मैने व्यक्तिगत तौर पर कभी भी जे. पी. आंदोलन का समर्थन नहीं किया. इस आंदोलन का एकसूत्री प्रोग्राम था “इंदिरा को हटाओ”, और इसके लिये “संपूर्ण क्रांति” लाने का सपना दिखाया गया. लेकिन संपूर्ण क्रांति की कौन कहे, मामूली क्रांति भी नहीं आयी, उल्टे देश को जातिवाद और सांप्रदायिकता की आग में झोंकनेवाले नेताओं के हाथ जरूर मजबूत हुए और वे भी सत्तासीन हुए. जे.पी. आंदोलन की सिर्फ एक बात मुझे पसंद आयी थी – जे.पी. ने आह्वान किया था -हर गली- मोहल्ले और गाँव- कस्बे में आम जनों की निगरानी समितियों का गठन करो जिनका काम होगा चुने हुए जनप्रतिनिधियों और सरकारी बाबुओं-पदाधिकारियों पर नजर रखना और उनके भ्रष्टाचार को उजागर करना. ये समितियाँ बनीं तो जरूर, लेकिन सिर्फ जुलूस, हड़ताल, धरने और बंद की हंगामा - राजनीति के लिये. जे. पी. के चेले सत्ता में आये, तो ये समितियाँ भी गायब हो गयीं.यदि निगरानी समितियाँ रहने दी जातीं तो अपने वर्तमान आकाओं की नाक में ही दम किये रहतीं. हर सरकारी स्कीम का लाभ ये समितियाँ भ्रष्ट अफसरों से छीनकर जरूरतमंदों तक पहुँचा सकती थीं, सरकारी दफ्तरों में जाकर पूछ सकती थीं कि अमुक व्यक्ति का काम...
कुछ कहने की इच्छा, कुछ सुनने का मन - Prabhakar Agrawal