जोर मारा तो मार्च के अंतिम सप्ताह में ट्रेजरी से निकासी पर रोक लगा दी.फिर सबकुछ जैसे का तैसा, चोर बने व्यापारी.
इन सभी मुद्दों पर बारीकी से चर्चा करके झारखंड सरकार अपनी परचेज पॉलिसी तय कर सकती है और उसका कड़ाई से पालन करवा सकती है, हर वर्ष पॉलिसी की समीक्षा करके उसमें सुधार करने की प्रक्रिया भी जारी रहनी चाहिये. पूरी प्रक्रिया में संबंधित उत्पादकों और व्यवसाइयों को अवश्य शामिल करना चाहिये, उनसे ही पूछा जाना चाहिये कि घपले कैसे कैसे हो सकते हैं, वे न हों इसके क्या उपाय हो सकते हैं , और बिना विवाद के उन्हें कैसे खत्म किया जा सकता है. सरकारी खरीद में भ्रष्टाचार कम हो जाये, तो सरकार के हर रुपये के सौ पैसों का उपयोग हो, राजीव गांधी द्वारा उल्लिखित 15 पैसों वाली आत्मघातक बात खत्म हो और झारखंड का त्वरित विकास हो. सरकार और व्यवसाइयों के बीच उद्योग और व्यवसाय की पॉलिसी तय करने में पार्ट्नरशिप का संबंध हो, तभी यह बात बन सकती है, आधुनिक मैनेजमेंट गुरु भी यही बात कहते हैं.
मूलतः न तो व्यापारी भ्रष्ट होते हैं और न पदाधिकारी ही, सिस्टम उन्हे भ्रष्ट बनाता है.यदि आप अपने घर पर रुपये पैसे या अन्य कीमती सामान लापरवाही से छोड़े रहते हैं और आपके घरपर काम करनेवाले नौकर चाकर हाथ साफ कर देते हैं ,तो सारा दोष आपका है. मूलतः वे चोर नहीं होते, हाँ जरूरतमंद अवश्य होते हैं. पैसों की सख्त जरूरत हो और पैसे लापरवाही से सामने फेंके हुए हों, तो ईमान का डिग जाना स्वाभाविक ही होता है.ऐसे घरों से चोरी की शिकायतें कम मिलती है जहां लोग अपने कीमती सामान हिफाजत से रखते हैं. कहने का मतलब है कि मौका मिलने पर काफी लोग बेईमान हो जायेंगे. सरकारी खरीद हो या ट्रांसफर पोस्टिंग का मामला या फिर सरकारी सेवाएं और सुविधाएं उपलब्ध करानेवाले विभाग- हर जगह पर यही बात लागू होती है. सिर्फ सिस्टम ठीक करके रेलवे रिजर्वेशन और एस टी डी कॉल्स में होनेवाली धाँधलियों में कितनी कमी आ गयी! वैसे तो दोनों ही मामलों में कंप्युटर का भी बड़ा योगदान है, लेकिन बिना सही सिस्टम के कंप्युटर भी अनुपयोगी हो जाता.यदि सरकार विशेषज्ञों की मदद लेकर “परचेज पॉलिसी” निर्धारित कर ले और उसका पालन कड़ाई से कराए ,तो सरकारी खरीद में भ्रष्टाचार की अनेक समस्यायें स्वतः हल हो जाएं.
आम जनता कहती है कि चारों ओर भ्रष्टाचार है, नेता कहते हैं कि भ्रष्टाचार के कारण ही विकास नहीं हो रहा, अखबार तो भ्रष्टाचार की खबरों से ही रंगे रहते हैं. लेकिन इसे रोकने के सार्थक उपाय खोजने की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता या जानबूझकर कोशिश ही नहीं की जाती क्योंकि वर्तमान व्यवस्था से ही व्यापारी, नेता, अफसर और बाबू सभी का स्वार्थ सध रहा है. कभी तो धड़ल्ले से क्रय प्रक्रिया के नियमों की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं और कभी बड़ी चालाकी से नियमों को अपने हित में तोड़ मरोड़ लिया जाता है. यदि फाइलों की ठीक से जाँच की जाये तो लगभग हर खरीद में कुछ न कुछ गड़बड़ी मिल जायेगी. ऑडिट होते हैं , लेकिन सालों साल के बाद. ऑडिटर गड़बड़ी पकड़ते भी हैं, लेकिन उन्हें भी खिला पिलाकर, कुछ ले-देकर मामला रफा-दफा कर दिया जाता है.
सरकारी खरीद की कोई भी ठोस और स्पष्ट नीति तय करने की ओर आजतक झारखंड सरकार ने ध्यान ही नहीं दिया, न व्यापारिक संगठनों ने ही आवाज उठाई, जबकि विभागों के द्वारा अरबों रुपयों की खरीद हो चुकी और की जा रही है. अधिकांश में बाजार की कीमतों से दुगने – तीन गुने दामों पर माल खरीदा गया, सामान की क्वालिटी का तो कोई माई बाप ही नहीं, अनाप शनाप कमीशन लेने वालों में नैतिक ताकत ही नहीं होती कि वे सप्लायर का माल क्वालिटी या किसी अन्य कारण से रिजेक्ट करें, वैसे भी उन्हें क्वालिटी का ज्ञान ही नहीं होता और न वे सीखने समझने की कोशिश ही करते हैं. सरकारी कोष उनके लिये कामधेनु गाय है, उसे बेरहमी से दूहने का अधिकार भी तो उन्ही को है. कुछ खरीदना है, तो विभाग में वर्षों से जमे अनुभवी बाबू को बुलाया, पुरानी फाइलें निकाली गयीं, जान पहचान के सप्लायर को बुलाया गया या रोज दरबार लगानेवाले सप्लायरों को कृतज्ञ किया गया, उनसे तीन कोटेशन लिये गये, कमीशन तय हुआ और उनसे माल की आपूर्ति ले ली गयी, लगेगा कि फाइलों में सबकुछ नियमानुसार हो गया.लेकिन लाखों का वारा न्यारा उन्हीं फाइलों में हो गया.
स्टील आलमारी का उदाहरण :
यदि सरकार संकल्प कर ले कि सरकारी खरीद से भ्रष्टाचार मिटाना है, तो इसे बहुत आसानी से किया जा सकता है. आइये एक उदाहरण लें.फर्नीचर और स्टेशनरी की नियमित खरीद हर सरकारी विभाग के द्वारा की जाती है, सभी सामग्रियों की सूची तैयार कर हर एक के विस्तृत स्पेसिफिकेशन को तय कर लेना चाहिये. उदाहरण स्वरूप स्टील की आलमारी चाहिये, तो गोदरेज़ के स्पेसिफिकेशन की नकल से काम नहीं चलेगा, पता करना होगा कि स्थानीय लघु उद्योगों के द्वारा बनाई जा सकने वाली अच्छी से अच्छी आलमारी का क्या स्पेसिफिकेशन होगा, आलमारी के निर्माण में स्टील की चादर इस्तेमाल होती है जिसकी मोटाई का उल्लेख गेज में होता है, 24 से लेकर 18 गेज तक, अधिकांश लोगों को यही पता नहीं होता कि कौन मोटा है , कौन पतला. 24 गेज से बनी आलमारी का वजन 18 गेज से बनी आलमारी से आधा होता है, गेज में मोटाई नापने की सुविधा एवं जानकारी बहुत कम लोगों के पास होती है, यदि आलमारी के स्पेसिफिकेशन में गेज के साथ उसके वजन का भी उल्लेख कर दिया जाये तो घपले का चांस कम हो जाये. पूरे राज्य में किसी भी विभाग के द्वारा आलमारी की खरीद होनी हो , सभी के द्वारा पूर्व निर्धारित एक ही स्पेसिफिकेशन की आलमारी का रेट मांगा जाना चाहिये, विभिन्न आपूर्तिकर्ताओं के द्वारा दी गयी दरों की तुलना करके सबसे कम दर वाले को आपूर्ति आदेश दे देना चाहिये.
राज्य स्तर पर हर सामग्री के स्पेसिफिकेशन निर्धारित किये जायें :एक और आसान तरीका हो सकता है, जानकार व्यक्तियों की टीम बनाकर उन्हें राज्य स्तर पर जिम्मेदारी दी जाये कि एक स्टील आलमारी का क्या स्पेसिफिकेशन होना चाहिये, वर्तमान दर पर उसकी कितनी कीमत हो सकती है, साथ में उल्लेख हो कि कीमत निर्धारित करते समय मुख्य कच्चे माल स्टील शीट की क्या कीमत थी. पूरे राज्य में आलमारी बनानेवाले लघु उद्योगों का पैनल बनाया जाये और निर्धारित स्पेसिफिकेशन एवं दर पर उनसे माल लिया जाये. इस पैनल में प्रतिष्ठित डीलरों को भी शामिल किया जा सकता है. माल की आपूर्ति लेकर एक सप्ताह से एक माह के अन्दर पेमेंट का प्रावधान हो, पेमेंट न करनेवाले पदाधिकारियों पर कड़ी कार्यवाही की जाये.
क्वालिटी कंट्रोल के लिये जांच की प्रक्रिया: क्वालिटी संबंधी घपले रोकने के लिये नियमित अंतराल पर विभिन्न विभागों में सप्लाई की गयी आलमारियों की जांच कड़ाई से हो जिसमें वजन पर ही ध्यान दिया जाये, वजन कम निकलने पर उस आपूर्तिकर्ता एवं माल स्वीकार करनेवाले व्यक्तियों पर कड़ी कार्यवाही की जाये. उस आपूर्तिकर्ता को ब्लैकलिस्ट कर पैनल से बाहर कर दिया जाये.यहां आलमारी का एक उदाहरण दिया गया है, अन्य सामग्रियों के लिये भी यही प्रक्रिया अपनाई जा सकती है. गुणवत्ता की जांच करने वाले पदाधिकारियों के विवेक पर कम से कम निर्णय छोड़े जाने चाहिये ताकि वह भयादोहन कर अपने कमीशन का जुगाड़ करने की स्थिति में न रहे. आलमारी का वजन ही जांच का मुख्य मुद्दा हो, जिसपर कोई विवाद नहीं हो सकता. यदि फिनिश ,ताले की क्वालिटी आदि की बात की जायेगी तो विवाद हो सकते हैं, और जांच अधिकारी अपना रोब जमा सकते हैं. हां पेंट की गारंटी हो कि वह पपड़ी बनकर दस सालों तक नहीं उचड़ेगा, इस बात पर विवाद नहीं हो सकता, इसे जांच में शामिल किया जा सकता है.
स्पेसिफिकेशन निर्धारण में सभी की भागीदारी: हर सामग्री के लिये आलमारी की तरह ही स्पेसिफिकेशन और दर निर्धारित किये जा सकते हैं , सालभर बाद होने वाली आकस्मिक जांच के मुद्दे एवं आर्थिक एवं ब्लैकलिस्टिंग जैसे दंडों के उपाय तय किये जा सकते हैं, अच्छे आपूर्तिकर्ताओं का पैनल तैयार किया जा सकता है, सप्लाई के पांच साल बाद भी जाँच का प्रावधान रखकर आपूर्तिकर्ताओं को ब्लैकलिस्टिंग का भय दिखाकर नैतिक रूप से बाँधा जा सकता है.
ये सबकुछ करने के लिये नये लोगों के नियोजन की जरूरत नहीं, एस आइ एस आइ(S.I.S.I.) एवं उद्योग विभाग जैसे अनेक विभागों में लोग मक्खियां मार रहे हैं, उन्हें जिम्मा दिया जा सकता है, लेकिन सबसे जरूरी है उन सामग्रियों से संबंधित अनुभवी एवं जानकार उत्पादकों एवं आपूर्तिकर्ताओं को भी पूरी प्रक्रिया में शामिल करना. उनसे ही पूछना चाहिये कि सामग्री की गुणवत्ता में घपला रोकने के लिये क्या क्या स्पेसिफिकेशन निर्धारित हों , जांच के लिये किन मुद्दों को रखा जाये जिनपर विवाद कम से कम हो. व्यापारियों एवं लघु उद्योगों के संघों और महासंघों का भी सहयोग लेना चाहिये. शुरू में कुछ समस्यायें भी आयेंगी, विवाद होंगे, लेकिन प्रक्रिया चलती जाये और उसमें सुधार किये जाते रहें तो हम एक ऐसे सिस्टम तक पहुंच सकते हैं जहां सरकारी खरीद में भ्रष्टाचार की गुंजाइश अत्यल्प हो जायेगी. ऐसे माहौल में व्यवसाइयों को अधिक आनंद आयेगा, सरकारी खजाने की लूट कम हो जायेगी.
अबतक हमने ऐसी सामग्रियों की चर्चा की जिनकी नियमित जरूरत और आपूर्ति होती है, लेकिन अन्य मामलों में भी खरीद की प्रक्रिया को ठीक किया जा सकता है. आपको कुछ सामग्री चाहिये, आपूर्तिकर्ताओं से उनके स्पेसिफिकेशन मांग लीजिये, संभव हो तो सैंपुल भी, सबकुछ देखकर स्पेसिफिकेशन निर्धारित कर दीजिये आपूर्तिकर्ताओं से ही विचारविमर्श कर उन बिन्दुओं को तय कर लीजिये जिन्हें माल लेते समय देखा जायेगा, बाद की जांचों में भी जिन्हें शामिल किया जायेगा. इसके बाद आपूर्तिकर्ताओं से उनकी दरें मांग लीजिये, कम दर वाले से माल खरीद लीजिये.बाद में की जानेवाली जांच प्रक्रिया कड़ाई से की जानी चाहिये.
सरकारी विभाग सेल्स टैक्स क्यों देते हैं ?
एक सरकारी नियम बड़ा विचित्र है, सरकारी विभाग भी हर खरीद पर सेल्स टैक्स का भुगतान करते हैं, आखिर इसकी जरूरत ही क्यों. सरकारी विभाग सेल्स टैक्स का भुगतान व्यापारी को करता है जो इसे वापस सरकारी खजाने में जमा करते हैं, इस दोहरी कसरत में हर जगह गड़बड़ी का चांस रहता है, सरकारी विभागों को धन आवंटन करते समय ही सेल्स टैक्स के बराबर की धनराशि कम दी जाये तो क्या नुकसान है?
हर विभाग में धन का आवंटन साल के शुरू में क्यों नहीं, मार्च लूट क्यों?
गड़बड़ी का एक और रास्ता खुलता है मार्च महीने में. बजट में सभी विभागों को आवंटन मिल जाता है. यदि योजना बनाकर त्रैमासिक समय के आधार पर आवंटित धन को खर्च किया जाये, तो काम भी हो और आवंटित राशि लैप्स होने का संकट भी समाप्त हो जाये. लेकिन हर विभाग में आवंटित राशि के ऊपर लोग कुंडली मारकर बैठे रहते हैं, जिस शाखा से मोटे कमीशन का ऑफर मिलता है, उसे तो धन मुहैय्या करा देते हैं, बाकी के लिये मोटे मुर्गे का इंतजार करते रहते हैं. साल बीत जाता है और 31 मार्च सिर पर आ जाता है, इस समय आपाधापी मचती है धन को खर्च करने की. नीचे के पदाधिकारी चालाक होते हैं, वे अपनी मांग की फाइल पहले बढा तो देते हैं ,पर त्वरित कार्यवाही के प्रयास ही नही करते. इंतजार करते हैं मार्च का जब उन्हें आवंटन के लिये आवंटन अधिकारी को कम कमीशन देना होगा, क्योंकि उस समय राशि लैप्स होने का खतरा मंडराता रहता है और गरज उनकी हो जाती है. धन आवंटित होता है और सामग्री आपूर्ति के लिये अव्यावहारिक समय दिया जाता है. 500 चौकियां या आलमारियां सिर्फ 7 दिनों में देनी हैं- स्पष्ट रूप से असंभव, जेन्विन उत्पादक पीछे हट जाते हैं और प्रिय ठेकेदारों को उच्च दरों पर आपूर्ति-आदेश जारी कर दिया जाता, हेरफेर कर ट्रेजरी से पैसे निकाल लिये जाते हैं और ठेकेदार तीन चार महीनों तक सप्लाई करता रहता है, वायदा सात दिनों में सप्लाई का और सप्लाई किया आराम से चार महीनों में, बिल जमा किया 31 मार्च की तारीख का, पदाधिकारी तो हाथ में है, डर किस बात का. यहां गलती व्यवसायी की नहीं, सरकारी विभागों एवं नियमों की है. जो चीज खरीदी जा रही है, उसका प्रावधान तो पिछले बजट में ही बन गया था, फिर सालभर में आवंटन एवं खरीद की प्रक्रिया पूरी न होने का दोषी कौन, यह घपला हर विभाग में सालों साल से चल रहा है, लेकिन मूल समस्या का समाधान कोई नहीं खोज रहा. बहुत जोर मारा तो मार्च के अंतिम सप्ताह में ट्रेजरी से निकासी पर रोक लगा दी.फिर सबकुछ जैसे का तैसा, चोर बने व्यापारी.
इन सभी मुद्दों पर बारीकी से चर्चा करके झारखंड सरकार अपनी परचेज पॉलिसी तय कर सकती है और उसका कड़ाई से पालन करवा सकती है, हर वर्ष पॉलिसी की समीक्षा करके उसमें सुधार करने की प्रक्रिया भी जारी रहनी चाहिये. पूरी प्रक्रिया में संबंधित उत्पादकों और व्यवसाइयों को अवश्य शामिल करना चाहिये, उनसे ही पूछा जाना चाहिये कि घपले कैसे कैसे हो सकते हैं, वे न हों इसके क्या उपाय हो सकते हैं , और बिना विवाद के उन्हें कैसे खत्म किया जा सकता है. सरकारी खरीद में भ्रष्टाचार कम हो जाये, तो सरकार के हर रुपये के सौ पैसों का उपयोग हो, राजीव गांधी द्वारा उल्लिखित 15 पैसों वाली आत्मघातक बात खत्म हो और झारखंड का त्वरित विकास हो. सरकार और व्यवसाइयों के बीच उद्योग और व्यवसाय की पॉलिसी तय करने में पार्ट्नरशिप का संबंध हो, तभी यह बात बन सकती है, आधुनिक मैनेजमेंट गुरु भी यही बात कहते हैं.
मूलतः न तो व्यापारी भ्रष्ट होते हैं और न पदाधिकारी ही, सिस्टम उन्हे भ्रष्ट बनाता है.यदि आप अपने घर पर रुपये पैसे या अन्य कीमती सामान लापरवाही से छोड़े रहते हैं और आपके घरपर काम करनेवाले नौकर चाकर हाथ साफ कर देते हैं ,तो सारा दोष आपका है. मूलतः वे चोर नहीं होते, हाँ जरूरतमंद अवश्य होते हैं. पैसों की सख्त जरूरत हो और पैसे लापरवाही से सामने फेंके हुए हों, तो ईमान का डिग जाना स्वाभाविक ही होता है.ऐसे घरों से चोरी की शिकायतें कम मिलती है जहां लोग अपने कीमती सामान हिफाजत से रखते हैं. कहने का मतलब है कि मौका मिलने पर काफी लोग बेईमान हो जायेंगे. सरकारी खरीद हो या ट्रांसफर पोस्टिंग का मामला या फिर सरकारी सेवाएं और सुविधाएं उपलब्ध करानेवाले विभाग- हर जगह पर यही बात लागू होती है. सिर्फ सिस्टम ठीक करके रेलवे रिजर्वेशन और एस टी डी कॉल्स में होनेवाली धाँधलियों में कितनी कमी आ गयी! वैसे तो दोनों ही मामलों में कंप्युटर का भी बड़ा योगदान है, लेकिन बिना सही सिस्टम के कंप्युटर भी अनुपयोगी हो जाता.यदि सरकार विशेषज्ञों की मदद लेकर “परचेज पॉलिसी” निर्धारित कर ले और उसका पालन कड़ाई से कराए ,तो सरकारी खरीद में भ्रष्टाचार की अनेक समस्यायें स्वतः हल हो जाएं.
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