जनाब शीन अख्तर साहब ने जब से रांची विश्वविद्यालय की बागडोर संभाली है, ऐसा लगता है कि ‘कुछ-कुछ हो रहा है’. अनुभव व जोश से भरे प्रो. अख्तर में कुछ कर गुजरने का संकल्प उनके कार्यकलापों से स्पष्ट नजर आता है, पिछली बार भी जब उन्हें कुछ समय के लिए यह जिम्मेदारी दी गयी थी, उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण काम किये थे. पता नहीं क्यों ऐसे योग्य प्रशासनिक सह शिक्षाविद को रांची विश्वविद्यालय का चार-पांच वर्षों के लिए कुलपति बना दिया जाता है? रांची विश्वविद्यालय के लिए यह स्वर्णिम अवसर है. महामहिम राज्यपाल प्रभात कुमार और जनाब शीन अख्तर साहब – यह मणिकांचन संयोग है. प्रो. शीन अख्तर साहब को बचना होगा राजनीतिज्ञों की तरह लोकप्रिय घोषणाएं करने से. हाल-हाल में उन्होंने कहा कि विभिन्न वोकेशनल विषयों के लिए कॉलेजों में, जो अतिरिक्त शुल्क लिये जा रहे हैं, उसे तत्काल हटाना चाहिए और दूसरे विषयों की तरह ही इसका शुल्क 15-20 रुपये प्रति माह निर्धारित होना चाहिए.
लोग अच्छी उच्च शिक्षा के लिए उचित शुल्क देने को तैयार हैं. कॉलेजों को इसका फायदा उठाना चाहिए. प्रो. अख्तर साहब विश्वविद्यालय की जर्जर आर्थिक स्थिति से भी पूरी तरह अवगत हैं. उन्हें तो शुल्क घटाने की बात ही नहीं करनी चाहिए. उन्हें यदि गरीब छात्रों से सहानुभूति है, तो उनके लिए वजीफे व बैंक से कर्ज दिलाने की व्यवस्था करा दें. अनुसूचित जातियों व जन जातियों के लिए तो पहले से ही कल्याण विभाग बना हुआ है. आज एक ही परिवार का एक बच्चा प्राइवेट पब्लिक स्कूल में नर्सरी से 12वीं तक की पढ़ाई, चार-पांच सौ रुपये प्रतिमाह रुपये का शुल्क देकर करता है उसी परिवार का बड़ा बच्चा कॉलेज में साल भर में भी इतनी फीस नहीं देता. इस विरोधाभास को दूर करने की पहल होनी चाहिए. कॉलेजों में फीस बढ़ाना आसान नहीं है. आन्दोलन और प्रतिरोध होंगे, वोकेशनल विषयों की फीस बिना किसी विरोध के सर्व स्वीकार्य हो चुकी है. अब इसे घटाने की बात करना बुद्धिमानी नहीं. विश्वविद्यालय का खजाना खाली है. यदि ठीक से पूरा हिसाब-किताब किया जाये, तो उसे दीवालिया घोषित करना ही पड़ेगा.
मैं एक बार फिर कहना चाहूंगा कि जनाब शीन अख्तर के रूप में एक योग्य व्यक्ति विश्वविद्यालय को मिला है. इसका फायदा उठाना चाहिये. धर्म व जाति पर आधारित नीतियों के कारण हजारीबाग स्थित विनोबा भावे विश्वविद्यालय की संस्थापक उप-कुलपति विनोदिनी तरवे की प्रतिभा व क्षमता का पूरा लाभ उठाने से यह राज्य चूक गया. जब उन्हें नवस्थापित विनोबा भावे विश्वविद्यालय की बागडोर दी गयी थी, तो उनके पास कार्यालय के नाम पर एक कुर्सी तक नहीं थी. उन्होंने सस्ते होटल में ठहर कर और हजारीबाग के ही एक कॉलेज से एक टाइपराइटर उधार लेकर बिना किसी शिकवे- शिकायत के अपना काम शुरू कर दिया और दो-तीन वर्षों में ही विश्वविद्यालय को ठोस आधार पर खड़ा कर दिया.
रांची विश्वविद्यालय के सौतेले व्यवहार ने उनके समक्ष अनेक बाधाएं खड़ी कीं, लेकिन उन्होंने अपने इस्पाती इरादों व सोलह घंटे काम करने के स्वभाव के सहारे सब पर विजय पा ली. अचानक उन्हें रिटायर कर दिया गया. आज भी उनके अंदर एक युवा व्यक्ति से अधिक ऊर्जा व उत्साह है, लेकिन समाज में ईमानदारी व लगन की कद्र कहां. ऊपर उठने और वहां बने रहने के लिये चाहिए सत्ता के गलियारों से निरंतर जुड़े रहना. खैर विनोदिनी तरवे का फायदा तो हमलोग नहीं उठा सके, लेकिन प्रो. अख्तर को पूर्णकालिक उप-कुलपति घोषित कर उन्हें रांची विश्वविद्यालय को पटरी पर लाने की पूरी स्वतंत्रता व पूरा अवसर प्रदान करना चाहिए. उम्मीद है कि महामहिम राज्यपाल महोदय ध्यान दे रहे होंगे व शिक्षा के पवित्र मंदिर को धर्म तथा राजनीति से दूर रख पाने में सफलता अवश्य पायेंगे.
लोग अच्छी उच्च शिक्षा के लिए उचित शुल्क देने को तैयार हैं. कॉलेजों को इसका फायदा उठाना चाहिए. प्रो. अख्तर साहब विश्वविद्यालय की जर्जर आर्थिक स्थिति से भी पूरी तरह अवगत हैं. उन्हें तो शुल्क घटाने की बात ही नहीं करनी चाहिए. उन्हें यदि गरीब छात्रों से सहानुभूति है, तो उनके लिए वजीफे व बैंक से कर्ज दिलाने की व्यवस्था करा दें. अनुसूचित जातियों व जन जातियों के लिए तो पहले से ही कल्याण विभाग बना हुआ है. आज एक ही परिवार का एक बच्चा प्राइवेट पब्लिक स्कूल में नर्सरी से 12वीं तक की पढ़ाई, चार-पांच सौ रुपये प्रतिमाह रुपये का शुल्क देकर करता है उसी परिवार का बड़ा बच्चा कॉलेज में साल भर में भी इतनी फीस नहीं देता. इस विरोधाभास को दूर करने की पहल होनी चाहिए. कॉलेजों में फीस बढ़ाना आसान नहीं है. आन्दोलन और प्रतिरोध होंगे, वोकेशनल विषयों की फीस बिना किसी विरोध के सर्व स्वीकार्य हो चुकी है. अब इसे घटाने की बात करना बुद्धिमानी नहीं. विश्वविद्यालय का खजाना खाली है. यदि ठीक से पूरा हिसाब-किताब किया जाये, तो उसे दीवालिया घोषित करना ही पड़ेगा.
मैं एक बार फिर कहना चाहूंगा कि जनाब शीन अख्तर के रूप में एक योग्य व्यक्ति विश्वविद्यालय को मिला है. इसका फायदा उठाना चाहिये. धर्म व जाति पर आधारित नीतियों के कारण हजारीबाग स्थित विनोबा भावे विश्वविद्यालय की संस्थापक उप-कुलपति विनोदिनी तरवे की प्रतिभा व क्षमता का पूरा लाभ उठाने से यह राज्य चूक गया. जब उन्हें नवस्थापित विनोबा भावे विश्वविद्यालय की बागडोर दी गयी थी, तो उनके पास कार्यालय के नाम पर एक कुर्सी तक नहीं थी. उन्होंने सस्ते होटल में ठहर कर और हजारीबाग के ही एक कॉलेज से एक टाइपराइटर उधार लेकर बिना किसी शिकवे- शिकायत के अपना काम शुरू कर दिया और दो-तीन वर्षों में ही विश्वविद्यालय को ठोस आधार पर खड़ा कर दिया.
रांची विश्वविद्यालय के सौतेले व्यवहार ने उनके समक्ष अनेक बाधाएं खड़ी कीं, लेकिन उन्होंने अपने इस्पाती इरादों व सोलह घंटे काम करने के स्वभाव के सहारे सब पर विजय पा ली. अचानक उन्हें रिटायर कर दिया गया. आज भी उनके अंदर एक युवा व्यक्ति से अधिक ऊर्जा व उत्साह है, लेकिन समाज में ईमानदारी व लगन की कद्र कहां. ऊपर उठने और वहां बने रहने के लिये चाहिए सत्ता के गलियारों से निरंतर जुड़े रहना. खैर विनोदिनी तरवे का फायदा तो हमलोग नहीं उठा सके, लेकिन प्रो. अख्तर को पूर्णकालिक उप-कुलपति घोषित कर उन्हें रांची विश्वविद्यालय को पटरी पर लाने की पूरी स्वतंत्रता व पूरा अवसर प्रदान करना चाहिए. उम्मीद है कि महामहिम राज्यपाल महोदय ध्यान दे रहे होंगे व शिक्षा के पवित्र मंदिर को धर्म तथा राजनीति से दूर रख पाने में सफलता अवश्य पायेंगे.
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